सबका साथ, सबका विकास और सम्मान से अंतिम संस्कार बना सपना…?

सतीश मुखिया

ग्राम पंचायतो से श्मशान और मरघट विलुप्त होने के कगार पर

अंतिम समय, अंतिम क्रियाओ हेतु , अंतिम व्यक्ति दर-दर की ठोकरे खाने को मजबूर

जाते ही शमशान में मिट गई सारी लकीर,पास पास जल रहे थे राजा , रंक और फकीर

मथुरा: भारतीय संस्कृति और हिंदू धर्म में पितरों का हमारे जीवन में विशेष महत्व है ।आदिकाल से लेकर के वर्तमान समय तक धर्म शास्त्रों के अनुसार हमारे पितृ हम लोगों के साथ ही रहते हैं और जब वह रूठ जाते हैं तो परिवारजनों के जीवन की कुंडलिया बिगड़ जाती हैं ऐसा धर्म शास्त्रों में कहा गया है ।प्रत्येक वर्ष 15 दिन का प्रतिपक्ष आता है जिसमें हम लोग अपने अपने भूले बिछड़े पूर्वजों को याद करते हैं और उनको जल तर्पण कर के उनकी मुक्ति की कामनाएं करते हैं और अपने द्वारा हुए गलत कार्यों के लिए क्षमा याचना करते हैं । हम आग्रह करते हैं कि आप हमारे जीवन में हमारे परिवार पर इसी तरह आशीर्वाद बनाए रहे और संकटों से बचाने में सहयोग करें। इस पितृ पक्ष के दौरान देश-विदेश से आम जन भी गयाजी और वाराणसी में मां गंगा नदी के मणिकर्णिका घाट सहित अन्य नदियों पर अपने पितरों को जल अर्पण करने व उनका श्राद्ध करने हेतु पहुंचते हैं ।हमारे धर्म ग्रंथो में प्रितृपक्ष का विशेष महत्व है । महाभारत, रामायण और अन्य धर्म ग्रंथो में पितृपक्ष व उसके महत्व पर विशेष चर्चा की गई है । हम भारत वशीं राजा भागीरथ, भीष्म पिता और सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र जैसे महापुरुषों को हम लोग कैसे भूल सकते हैं ।

देश जब वर्ष 1947 में अंग्रेजों की गुलामी से आजाद हुआ और 1952 में भारत ने अपनी पहली स्वतंत्र सरकार बनाई उसके बाद पंचायती राज व्यवस्था के जनक और पितामह बलवंत राय मेहता की कमेटी के आदेश पर देश में पंचायती राज मंत्रालय का गठन हुआ और उस मंत्रालय की सिफारिश पर राजस्व विभाग द्वारा देश के समस्त राज्यों के प्रत्येक ग्राम पंचायत में श्मशान, मरघट , कब्रिस्तान और अंत्येष्टि स्थलों हेतु जमीने छोड़ी गई । आज आजादी के इतने वर्ष बाद यह गाँव / ग्राम पंचायतें तो अपनी जगह पर उपलब्ध हैं लेकिन स्थानीय निवासियों के अंतिम संस्कार हेतु छोड़ी गई मरघटो, शमशानो और कब्रिस्तानों की जमीन मौके से विलुप्त हो चुकी है या इन भूमियों पर अनाधिकृत व्यक्तियों द्वारा अवैध रूप से कब्जा कर लिया गया है जिसमें राज्यों के राजस्व विभाग में कार्यरत कर्मचारियों की भूमिका संदेह के घेरे में रही है । देश में त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था लागू है और इस व्यवस्था के तहत प्रत्येक ग्राम पंचायत में प्रधान, सरपंच और मुखिया प्रत्येक 5 वर्ष में चुने जाते हैं । वह गांव का प्रथम व्यक्ति होता है और गांव के अंदर होने वाले समस्त विकास कार्यों से लेकर सभी चल अचल संपत्तियों की जिम्मेदारी इन जन्म प्रतिनिधियों की होती है लेकिन शिक्षा का अभाव , जागरूकता में कमी कहें या अपने कर्तव्यों के निर्वहन में लापरवाही कि जिन लोगों पर इन संपत्तियों को बचाने की जिम्मेदारी होती है वह सामाजिक ,राजनीतिक ,आर्थिक और पारिवारिक कारणो से अपना मुंह और आंखें बंद कर लेते हैं ।

उत्तर प्रदेश में अगले 6 महीने बाद वर्ष 2026 में पंचायत के चुनाव होने हैं और सभी जनप्रतिनिधि जो इस चुनाव में भागीदारी करना चाहते हैं । उन लोगों ने साम, दाम ,दंड, भेद से तैयारी करना शुरू कर दिया है लेकिन मूल सवाल अब भी कायम है कि जिस उद्देश्य के साथ हमारे पूर्वजों ने पंचायती राज व्यवस्था को लागू किया था क्या उस व्यवस्था को निभाने में हम लोग सक्षम हैं और उनके दिखाए हुए मार्गदर्शन पर हम लोग चल रहे हैं ।भारतीय सामाजिक व्यवस्था में आज प्रधान सरपंच होना अपने आप में रसूख का परिचायक है लेकिन वर्तमान समय में चुनाव प्रक्रिया में भागीदारी करना बहुत महंगा हो चुका है जिससे आर्थिक रूप से पिछडें युवा और सामाजिक कार्यों में रुचि रखने वाले कार्यकर्ता इसमें भाग लेने से वंचित रह जाते हैं ।केंद्र सरकार और राज्य सरकार द्वारा स्थानीय स्तर पर पंचायती राज व्यवस्था में आरक्षण लागू करके समाज के दलित, वंचित और पिछड़े वर्गों के लोगों को उचित हक दिलाने की कोशिश की है ।

देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सबका साथ, सबका विकास का वादा कर रहे हैं लेकिन समाज के अंतिम पायदान पर खड़ा व्यक्ति जो सरकार की कार्य योजनाओं में विकास हेतु प्रथम स्थान पर है वह ग्राम पंचायत में सबसे अंतिम स्थान पर भी नहीं है ।भारतीय धार्मिक परंपराओं के अनुसार सामाजिक दृष्टि से व्यक्ति का अंतिम स्थान श्मशान और कब्रिस्तान है जहां किसी व्यक्ति को उसकी मृत्यु होने के पश्चात उसके पार्थिव शरीर को जलाया और दफनाया जाता है लेकिन आज ग्राम पंचायतों, कस्बो , नगरों और शहरों में यह स्थिति उत्पन्न हो गई है कि जब मृत व्यक्ति के परिवार वाले उसके पार्थिव शरीर को लेकर के इन श्मशानों और मरघटो पर जाते हैं तब यह मौके पर मिलते ही नहीं है या इनके ऊपर दबंग प्रवृति के व्यक्तियों द्वारा अवैध रूप से कब्जा कर लिया होता है और वह शव को वहां पर फूंकने नहीं देते हैं जिस कारण पहले से ही दुख में गमगीन परिवार वाले उसके शरीर को जैसे तैसे रास्तों, खेतों और यमराज की बहन यमुना के किनारे जलाकर अंतिम संस्कार की रस्म को पूरा करते हैं ।केंद्र सरकार और राज्य सरकार द्वारा इन अंत्येष्टि स्थलों के विकास हेतु पंचायत निधि के अलावा अलग से धनराशि जारी की जा रही है लेकिन धरातल पर भौतिक स्थिति बड़ी ही दुखद और दयनीय है ।जिला मुख्यालय में बैठे अधिकारियों से सांठगांठ करके जनप्रतिनिधि और ग्राम पंचायत में कार्यरत शासकीय कर्मचारी फर्जी बिल बनाकर इन कार्य योजनाओं को पूर्ण दिखा देते।पंचायत द्वारा विभाग को कार्य योजना भेजी जाती है और उसे ई ग्राम स्वराज पोर्टल पर दर्ज किया जाता है लेकिन उसमें भी हेरा फेरी करके विकास कार्य कराए जाते हैं ।इन समस्त कार्यों का वार्षिक मूल्यांकन विभाग द्वारा थर्ड पार्टी से कराया जाता है लेकिन उनका वार्षिक ऑडिट भी कट्टर ईमानदार अधिकारियों द्वारा सही तरीके से पूर्ण कर दिया जाता है।

भारत में विभिन्न धर्म और संप्रदाय के लोग रहते हैं जिसमें सभी लोगों की धर्म अनुसार अपनी जीवन शैली और सामाजिक रहन-सहन है ।देश में आज भी 70% आबादी गांव में निवास करती है और इन गांव, मजरो, टोलो में विभिन्न जातियों के लोग निवास करते हैं ।देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ देश में समरसता और जातिवाद को मिटाने की अपील करते हैं लेकिन ग्राम पंचायत में आज भी जातिवाद का जहर साफ नजर आता है ।आज भी कई ग्राम पंचायतों में सभी जातियों के अपने-अपने शमशान और मरघट हैं । इन जातियों के द्वारा अपने समाज से करने वाले व्यक्ति के पार्थिव शरीर को अपनी जाति के लिए निर्धारित श्मशान घर पर उसकी अंतिम क्रिया की जाती है लेकिन शहरों में इस तरह का अंतर दिखाई नहीं पड़ता है ।

अभी मानसून वापस होने की ओर है और पितृपक्ष समाप्त होने को तैयार है लेकिन हम लोगों ने देखा कि मानसून के समय असमय मृत्यु का शिकार होने वाले लोगों को उनके परिवार वालों ने किन कठिनाइयों के साथ शमशान स्थलों पर उनके पार्थिव शरीर की अंतिम क्रियाएं की ।भगवान श्री कृष्ण के जन्म स्थान और ब्रज की धरती से कुछ ऐसे शर्मनाक वाकया देखने को मिले जिससे सिर शर्म से झुक जाए। जिसमें श्मशान पहुंचने हेतु रास्ते का नहीं होना,कीचड़ / दलदल की भरमार,पानी का भरा होना, पार्थिव शरीर को जलाने हेतु टीन शेड/पॉलिथीन / तिरपाल को टांगकर खड़े होना हृदय विदारक दृश्य रहे । जब हमारी टीम के द्वारा कुछ स्थानीय निवासियों और ग्राम प्रधानों व प्रतिनिधियों से इस समस्या को लेकर चर्चा की तब उन्होंने दबी जुबान में नाम न छापने की शर्त पर बताया कि ग्राम पंचायत राल, अडिंग, पोरी , पिंगरी, ततरोता आदि में श्मशान या तो है नहीं, नहीं तो जीर्ण शीर्ण अवस्था में है । भू माफिया और दबंगों द्वारा राजस्व विभाग के कर्मचारियों से मिली भगत करके हसनपुर, जिखन गांव, भरतिया, कोथरा , भदेरुआ,ढवाला,, सकरवा , परखम, बढैन खुर्द , बाजना आदि पर अतिक्रमण कर रखा है या यह जमीने बिक चुकी है । आज भी यह राजस्व विभाग के रिकॉर्ड में खसरा खतौनी के नाम से मरघट भूमि के नाम पर दर्ज हैं लेकिन मौके पर इन जमीनों पर कोई आज नहीं सकता । हम लोगों के द्वारा उत्तर प्रदेश सरकार और जिला मुख्यालय पर अधिकारियों को लगातार शिकायतें दर्ज कराई है लेकिन नतीजा डाक के तीन पात ही है हम लोगों की कोई सुनवाई नहीं हो रही है सिर्फ झूठे आश्वासन दिए जा रहे हैं और लगातार मूर्ख बनाया जा रहा है।हम विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र और अर्थव्यवस्था होने का दावा करते हैं लेकिन हमारी सरकारें आज भी ग्रामीण स्तर पर मूलभूत सुविधाओं को देने में असमर्थ दिखाई पड़ती हैं ।इसका दोषी कौन है यह मूलभूत सवाल हमेशा चर्चाओं में बना रहेगा !

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