अपने विषय में कुछ कहना पड़े बहुत कठिन हो जाता है क्योंकि अपने दोष देखना आपको अप्रिय लगता है, और उनको अनदेखा करना औरों को,
युगों से पुरुष स्त्री को उसकी शक्ति के लिए नहीं, सहनशक्ति के लिए ही दण्ड देता आ रहा है,
मुझे तो उस लहर की सी मृत्यु चाहिए जो तट पर दूर तक आकर चुपचाप समुद्र में लौट कर समुद्र बन जाती है,
महादेवी वर्मा के कुछ शब्द चाहे फिर वो अपने विषय में कुछ कहना हो या पुरुष स्त्री पर उनके विचार या फिर जीवन के अटल सत्य पर बोली गयी उनकी बाते हो, सभी उनके व्यक्तित्व को ‘मोती सा पिरोते’ । महादेवी वर्मा हिंदी साहित्य की वो कवयित्री जिनके बिना छायावाद युग अधूरा हैं, हम जब ग्यारवी बारहवी में पढ़ा करते थे तो उनकी गद्य रचनाओं से हम सभी रूबरू हुए ही हैं। महादेवी वर्मा का जन्म 26 मार्च 1907 को उत्तरप्रदेश के फारुकाबाद जिले में हुआ था. हिन्दी साहित्य के छायावादी युग की प्रमुख कवयित्री और साहित्य की बहुआयामी हस्ती रही। उन्हें “आधुनिक मीरा” और “हिन्दी के विशाल मंदिर की सरस्वती” कहा गया। उनकी रचनाओं में स्त्री संवेदना, समाज सुधार और करुणा की गहरी छाप मिलती है।
हिंदी साहित्य का छायावाद युग
हिंदी साहित्य के इतिहास में छायावाद युग एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण और स्वर्णिम युग माना गया है। यह काल 1918 से 1937 ई. तक का माना जाता है। इस युग ने खड़ी बोली हिंदी को साहित्यिक प्रतिष्ठा प्रदान की और हिंदी कविता को नई दिशा दी। छायावाद के चार प्रमुख स्तंभ हैं जिनमे जयशंकर प्रसाद की कामायनी (महाकाव्य), “आँसू”, “झरना” आदि कृतियाँ। सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की अनामिका, परिमल, सरोज स्मृति आदि रचनाए व सुमित्रानंदन पंत की पल्लव, युगांत, गीतिहंस आदि। महादेवी वर्मा की नीहार, संध्या गीत, दीपशिखा, यामा आदि शामिल हैं।
गिल्लू और मेरा परिवार आज भी लोकप्रिय
उन्होंने खड़ी बोली हिन्दी में ऐसी कोमलता और संगीतमयता दी जो पहले केवल ब्रजभाषा में संभव मानी जाती थी। उनके प्रमुख कविता संग्रह नीहार, रश्मि, नीरजा, सांध्यगीत और दीपशिखा ने उन्हें जन-जन की कवयित्री बना दिया। उनका गद्य-साहित्य भी उतना ही सशक्त है, जिसमें अतीत के चलचित्र, स्मृति की रेखाएँ, पथ के साथी और शृंखला की कड़ियाँ प्रमुख हैं। उनकी बाल कहानियाँ जैसे गिल्लू और मेरा परिवार आज भी बच्चों और बड़ों दोनों के बीच लोकप्रिय हैं।
महादेवी वर्मा ने की महिला शिक्षा की अगुवाई
केवल साहित्यकार नहीं, बल्कि समाज सुधारक और महिला शिक्षा की अगुवाई करने वाली भी थीं। उन्होंने प्रयाग महिला विद्यापीठ की प्रधानाचार्या और कुलपति के रूप में कार्य किया और महिलाओं के लिए शिक्षा एवं आत्मनिर्भरता का मार्ग प्रशस्त किया। वे गांधीवादी विचारधारा से प्रेरित होकर स्वतंत्रता आंदोलन और सामाजिक कार्यों में सक्रिय रहीं।
सादा और संयमित जीवन उनकी पहचान
जीवनभर उन्होंने सादा, संयमित और तपस्विनी जीवन जिया। बाल विवाह के बावजूद उन्होंने अविवाहित की तरह जीवन बिताया और साहित्य, संगीत, चित्रकला तथा पशु-पक्षियों के प्रति अपार प्रेम समर्पित किया। उनके योगदान को देखते हुए उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार (1982) समेत हिन्दी साहित्य के लगभग सभी प्रमुख पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।
महादेवी वर्मा का नाम भारतीय साहित्य में हमेशा याद किया जाएगा। वे सिर्फ संवेदनशील कवयित्री ही नहीं, बल्कि महिलाओं की आत्मनिर्भरता और सामाजिक जागरूकता की मजबूत आवाज भी थीं।


