मोनिका
आज के दौर में शिक्षा व्यवस्था एक बिजनेस बन चुकी है। माता-पिता ग्राहक बन गए हैं और बच्चों को प्रोडक्ट की तरह ट्रीट किया जा रहा है। हर स्कूल और कॉलेज को बस अपने यहां पढ़ने वाले बच्चों की टॉप रैंक चाहिए ताकि वे उसके पोस्टर और एड में दिखा सकें, जिससे और ज्यादा बच्चे उनके यहां एडमिशन लें और उनका बिजनेस बढ़ता रहे।
असल में, कितने बच्चे सच में कुछ सीख पा रहे हैं, इसकी फिक्र किसी को नहीं होती। अगर सच में बच्चों की काबिलियत देखी जाती, तो मैनेजमेंट कोटा जैसी चीजें कभी नहीं होतीं। जहां एक बच्चा काबिलियत से जगह पाने की कोशिश करता है, वहीं दूसरा सिर्फ पैसे के दम पर सीट खरीद लेता है। जब किसी चीज तक पहुंच सबको बिना मेहनत के मिलने लगे, तो उसकी असली वैल्यू खत्म हो जाती है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस उम्र में हम सबसे ज्यादा एनर्जी, टाइम और आइडियाज लेकर आते हैं, उसी उम्र को यह सिस्टम बुक्स और एग्जाम में उलझा देता है। हमें कहा जाता है कि “अभी पढ़ाई करो, बाद में नौकरी करना,” लेकिन सच ये है कि यही सिस्टम हमें रोजगार तक पहुंचने से रोक देता है।
हमारे समाज में पढ़ाई को इतना बढ़ा-चढ़ा कर दिखाया जाता है कि बच्चे अपनी स्किल्स और पैशन को पहचान ही नहीं पाते। उन्हें बस अच्छे मार्क्स लाने और डिग्री लेने की रेस में डाल दिया जाता है, जबकि असल जिंदगी में वही लोग आगे बढ़ पाते हैं, जो इन चीजों से बाहर जाकर कुछ नया सीखते और करते हैं।


