‘जंगल की जिंदा पैदावार ऑक्सीजन है यानि प्राणवायु, फिर उसके बाद पानी है, फिर उसके बाद मिट्टी है, फिर उसके बाद खाना है, फिर उसके बाद पशुओं के लिए चारा हैं, फिर उसके बाद कपड़ा है, फिर उसके बाद औषधि है, फिर छाया है, यह सब जंगल की जिंदा पैदावार है और जब पेड़ मर जाए, जंगल ख़त्म हो जाए तो इसके बाद इधन और इमारते लकड़ी है’ “सुन्दरलाल बहुगुणा”
चिपको आंदोलन के प्रणेता
सुंदरलाल बहुगुणा का नाम विश्व पटल पर हमेशा याद रखा जाएगा, भारत और विश्व में पर्यावरण संरक्षण के इतिहास में सुनहरे अक्षरों में लिखा गया एक नाम है सुन्दरलाल बहुगुणा जिन्हें पेड़ो का मित्र भी कहा जाता हैं । उनका जन्म उत्तराखंड के टिहरी जिले में हुआ था। उन्होंने अपने जीवन को प्रकृति और पर्यावरण की रक्षा के लिए समर्पित किया। सुन्दरलाल बहुगुणा को सबसे अधिक चिपको आंदोलन के लिए जाना जाता है, जिसमें ग्रामीण, खासकर महिलाएं पेड़ों को गले से लगाकर कटने से रोकती थी । “चिपको” का अर्थ ही है “गले लगाना”।
रक्षासूत्र बंधती थी महिलाएं
1970 के दशक में, उत्तराखंड में जंगल कटाई और भूस्खलन के बीच संबंध को देखते हुए उन्होंने और चंडी प्रसाद भट्ट ने ग्रामीणों को पेड़ों की रक्षा के लिए संगठित किया। इस आंदोलन में महिलाएं भी बड़ी संख्या में शामिल हुईं। वे बर्फ में चलकर लकड़हारे से औजार लेतीं और पेड़ों को बचाने के लिए रक्षासूत्र बांधतीं। चिपको आंदोलन ने दुनिया के सबसे ऊंचे पहाड़ों में पर्यावरण संकट की ओर वैश्विक ध्यान आकर्षित किया। क्या हैं जंगल के उपकार, मिट्टी, पानी और बयार। मिट्टी, पानी और बयार, जिन्दा रहने के आधार”।
15 साल के प्रतिबंध को किया अनशन
एक दौर वो भी आया जब 1981 में सुन्दरलाल बहुगुणा ने उत्तराखंड में वाणिज्यिक पेड़ों की कटाई पर 15 साल के प्रतिबंध के लिए अनशन किया। 1983 में उन्होंने हिमालय में 4,000 किलोमीटर की पदयात्रा कर पर्यावरणीय गिरावट की ओर ध्यान खींचा। सुन्दरलाल बहुगुणा गांधीवादी विचारों के समर्थक थे, सरल जीवन जीते थे और ऊर्जा संरक्षण और स्वावलंबन पर जोर दिया करते थे। उनका मानना था कि भारत को सौर, पवन और जल ऊर्जा से स्वच्छ और गैर-हिंसात्मक समाज की दिशा में बढ़ना चाहिए।
कई पुरस्कारों से हुए सम्मानित
सुन्दरलाल बहुगुणा को उनके कार्यों के लिए कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया, जिनमें 1981 में पद्म श्री, 2009 में पद्म विभूषण, 1984 में राष्ट्रीय एकता पुरस्कार और 2020 में विश्व गौरव सम्मान शामिल हैं। वे वृक्ष मित्र के रूप में भी जाने जाते थे। उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं “धरती की पुकार” और ‘भू प्रयोग में: बुनियादी परिवर्तन की ओर’।
सुंदरलाल बहुगुणा का जीवन पेड़ों, जंगलों और पहाड़ों को समर्पित रहा। 21 मई 2021 को कोविड-19 के कारण उनकी मृत्यु हो गई। उनके कार्य और विचार आज भी पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास के क्षेत्र में प्रेरणा स्रोत हैं। बहुगुणा जी ने हमें यह सिखाया कि धरती का सम्मान करना मानवता की जिम्मेदारी है।


