विश्व पर्यावरण दिवस- कहीं हम रक्षक से भक्षक तो नहीं बनते जा रहे हैं ?

हर वर्ष 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस के रूप में मनाया जाता है। हर वर्ष लाखों लोग वृक्षा रोपण करते हैं। उसकी फोटो अपलोड करते है। कुछ ऑर्गनाइजेशन्स पेंटिंग, निबन्ध, कविता, स्लोगन, क़्विज आदि प्रतियोगिता करवाते हैं। कहीं विचार गोष्ठियां आयेजित की जाती हैं विचारों का आदान प्रदान होता है और इस तरह लोग मिलकर विश्व पर्यावरण दिवस मनाते है। ये प्रयास भी अपने आप में बहुत अच्छे हैं लेकिन ये तब सार्थक हैं। जब इनको वास्तविक धरातल पर उतरा जायेगा।

आइये विचार करें इन सभी बिंदुओं पर विश्व पर्यावरण दिवस 5 जून को लोग वृक्षा रोपण करते हैं। पौधे को एक स्थान से उखाड़ कर दूसरी जगह लगाते हैं लगा कर भूल जाते हैं जून की तपती झुलसती गर्मी में वो पौधा दो दिन में ही सूख कर मर जाता है। एक पौधा जो प्रकृति से अनुकूलन कर के अपनी जड़ें जमाये हुये था मिटटी की केशिकाओं से अपने लिए पानी का प्रबन्ध करता था। उसको नयी भूमि में लगा दिया जहाँ उसे मिटटी में अपने लिये पानी तलाशना हैं जिसकी केशिकायें टूट गयी और पौधा संघर्ष करते करते मर जाता हैं।

दरअसल हमारा ध्येय फोटो खिंचवाने तक ही है सुन्दर पौधा मूर्त रूप में दिखना चाहिए। फोटो खिंचवाओ सोसल मिडिया प्रिंट मीडिया पर छा जाओ। एक बीज जिसमें पौधा सुसुप्त अवस्था में है उसे कौन देख पायेगा। पर्यावरण दिवस पर पर्यावरण का संरक्षण और संवर्धन करें।

सबसे हमें करना ये है कि हम प्रकृति के साथ छेड़-छाड़ बन्द कर दें। जून के तपते दिनों में आग से जंगलों की सुरक्षा करें। जंगली जानवरों का शिकार करना बंद करें। पॉलीथिन जैसे अपशिष्ट का उपयोग कम करें। कम इसलिए लिखा गया हैं कि ये हमारे जीवन का हिस्सा हो गया हैं और शुरू में यही पॉलीथिन पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रयोग की गयी थी।

NETURE HEALS IT SELF WITHOUT HUMAN’S INTERFERENCE

ये पौधे लगाने का ढोंग करना बन्द करना होगा। क्योंकि इससे पर्यावरण का संरक्षण कम क्षरण अधिक हो रहा हैं। इस दुनिया में आधे पेड़-पौधे गिलहरियों की देन हैं। गिलहरी अपना भोजन जो कि बीज के रूप में इकट्ठा करती है जमीन में छुपाती है और भूल जाती है। गिलहरी वृक्षा रोपण नही करती, बीज बो देती है और परिणाम उसके हम सबके सामने है।

बॉम एक विस्फोटक जो जब भी फटता है बड़ा धमाका करता है। हमें भी कुछ बड़ा करना हैं। 5 जून पर्यावरण दिवस पर बॉम निर्माण करें। बीज बॉम बना कर उन्हें बंजर भूमि में फेंक दे। बरसात आएगी बॉम फूटेगा बहुत बड़ा धमाका होगा। कुछ न कुछ पौधे पनप ही जायेंगे। और पर्यवरण संरक्षण और संवर्धन दोनों हो जाएंगे। दूसरी और आजकल बच्चों की सुन्दर सुन्दर पेंटिंग देखने को मिल रही हैं। कोई कविता लिख रहा है, कोई निबन्ध लेकिन बच्चे भी अधिकतर प्रमाण पत्र और प्राइज़ तक ही दौड़ पा रहे हैं। दरअसल इसमें उन मासूमों की कोई गलती नही है उनको ऐसा बनाने में हम सभी का हाथ है। हमने अपनी महत्वकांक्षा का बीजारोपण उनमें किया हैं मदारी बन उनको अपने अनुसार नचा रहे हैं और बच्चे भी कागज़ के डिज़ाइनर प्रमाण-पत्र पा कर खुश हैं। माँ-बाप उनकी इस सफलता पर स्वयं को विजयी समझ रहे हैं।

कहीं विचार गोष्ठियों का आयोजन हो रहा है और विचार एक कान से सुन कर दूसरे से बाहर निकल रहा है। कागजों में पर्यावरण दिवस मनाया जा रहा है बस रस्म अदायगी हो रही हैं। आज जरूरत है कि हम कागजों में, मंचों में, विचारों में, सोशल मीडिया पर ही पर्यावरण दिवस न मनायें अपितु हम सबको इन सबसे बाहर निकल कर वास्तविक धरातल पर कुछ अलग तरीके से पर्यावरण का संरक्षण और संवर्धन करना होगा।

अंजना कण्डवाल ‘नैना’

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