यमकेश्वर के विकास के लिए मुख्यमंत्री की घोषणाओं पर लगा घुन, जनप्रतिनिधियों ने भी फेर रखी हैं ऑखे

जब सूबे का मुखिया किसी क्षेत्र के विकास के लिए जनमंच से घोषणा करता है, तब जन समुदाय की एक उम्मीद जगती है कि शायद अब तो बीन नदी पर पुल बन जायेगा, या हमारे यहॉ सड़क तो पहुॅच ही जायेगी, लेकिन जब सूबे की मुखिया की घोषणा पर ही घुन लग जाये तो फिर किस पर विश्वास किया जाय। साल 2018 में जब थल नदी गेंद मेले में सूबे के मुखिया ने यमकेश्वर की विधायक के सामने ही बीन नदी पुल जो कि यमकेश्वर की लाईफ लाईन मानी जाती है कि घोषणा की तो जन समूह में एक आशा की किरण जगी थी लेकिन डेढ साल हो गया अभी तक धरातल पर अभी तक थल नदी से बीन नदी तक घोषणा नहीं पहुॅच पायी। यमकेश्वर में जिन विकास कार्यों की बाते बड़े शोर शराबे के साथ की गयी आज तक वह सब अधर में लटकी हुयी हैं।

यमकेश्वर का चर्चित नौंगाव विंध्यवासनी मार्ग का विस्तारीकरण करने की घोषणा भी मुख्यमंत्री उत्तराखण्ड के द्वारा थल नदी गेंंद मेंले मे साल 2018 में की गयी लेकिन वह भी अधूरा लटका हुआ है। इसी तरह घारकोट जुलेड़ी मोटर मार्ग जो साल 2010 में आधा आधा दोनो तरफ से काटा गया है, जिसमें काश्तकारों की जमीन भी गयी और सड़क भी पूरी नहीं बनी है, और ना आज तक इसका मुआवजा नहीं मिला। धारकोट जुलेड़ी मोटर मार्ग पर दो पुल स्वीकृत हैं, वह आज तक कागजों में ही सीमटकर रह गये हैं।

यमकेश्वर में पेयजल की समस्या को दूर करने की बात करना तो जनप्रतिनिधियों को नागवार गुजर रही है। जुलेड़ी पम्पिग योजना, परिन्दा पंम्पिग योजना द्वितीय चरण भी अधर में लटका हुआ है। आज यमकेश्वर में जब जनप्रतिनिधियों के इस उदासीन रवैया के कारण ग्रामीणांं के द्वारा गॉव में खुद ही पेयजल योजना का क्रियान्वयन किया जा रहा है, जिसमें किमसार, जोगयाणा, ढौसण, दिउली, जुलेडी आदि लोगों ने सरकारी मुजलिमों के मुॅह पर करारा तमाचा भी मारा लेकिन उसके बाद भी उनका उदासीन रवैया जस का तस बना हुआ है।

यमकेश्वर के सभी पहाड़ी मोटर मार्गो पर सुरक्षा वाल और अन्य खामियों पर ना तो लोकनिर्माण विभाग को चिंता है, अर न ही किसी जन प्रतिनिधियों को। यमकेश्वर में किसी भी सड़क पर कोई सरकारी परिवहन की व्यवस्था तक नहीं है,पूरा यमकेश्वर प्राईवेट गाड़ियों के भरोसे पर चल रहे हैं। यमकेश्वर के लिए सरकार की तरफ से कोई भी कम्प्यूटर केन्द्र नहीं है, एक छोटे से ऑनलाईन कार्य के लिए ़़ऋषिकेश या कोटद्वार जाना पड़ता है, जबकि प्रत्येक न्याय पंचायत में एक कम्प्यूटर केन्द्र खोलने की मॉग जनता द्वारा की जा रही है।

तालघाटी के विकास के लिए एक झील निर्माण का प्रस्ताव भी शासन के दरवाजे तक पहूॅचा था लेकिन वह भी दहलीज में अटक कर रह गया है। यमकेश्वर के प्रति जन प्रतिनिधियों का रवैया, केवल गा्रमीण भ्रमण तक ही सीमित रह गया है। विधायक, या विधायक प्रतिनिधि भी यमकेश्वर को केवल राजनीति में अपना कैरियर समझकर चुनाव के समय सक्रियता दीखाते हैं, उसके बाद वह भी यमकेश्वर को भूल जाते हैं।
यमकेश्वर में पर्यटन की अपार संभावनाओं के प्रति भी जनप्रतिनिधि और सरकार के नुमाइंदे भी मुॅह फेर कर बैठे हैं, नीलकंठ में आज करोड़ो का चढावा चढता है, जो अखाडांं की भेंट चढता है, क्षेत्रीय जनता बिगत कई सालों से श्राईन बोर्ड की मॉग करती आ रही है, लेकिन कोई सुध लेने वाला नहीं है।

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