अपराधी कौन, छात्र, संस्थान या फिर अभिभावक

सचिन ने आईटीआई करके पॉलोटैक्निक में प्रवेश लिया, कॉलेज मेंं आकर सचिन को लगा कि अब उसके और उसके मॉ बाप ने जो सपने संजोये हैं वह पूरा हो जायेगें। अक्सर इंजीनियरिंग से संबंधित खबरों लेखों, कार्यों में विशेष दिलचस्पी रखने वाला सचिन हमेशा अपनी महत्वकांक्षाओं को रोकता नहीं बल्कि उसे और मजबूत करता रहता। सचिन की क्लास में आईटीआई करने के बाद पॉलोटैक्निक में प्रवेश करने वाले कई और भी युवा साथी थे।

सचिन ने जब एक प्रतिष्ठित निजी कॉलेज में हजारों रूपये का फीस चुकाकर दाखिला लिया और कक्षाओं में अपनी उपस्थिति दर्ज शुरू करनी प्रारंभ की तो, बाहर से चकाचौंध करने वाले निजी कॉलेज की स्थिति अंदर से उतना ही भयावह थी, कहने का मतलब हाथी के दॉत दिखाने के और खाने के और वाली कहावत चरितार्थ हो रही थी। सचिन और उसके दोस्तों को शुरू में प्रवेश के दौरान कहा गया कि जिन छात्रों ने आईटीआई के बाद यहॉ प्रवेश लिया है, वह प्रथम और द्वितीय सेमेस्टर नहीं पढेंगे बल्कि सीधे तीसरे सेमेस्टर में कदम रखेगें।

किशौरावस्था वैसे ही उफान पर थी, सपनों को पंख लगे हुए ही थे, सचिन और उसके दोस्तों के लिए तो यह सुनहरा अवसर था कि उनके एक साल की पढाई बच गयी है, और मेहनत भी नहीं करनी पडेगी। लेकिन जब परीक्षा का समय आया तो उन्हें कह दिया गया कि तुम्हारी परीक्षा के पाठ्यक्रम के अनुसार और विश्वविद्यालय के नियम के अनुसार पहले और दूसरे सेमेस्टर के पाठ्यक्रम के विषय की भी परीक्षा होगी । यह सुनते ही सचिन और उसके दोस्तों के पैरों के नीचे की जमीन खिसक गयी, वे हतप्रद रह गये। कॉलेज प्रशासन ने तो पहले इस तरह की कोई बात नहीं की और न ही उन्हें इस संबंध में पहले अवगत कराया है, उन्होनें तो पहले और दूसरे सेमिस्टर की पढाई तक नहीं की है। अब यह सुनते ही सचिन और उसके दोस्त तनाव में आ गये।

परीक्षा की तिथि समीप आ गयी, सचिन और उसके दोस्त परीक्षा देने के लिए कॉलेज पहुॅचे तो पहले दिन पहले और दूसरे सेमेस्टर के पाठ्यक्रम से संबंधित प्रश्न पत्र था, जोकि उन्होनें पढा ही नहीं था, प्रश्न पत्र में गणित से संबंधित जो सवाल पूछे गये थे वह इण्टर स्तर के थे, जबकि सचिन और उसके दोस्तों का हाईस्कूल के अनुसार आईटीआई में प्रवेश हुआ था, उन्होने इस तरह के सवाल कभी हल ही नहीं किये थे तो उनके लिए यह प्रश्न पत्र सिर खपाने वाला था, ढाई घण्टे की अवधि काटना मुश्किल हो रहा था।

अक्सर यदि परीक्षा भवन में आपकी रूचि और आपके मेहनत के हिसाब से प्रश्न पत्र आया हो तो ढाई घंटे भी कम प्रतीत होते हैं, और यदि प्रश्न पत्र माथे से टकराकर वापिस आ रहे हों और कोई हल ना निकल रहा हो तो वही ढाई घंटे ढाई साल के बराबर महसूस होते हैं, इसी तरह सचिन और उसके दोस्तों के साथ इस परीक्षा की घड़ी में हो रहा था।

सचिन और उसके दोस्तों ने जैसे तैसे ये परीक्षा निपटायी, कुछ दिन बाद उनका रिजल्ट आ गया, और परिणाम विपरीत रहा, उनकी वही दो विषय में बैक आ गयी। लेकिन अगली सेमेस्टर की पढायी जारी रही। पुनः बैक पेपर की तिथि घोषित हो गयी पुनः मेहनत की और बैक परीक्षा देने की तैयारी शुरू हो गयी। ईधर बच्चों की मनोदशा समझकर उसका फायदा उठाने का प्रयास किया और परीक्षा में पास करने की सौदेबाजी शुरू हो गयी।

सचिन को अपनी मेहनत पर भरोसा था तो उसने इस सौदेबाजी में कोई रूचि नहीं ली, लेकिन अन्य छात्रों ने सौदेबाजी कर ली। इस तरह से बैक पेपर हो गये और सौदाबाजी करने वाले अच्छे अंको से पास हो गये, कॉलेज में परीक्षा पास कराने वाला गुट हावी होता जा रहा था, ईधर सचिन भी पास हो गया।

कॉलेज तो रोज खुलता था, लेकिन लैक्चरर तो केवल साल भर में गर्मियों की बारिश की छींटों के तरह ही हुए, ईधर सचिन अब तनाव में रहने लगा, पढाई में मन नहीं लगता, बार बार युवा मन उ़द्वेलित होकर कॉलेज के खिलाफ मुखर होने को करता लेकिन फिर भविष्य को देखते हुए मन मसोरकर रह जाता, यही हालात सारे दोस्तों के थे। अगली परीक्षा की तैयारी शुरू हो गयी, फिर कक्षा में उत्तीर्ण करने के लिए सौदाबाजी करने वाला तंत्र हावी हो गया, ईधर सचिन ने भी अपने पिताजी से इस संबंध में बात की तो उनके पिताजी आदर्शवादी हैं तो दो टूक शब्दों में सचिन के इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। अब सचिन के सामने मेहनत के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं था। उसके साथ ही उसके कुछ दोस्त के पिता भी आदर्शवादी थे तो कुछ के अभिभावक व्यवहारिक या कुछ लापरवाह और उन्होनें सौदाबाजी में रूचि लेते हुए अपने बच्चों का भविष्य खरीद लिया।

ईधर पुनः परीक्षा हुई जिसमें सचिन की पुनः बैक आ गयी। अब सचिन का मानसिक तनाव का जो ग्राफ था वह बढने लगा, खिलखिलाने वाला चेहरा अब बुझ सा गया। सचिन और उसकी बहिन किराये के मकान में रहते थे, जिनके यहॉ किराये पर रहते थे वह उनके जाति बिरादरी के थे जिस कारण वह उन्हें ताऊ जी ताई जी कहते थे। सचिन ने अपनी बहिन को सारी बात बतायी, बहिन समझदार थी वह सारा मामला समझ गयी और पिताजी से कहलवाकर परीक्षा पास करने के लिए माहौल के हिसाब से सौदाबाजों को रूपये दे दिये।

सचिन ने जून माह के बैक पेपर की परीक्षा तो पास कर ली, लेकिन अतिंम सेमेस्टर में जो बैक आया था उसकी परीक्षा बाकि रह गयी। उसके कई दोस्तों का कैंपस सलेक्शन हो गया लेकिन उसकी एक और बैक आने के कारण उसका कैंपस सलेक्शन नहीं हो पाया। कॉलेज द्वारा फेल होने वाले छात्रों के लिए दिसम्बर 2019 में संबंधित विषय के बैक पेपर परीक्षा की तिथि घोषित कर दी गयी, सबको एडमिट कार्ड भी जारी हो गये। सचिन और उसके अन्य दोस्तों ने संबंधित विषय की परीक्षा की तैयारी शुरू कर दी, लेकिन जब वह परीक्षा कक्ष में परीक्षा देने बैठे तो स्कूल प्रशासन ने उन्हें विश्वविद्यालय का पत्र दिखाकर नियमों का हवाला देते हुए उन्हें परीक्षा में नही बैठने दिया गया, और यह आश्वासन दिया गया कि जल्दी ही विश्वविद्यालय स्तर पर इस प्रकरण को सुलझा दिया जायेगा, और आपकी परीक्षा करवा दी जायेगी।

ईधर सचिन और उसके दोस्तों ने बैक पेपर में पास होने के लिए जिस सौदेबाज से सौदा तय किया था वह कॉलेज छोड़कर चला गया। अब सचिन और उसके दोस्तों के सामने बड़ी समस्या आ गयी, रूपये भी गये और भविष्य भी अंधकार में। इसी बीच कॉलेज से आदेश जारी किया गया कि अतिंम सेमेस्टर के पाठ्यक्रम में बदलाव कर दिया गया है, और आगे की परीक्षायें नये पाठ्यक्रम से होगी, जबकि सचिन और उसके दोस्तों ने तो पुराना पाठ्यक्रम से पढा है, और न ही उन्हे यह बताया गया कि उनका प्रश्न पत्र नये पाठ्यक्रम से आयेगा या फिर पुराने के अनुसार।

दिसम्बर में प्रवेश पत्र जारी करने के बाद भी जब परीक्षा नहीं हुई और उसके बाद इंतजार करते रहे, तब तक लॉकडाउन हो गया और 6 माह बीत गये लेकिन दोबारा परीक्षा नहीं हुई। कॉलेज के इस रवैया के कारण सचिन जैसे दोस्तों का भविष्य दॉव में लग गया। यदि कहीं जॉब के लिए अप्लाई भी करते हैं तो कैसे करे, और परीक्षा कब होगी यह कुछ पता नहीं आश्वासन भी किस आधार पर दें।

सचिन जैसे कई बच्चे इन मानसिक तनावों के कारण सुंशात सिंह राजपूत बनने की ओर अग्रसर होते हैं, उनके मस्तिष्क में जो दबाव पड़ रहा होता है, वह किसी थ्री इडियट फिल्म के उस रॉबिन की तरह होता है, जो भरपूर तकनीकी आविष्कार करने में सफल है लेकिन कॉलेज की प्रतिस्प़र्द्धा के आगे झुक जाता है और अपनी जीवन लीला समाप्त कर देता है।

जब कोई युवा मानसिक हालातों के कारण कई बार गलत कदम उठाता है, उसके पीछे कोई एक दिन का घटनाक्रम नहीं बल्कि कई दिनों से पलने वाला कण कण जैसे हवा के अंश जब मानसिकता के गुब्बारे को फुलाने लगते हैं, और एक समय वह गुब्बारा इतना भर जाता है कि वह बिना आवाज किये ही फूट जाता है। जब युवा द्वारा अप्रिय घटना को अंजाम दिया जाता है तब हम सहनशीलता और धैर्य की बात करते हैं, लेकिन उसके पीछे घटित हुये सारे घटनाक्रम को नहीं देख पाते हैं।

आजकल जिस तरह से शिक्षा का व्यवसायी करण हो गया है, छात्रों को धन उगाने वाली मशीन समझा जाता है, लाखों रूपये का डोनेशन लेकर उन्हें संस्थान का दर्शन करवाया जाता है, कई शैक्षणिक संस्थान तो ऊॅची दुकान फीका पकवान साबित होते हैं, मॉ बाप की अति महत्वकांक्षा भी बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर देती हैं, आज के इस प्रतिस्पर्द्धात्मक युग में दिखावे ने जो वीभत्स रूप धारण कर लिया है, उसका खामियाजा युवा पीढी को भुगतना पड़ रहा है।

सुप्रीम कोर्ट के आदेशों से संस्थानों में छात्रो द्वारा की जाने वाली रैंंगंग पर तो रोक लग गयी है, लेकिन कॉलेज प्रशासन और उनकी बढती धन की भूख पर आज तक नियन्त्रण नहीं लग पाया है, कई बार समाज में सचिन जैसे विद्यार्थियों का भविष्य संस्थान की लचर व्यवस्था के कारण अंधकार मय हो जाता है।

यह वह घटनाक्रम है, जिस पर मीडिया तब सामने आता है, जब कोई अप्रिय घटना घटित हो जाती है, उससे पहले कोई भी ऐसे छात्रों के सवालों को अनसुना कर देते हैं। छात्र खुलकर नाम बताने से डरते हैं, कहीं उनके भविष्य के साथ कोई और खिलवाड़ नहीं करदे और वह ऐसे अपराधों को मन मसोरकर मौन स्वीकृति देते रहते हैं।

आजकल युवावर्ग के ऊपर नौकरी को लेकर अपने सुनहरे भविष्य के लिए बढती महत्वकाक्षाओं के कारण मस्तिष्क में जो गुबार बनता जा रहा है, वह ज्वालामुखी का रूप बन रहा है, जब यह ज्वालामुखी उग्र हो जाता है तो उसका फटना स्वाभाविक है, जिसका परिणाम बड़ी भंयकर होता है। अतः मॉ बाप, भाई बहिन, रिश्तेदार, दोस्त और समाज की जिम्मेदारी के साथ संस्थान और कॉलेज की जिम्मेदारी बनती है कि ऐसे गुबारों को ज्वालामुखी ना बनने दें और युवाओं को उनकी मानसिक हालातों को समझते हुए उनके साथ दोस्ताना व्यवहार करना जरूरी होगा, नहीं तो सुशांत सिंह राजपूत जैसे कई लोग मानसिक प्रताड़ना को नहीं सह पायेगें और अप्रिय घटना को अजांम दे सकते हैं।

हरीश कंडवाल मनखी की कलम से
30 जून 2020

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