धर्मांतरण की साजिश या कुछ और? लापता आशा नेगी केस में चुप है पूरा सिस्टम

देहरादून/मेरठ। उत्तराखंड की एक बेटी आशा नेगी पिछले सात वर्षों से लापता है। परिजनों का आरोप है कि वह धर्मांतरण के मास्टरमाइंड छांगुर बाबा के करीबी गुर्गे बदर अख्तर सिद्दीकी के जाल में फंसी और फिर अचानक गायब हो गई। वर्ष 2018 से लेकर अब तक ना तो पुलिस ने एफआईआर दर्ज की और ना ही किसी स्तर पर कोई ठोस जांच शुरू की गई है।

2018 में हुई थी आखिरी बातचीत
उत्तराखंड के मूल निवासी और मेरठ में कार्यरत आशा नेगी वर्ष 2016-17 में नोएडा सेक्टर 62 की एक निजी कंपनी में एचआर पद पर कार्यरत थीं। उसी दौरान उसकी पहचान बदर अख्तर सिद्दीकी से हुई, जो उस पर प्रेम जाल बुनने और जबरन धर्मांतरण कराने का आरोपी है। अप्रैल 2018 में आशा की अपने छोटे भाई सुनील से आखिरी बार बात हुई थी। इसके बाद वह अचानक लापता हो गई।

भाई को भेजे थे सबूत, फिर भी नहीं हुई कोई कार्रवाई
आशा के भाई अनिल नेगी ने बताया कि लापता होने से ठीक पहले आशा ने बदर अख्तर के पासपोर्ट, आधार और ड्राइविंग लाइसेंस की कॉपियां उन्हें भेजी थीं। यही नहीं, उसने भाई को अपनी घायल अवस्था की तस्वीरें भी व्हाट्सएप पर भेजी थीं, जिनमें उसके साथ हुई बर्बरता स्पष्ट दिखती है।

शिकायत भी दर्ज नहीं की पुलिस ने
परिजनों ने साल 2019 में मेरठ के सिविल लाइंस थाने में एफआईआर दर्ज करवाने का प्रयास किया लेकिन पुलिस ने बहाने बनाकर उन्हें टाल दिया। परिजनों का आरोप है कि बदर अख्तर का कोई करीबी न्यायिक या प्रशासनिक सेवा में उच्च पद पर तैनात है, जिस कारण इस मामले को लगातार दबाया जाता रहा। पुलिस ने क्षेत्राधिकार का हवाला देकर शिकायत तक दर्ज नहीं की।

पुलिस और प्रशासन की भूमिका पर उठे सवाल
परिवार की व्यथा सिर्फ एक लापता बेटी की नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की निष्क्रियता की गवाही देती है। पुलिस, प्रशासन और न्याय व्यवस्था में बैठे कुछ तत्वों की मिलीभगत का आरोप सामने आने से यह मामला और अधिक गंभीर बन गया है।

धर्मांतरण गिरोह का गहरा जाल
बदर अख्तर सिद्दीकी वही व्यक्ति है जिसे धर्मांतरण के मास्टरमाइंड छांगुर बाबा का सबसे करीबी बताया जा रहा है। उस पर पहले भी युवतियों को प्रेम जाल में फंसाकर धर्मांतरण और शोषण के आरोप लग चुके हैं। आशा नेगी का मामला अब इस नेटवर्क के एक और भयावह पक्ष को उजागर कर रहा है।

अब भी परिवार को है न्याय की उम्मीद
सात साल बीतने के बाद भी नेगी परिवार आज भी पुलिस चौकियों और सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहा है। आशा की मां और भाइयों की आंखों में हर दिन एक नई उम्मीद और निराशा की परत जुड़ जाती है।

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