भारतीय छात्रों के टूटते सपने: विदेशी पढ़ाई का सपना बना संकट, डिपोर्टेशन के डर में सैकड़ों भारतीय छात्र

रत्न प्रिया

आज जब भारत के युवा अपने सपनों को मुट्ठी में लेकर, परिवार से मीलों दूर बेहतर भविष्य की तलाश में अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी और कनाडा जैसे देशों का रुख कर रहे हैं तभी एक कड़वा सच भी सामने आ रहा है। विदेश में पढ़ाई अब सिर्फ सपना नहीं, बल्कि एक ग्लोबल ट्रेंड बन चुका है। लेकिन इस चमकदार ग्लोबल एजुकेशन सिस्टम के पीछे छुपा है एक ऐसा अंधेरा, जहाँ सपने टूटते हैं, भविष्य अधर में लटक जाता है और पढ़ाई के लिए गए छात्र खुद को नर्क जैसी ज़िंदगी में फंसा हुआ महसूस करते हैं। कहानी जर्मनी गए उन भारतीय छात्रों की, जिनके सपने, सालों की कमाई, लाखों का एजुकेशन लोन और परिवार की उम्मीदें एक कथित यूनिवर्सिटी फ्रॉड की भेंट चढ़ गईं।

जर्मनी: सपनों का देश या छात्रों के लिए नर्क?

जर्मनी को भारतीय छात्रों के लिए बेहतर भविष्य, क्वालिटी एजुकेशन और सुनहरे सपनों का प्रतीक माना जाता है। लेकिन आज यही देश कुछ छात्रों के लिए डर और अनिश्चितता का पर्याय बन चुका है। जर्मनी में पढ़ने गए भारतीय छात्रों के सपने एक यूनिवर्सिटी के कथित फ्रॉड में टूटकर बिखर गए हैं। डिग्री पाने की उम्मीद में गए ये छात्र अब डिपोर्ट होने के डर से जूझ रहे हैं।

बर्लिन की यूनिवर्सिटी पर सवाल

जर्मनी की राजधानी बर्लिन स्थित इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ एप्लाइड साइंस से जुड़ा एक मामला सामने आया  है। यहां पढ़ रहे कई भारतीय छात्रों पर अब जर्मनी छोड़ने का खतरा मंडरा रहा है। वजह है यूनिवर्सिटी की मान्यता पर सवाल, कोर्सेज की वैधता को लेकर संदेह, कमजोर इंफ्रास्ट्रक्चर और प्रोफेसर्स की कमी

दीप शम्बरकर की कहानी

महाराष्ट्र के रहने वाले 25 वर्षीय दीप शम्बरकर जुलाई में बिज़नेस मैनेजमेंट में मास्टर्स करने का सपना लेकर बर्लिन पहुंचे थे। 20 हजार यूरो की भारी रकम, एजुकेशन लोन और परिवार की उम्मीदें लेकर लेकिन आज हालात ऐसे हैं कि दीप पढ़ाई नहीं, बल्कि जर्मन अधिकारियों के दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर हैं। दीप को बर्लिन इमिग्रेशन ऑफिस से एक पत्र मिला, जिसमें 3 नवंबर तक जर्मनी छोड़ने का निर्देश दिया गया है। ऐसा न करने पर डिपोर्टेशन तय बताया गया है। दीप का कहना है कि यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर बहुत कम थे, इंफ्रास्ट्रक्चर कमजोर था और कोर्स की सही मान्यता को लेकर भी गंभीर संदेह है।

सिर्फ एक छात्र की नहीं, सैकड़ों की कहानी

यह कहानी सिर्फ दीप की नहीं है। यह उन सैकड़ों भारतीय छात्रों को चेतावनी है, जो विदेश में पढ़ाई करने का सपना देख रहे हैं। जब किसी यूनिवर्सिटी की मान्यता ही संदिग्ध हो, तो ऐसे में छात्रों के सपनों की जिम्मेदारी कौन लेगा? क्या विदेशों में भारतीय छात्रों के भविष्य की कोई कीमत नहीं है? अब सबकी निगाहें भारत सरकार और संबंधित एजेंसियों पर टिकी हैं कि वे इन छात्रों के लिए क्या कदम उठाती हैं और क्या कोई राहत प्रक्रिया शुरू होती है।

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