बच्चा तो हमारी बात सुनता ही नहीं है”

जानिए बच्चे कैसे सोचते हैं, क्या सीखते हैं, और पैरेंट्स के लिए कौन-सी बातें ज़रूरी हैं समझना

समीक्षा सिंह 

अक्सर मम्मी-पापा को लगता है कि “बच्चा तो हमारी बात सुनता ही नहीं है”, या “हम जो कहते हैं, उसका उस पर कोई असर नहीं होता”। लेकिन ये बात समझना ज़रूरी है कि बच्चों की नींव शुरू के सालों में ही बनती है। अगर शुरुआती सालों में सही परवरिश की जाए — मतलब प्यार, समझ, सही दिशा और एक अच्छा माहौल मिले — तो बच्चा धीरे-धीरे अपने आप समझदार बनता है और पेरेंट्स की बातों को अहमियत देता है। लेकिन अगर शुरू से ही सिर्फ डांट-फटकार, या इग्नोर करना हो, तो बच्चा या तो विद्रोही हो जाता है या बिलकुल ही चुप और डरपोक। खासतौर पर पापा का बच्चे के साथ रिश्ता बहुत मायने रखता है — अगर पिता प्यार से पेश आएं, तो बच्चा खुद को सुरक्षित और समझा हुआ महसूस करता है।
बेटा और बेटी को अलग नज़र से देखना या उनके साथ अलग व्यवहार करना भी उनके दिमाग और सोच पर असर डालता है। दोनों को बराबरी का मौका और प्यार मिलना चाहिए।
इसलिए ये ज़रूरी है कि पैरेंट्स बच्चे को शुरुआत से ही सुने, उसकी बातें समझें, और उसको यह महसूस कराएं कि वो मायने रखता है। ऐसा करने से बच्चा पेरेंट्स की बात भी सुनता है और अपने मन की भी खुलकर कहता है।
आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में पैरेंटिंग का तरीका बहुत बदल गया है। माता-पिता इतने बिज़ी हो गए हैं कि उनके पास बच्चों के लिए समय ही नहीं होता। कई बार पेरेंट्स बच्चों पर ज़्यादा कंट्रोल करने की कोशिश करते हैं (जिसे हम सख्त पैरेंटिंग कहते हैं), जबकि ज़रूरत इस बात की है कि बच्चों को प्यार, समझ और थोड़ी आज़ादी भी मिले — ताकि वो खुलकर सोच सकें और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ें।
बच्चों की रोज़ की रूटीन भी उनके मानसिक विकास के लिए ज़रूरी है। सही समय पर सोना, खेलना, पढ़ाई करना, और थोड़ी क्रिएटिव एक्टिविटीज़ करना बहुत फायदेमंद होता है। आजकल बच्चे मोबाइल, रील्स और वीडियो गेम्स में ज़्यादा उलझे हुए हैं, जिससे उनका ध्यान बंटता है और वो चिड़चिड़े हो जाते हैं। इसलिए स्क्रीन टाइम कम होना चाहिए।
खाने-पीने की आदतें भी बच्चों के मन और मूड को बहुत प्रभावित करती हैं। हर दिन चिप्स, कोल्ड ड्रिंक या जंक फूड खाने से बच्चे थके-थके और चिड़चिड़े महसूस करते हैं। अगर शुरुआत से ही घर में हेल्दी खाने की आदत डाल दी जाए — जैसे फल, हरी सब्ज़ियाँ, दूध वगैरह — तो बच्चे भी उसे अपनाते हैं।
और सबसे जरूरी बात — बच्चों से ऐसी बातें नहीं कहनी चाहिए जिससे उन्हें लगे कि वो अच्छे नहीं हैं। जैसे “तुम कुछ नहीं कर सकते”, “देखो फलाने का बच्चा कितना अच्छा है” वगैरह। इससे उनके मन में हीन भावना आ सकती है। हर बच्चे की सोच और समझ अलग होती है, बस हमें उन्हें समझने और उनका साथ देने की ज़रूरत है।

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