उत्तराखंड में जमीन नियमों में बड़ा बदलाव

आयुषी

उत्तराखंड सरकार ने राज्य में निवेश और औद्योगिक विकास को बढ़ावा देने के लिए भूमि संबंधी प्रक्रियाओं में बड़ा बदलाव किया है। अब उद्योग स्थापित करने के लिए भूमि खरीदने वाले निवेशकों को गैर-कृषि (नॉन-एग्रीकल्चर) अनुमति के लिए लंबा इंतजार नहीं करना पड़ेगा। सरकार ने नई व्यवस्था लागू करते हुए भूमि खरीद और भूमि उपयोग परिवर्तन की प्रक्रिया को पूरी तरह ऑनलाइन और समयबद्ध बना दिया है। इसके तहत भूमि खरीद की अनुमति मिलने के बाद गैर-कृषि उपयोग से जुड़ी प्रक्रिया अधिकतम सात दिनों के भीतर पूरी करनी होगी। यदि निर्धारित समय सीमा में कोई निर्णय नहीं लिया जाता है, तो आवेदन स्वतः स्वीकृत माना जाएगा।

सरकार का मानना है कि इस कदम से राज्य में निवेश का माहौल बेहतर होगा और उद्योगों की स्थापना में आने वाली प्रशासनिक बाधाएं काफी हद तक कम होंगी।राज्य में उद्योग स्थापना के लिए कृषि भूमि खरीदने के मामलों में पहले अनुमति देने का अधिकार जिला स्तर पर था। अब इस व्यवस्था में बदलाव करते हुए अनुमति की प्रक्रिया को शासन स्तर पर केंद्रीकृत कर दिया गया है। इच्छुक निवेशकों को ऑनलाइन आवेदन करना होगा, जिसके बाद शासन स्तर पर उसकी जांच और परीक्षण किया जाएगा। परीक्षण के उपरांत भूमि खरीद (धारा-154) की अनुमति जारी की जाएगी।अब तक भूमि खरीद की अनुमति मिलने के बाद आवेदक को भूमि को गैर-कृषि उपयोग में परिवर्तित कराने के लिए धारा-143 के तहत अलग से आवेदन करना पड़ता था। इस प्रक्रिया में कई बार महीनों का समय लग जाता था, जिससे उद्योग स्थापना की योजनाएं प्रभावित होती थीं।

राजस्व परिषद ने इस प्रक्रिया को सरल बनाते हुए धारा-143 को ऑनलाइन प्रणाली से जोड़ दिया है। अब जैसे ही किसी निवेशक को भूमि खरीद की अनुमति मिलेगी, उसी समय ई-भू अनुमति पोर्टल पर गैर-कृषि उपयोग के लिए आवेदन का विकल्प स्वतः उपलब्ध हो जाएगा।आवेदन दर्ज होते ही संबंधित जिले के राजस्व विभाग को इसकी सूचना ऑनलाइन माध्यम से प्राप्त हो जाएगी और प्रक्रिया आगे बढ़ जाएगी।राजस्व परिषद सचिव रंजना राजगुरु के अनुसार, नई व्यवस्था के तहत संबंधित राजस्व अधिकारी को आवेदन प्राप्त होने के सात दिनों के भीतर निर्णय लेना अनिवार्य होगा। यह समय सीमा प्रशासनिक प्रक्रियाओं में तेजी लाने और निवेशकों को अनावश्यक देरी से राहत देने के उद्देश्य से तय की गई है।

यदि किसी कारणवश निर्धारित अवधि के भीतर आवेदन पर फैसला नहीं लिया जाता है, तो आवेदन स्वतः स्वीकृत माना जाएगा। यह व्यवस्था अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित करने के साथ-साथ लंबित मामलों की संख्या कम करने में भी मदद करेगी।विशेषज्ञों का मानना है कि भूमि संबंधी अनुमतियों में देरी किसी भी औद्योगिक परियोजना की सबसे बड़ी बाधाओं में से एक होती है। नई व्यवस्था लागू होने से निवेशकों को समय और संसाधनों दोनों की बचत होगी। साथ ही परियोजनाओं के क्रियान्वयन में तेजी आएगी और उद्योगों की स्थापना का समय कम होगा।इसका सीधा लाभ विनिर्माण, पर्यटन, खाद्य प्रसंस्करण, लॉजिस्टिक्स, वेयरहाउसिंग, फार्मास्यूटिकल और सेवा क्षेत्र से जुड़े निवेशकों को मिलने की उम्मीद है।नई ऑनलाइन व्यवस्था के जरिए आवेदन की पूरी प्रक्रिया डिजिटल रूप से रिकॉर्ड होगी। इससे न केवल पारदर्शिता बढ़ेगी बल्कि आवेदकों को बार-बार सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाने की आवश्यकता भी नहीं पड़ेगी। सभी चरणों की ऑनलाइन निगरानी होने से प्रक्रिया अधिक जवाबदेह और प्रभावी बनेगी।

राज्य सरकार का मानना है कि तकनीक आधारित यह व्यवस्था निवेशकों के लिए बेहतर कारोबारी वातावरण तैयार करेगी और उत्तराखंड को निवेश के लिए अधिक आकर्षक राज्य बनाने में मदद करेगी।उत्तराखंड सरकार पिछले कुछ वर्षों से निवेश को आकर्षित करने के लिए विभिन्न सुधारात्मक कदम उठा रही है। सिंगल विंडो सिस्टम, डिजिटल मंजूरी प्रक्रिया और उद्योग अनुकूल नीतियों के बाद भूमि उपयोग परिवर्तन की समयबद्ध व्यवस्था को भी इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।विशेषज्ञों के अनुसार यदि यह व्यवस्था प्रभावी रूप से लागू होती है, तो राज्य में नए उद्योग स्थापित होने की गति बढ़ेगी, रोजगार के अवसर सृजित होंगे और क्षेत्रीय आर्थिक विकास को नई मजबूती मिलेगी।

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