परफॉर्मेंस ग्रांट, भ्रष्टाचार और विकास की दौड़ में पीछे छूटती पंचायते

सतीश मुखिया

मथुरा: भारत गांव का देश है और आज भी 70% आबादी गांव में निवास करती है। देश में लगभग 6.50 लाख गांव है। गांव के लोगों की समस्याओं को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार और राज्य सरकार द्वारा ग्रामीण जनों के जीवन स्तर को ऊपर उठाने हेतु बहुआयामी योजनाएं संचालित की जा रही है। भारत सरकार के पंचायती राज विभाग और उत्तर प्रदेश सरकार के पंचायती राज विभाग द्वारा जिन पंचायत ने पिछली पंचवर्षीय योजनाओ में अच्छा काम किया था उन पंचायत को वर्ष 2021 में परफॉर्मेंस ग्रांट के तहत अलग से अनुदान राशि दी थी जो कि राज्यों के हिसाब से अलग-अलग रही। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा लगभग 793.92 करोड़ राशि का आवंटन ग्राम पंचायत को किया। जिसमें भगवान श्री कृष्ण की नगरी मथुरा को 77 करोड की धनराशि का आवंटन हुआ, यह राशि इस पंचवर्षीय योजना के अंतर्गत मिलने वाले अनुदानों के अलावा इन पंचायत को दी गई। जिससे कि यह पंचायते अपनी ग्राम पंचायत का विकास करके अपने आप को एक मॉडल के रूप में प्रस्तुत कर सकें और अन्य पंचायत के लिए प्रेरणा बन सके लेकिन इन पंचायतो का परफॉर्मेंस ग्रांट के तहत चयन होना ही अपने आप में अभिशाप बन गया। इन पंचायतो में मथुरा जनपद से ततरोता(22cr), पैंगांव(19.74cr), अड़ीग(37.21cr), तोश (6.13cr) और नगला हुमायूं देह(4.05cr)लगभग राशि सहित पंचायत का चयन हुआ।

इन पंचायत में सरकार द्वारा तय मानकों के अनुरूप लगभग 20 बिंदुओं पर प्रधान के द्वारा कार्यों को कराया जाना था। जिसकी कार्य योजना सरकार प्रधान की सहमति से निर्धारित की गई थी। जिसमें अमृत सरोवर योजना, अंत्येष्टि स्थल का निर्माण, प्रधानमंत्री आवास योजना( ग्रामीण), मनरेगा के तहत कार्य, सामुदायिक केंद्र,खेल का मैदान, ओपन जिम ,बच्चों के लिए पुस्तकालय ,सामुदायिक शौचालय, आरसीसी सेंटर, नालियों का निर्माण, स्वास्थ्य केदो की स्थापना, सोलर लाइट, स्वच्छ जल की व्यवस्था,पंचायत भवन का निर्माण, साफ सफाई,आंगनबाड़ी केंद्रों का निर्माण, खेल का मैदान, स्वच्छ भारत मिशन के तहत ग्राम पंचायत को स्वच्छ बनाना आदि शामिल थे लेकिन कार्य प्रणाली में परिवर्तन किए बिना प्रधानों से अधिक उम्मीद करना ही उन पर भारी पड़ गया। सरकार द्वारा प्रचुर मात्रा में फंड की व्यवस्था इन पंचायत के लिए की गई लेकिन जिला पंचायत कार्यालय, खंड विकास अधिकारी कार्यालय और ग्राम पंचायत सचिव व प्रधान के मध्य आपसी सामंजस्य का संतुलन ना बैठने के कारण इन पंचायतो में विकास का पहिया आगे बढ़ने की बजाय पीछे की ओर खिसकता हुआ दिखा, आपसी द्वेषभाव,भाई भतीजावाद,जातिवाद और स्थानीय राजनीति इन पंचायत के विकास में बाधा बन गया। देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था में महिलाओं को 50% आरक्षण की व्यवस्था देकर उनके जीवन स्तर में व्यापक बदलाव की आस जगाई थी लेकिन वर्तमान में यह केवल फाइलों में ही नजर आ रहा है, जमीनी स्तर पर इसमें बदलाव होने में अभी काफी समय लगेगा।हम लोगों ने ग्राम पंचायतो में जाकर देखा कि जिन पंचायतो में प्रधान महिला है उनकी प्रधानी उसके पति,पुत्र ,देवर या कहे कि कोई अन्य ही प्रतिनिधि कर रहा है।

अब ऐसे तो महिलाओं के जीवन स्तर में बदलाव हो नहीं सकता कि आप उनको अधिकार दे दें और उनको अधिकारों का प्रयोग न करने दें। ऐसा नहीं है कि जिला स्तर के अधिकारियों को इन सब का पता नहीं है लेकिन आपसी सामंजस्य और भ्रष्टाचार की मिठाई के कारण कोई एक दूसरे के खिलाफ मुंह नहीं खोलना चाहता जिस कारण पंचायतो का विकास अधर में लटक गया है। पंचायती राज विभाग द्वारा यह स्पष्ट किया गया है कि प्रत्येक पंचायत में प्रतिवर्ष लगभग तीन मीटिंग खुले में की जाएगी और जो भी विकास का प्रस्ताव लाया जाएगा उस प्रस्ताव को इस मीटिंग में रखा जाएगा और पंचों की सहमति से उस पर आगे कार्य कराया जाएगा लेकिन जब हम लोगों ने ग्रामीणों से विभिन्न जगहों पर बात की तब यह निकल कर आया कि प्रधान पतियों और प्रतिनिधियों द्वारा कोई भी मीटिंग नहीं की जाती, जिससे गांव के अंदर होने वाले विकास कार्यों के बारे में हम लोगों को पता नहीं चलता जब हम लोग इस बारे में प्रधान और ग्राम विकास अधिकारी से जानने की कोशिश करते हैं तब यह लोग बड़े ही तानाशाही और असभ्य तरीके का व्यवहार करते हैं जैसे कि यही देश के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति हो। देश के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी कहां करते थे कि असली भारत गांव में बसता है और जिसने गांव नहीं देखा उसने कुछ नहीं देखा लेकिन केंद्र सरकार और राज्य सरकार के विभिन्न प्रयासों के बावजूद ग्रामीण स्तर में उस तरह से परिवर्तन होता नजर नहीं आ रहा है जिस तरह की उम्मीद सरकार ने अपनी कार्य योजनाओं में लगा रखी है, प्राइमरी सेक्टर में काम हो रहा है लेकिन उस रफ्तार से नहीं हो रहा जिस रफ्तार से होना चाहिए।

इसमें सरकार को कार्य योजनाओं की क्रियावनन में अधिक ध्यान रखने की आवश्यकता है कि जिन योजनाओं को आम जन के लिए लागू किया जाता है ,क्या उन योजनाओं का सही तरीके से क्रियावनन जमीनी स्तर पर हो रहा है। जब हमारी टीम के सदस्यो ने ग्राम सचिवों से इन ग्राम पंचायतो की कार्य योजना की सूची मांगी तब उन लोगों ने तरह-तरह के बहाने बना दिए और कार्य योजना की सूची उपलब्ध नहीं कराई। ऐसा नहीं है कि सभी प्रधान पंचायत का विकास नहीं करना चाहते वह कुछ अलग करना चाहते हैं लेकिन अफसर शाही, स्थानीय राजनीति और सिस्टम में व्याप्त भ्रष्टाचार उनको रोकता है जिस कारण वह खुलकर पंचायत का विकास नहीं कर पाते,कुछ प्रधानों ने दबी जुबान में बताया कि हम लोग क्या करें हमारे पास कोई वित्तीय अधिकार नहीं है, वित्तीय अधिकार ग्राम विकास अधिकारी के पास हैं हमको उसके कहे अनुसार भी कई बार कार्य करना पड़ता है अन्यथा 5 साल प्रधानी चलाना बहुत मुश्किल कार्य है , नहीं तो आप करके देख लीजिए!

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