क्या खोखले हैं आधार की जानकारियां सुरक्षित होने के दावे?

निजी डाटा सुरक्षा के साथ इन दिनों आधार कार्ड से जुड़े डाटा की सुरक्षा का मुद्दा एक बार फिर बहस का विषय बन गया है। आधार के डाटा की सुरक्षा को लेकर नवीनतम विवाद उठ खड़ा हुआ है, टेलीकाम रेग्यूलेटरी अथारिटी आफ इंडिया (ट्राई) के प्रमुख आर एस शर्मा के आधार कार्ड से जुड़ी महत्त्वपूर्ण जानकारियां हैकर्स द्वारा सार्वजनिक कर देने के बाद। दरअसल इंटरनेट पर आधार की जानकारियां लीक होने की खबरें लंबे समय से चलती रही हैं और कुछ हैकर्स निरंतर यह दावा करते रहे हैं कि वे बड़ी आसानी से आधार की सुरक्षा में सेंध लगा सकते हैं किन्तु आधार अथारिटी ‘यूआईडीएआई’ सदैव इसका खंडन करते हुए आधार को पूर्णतया सुरक्षित बताते हुए दावा करती रही कि आधार की जानकारियों को लीक करना संभव ही नहीं है लेकिन समय-समय पर ऐसे मामले सामने आते रहे हैं, जब आधार से जुड़ी महत्त्वपूर्ण जानकारियों के बड़े पैमाने पर लीक होने का खुलासा होता रहा है और सरकार के आधार के सुरक्षित होने के दावे खोखले साबित होते रहे हैं।
संभवतः आधार के सुरक्षित होने की सरकार की दलीलों को पुख्ता साबित करने की नीयत से ही ट्राई चीफ शर्मा ने गत दिनों ट्विटर पर अपना 12 अंकों का आधार नंबर ट्वीट कर चुनौती दी कि अगर इससे सुरक्षा से जुड़ा कोई खतरा है तो कोई मेरे आंकड़े लीक करके दिखाए और नतीजा देखिये कि चंद घंटों के भीतर फ्रांस के सिक्योरिटी एक्सपर्ट हैकर इलियट एल्डर्सन ने ट्राई चीफ की कई जानकारियां ट्विटर पर सार्वजनिक कर आधार की सुरक्षा से जुड़ी खामियों को बड़ी सहजता से उजागर कर दिया। इतना कुछ होने के बाद भी हालांकि ‘यूआईडीएआई’ यह मानने को तैयार नहीं था कि ट्राई चीफ की ये व्यक्तिगत जानकारियां आधार के डाटा बेस या यूआईडीएआई के सर्वर से ली गई हैं बल्कि उसका कहना था कि ये तमाम जानकारियां हैकर्स ने गूगल तथा अन्य वेबसाइट्स से हासिल की।
यूआईडीएआई के इस खंडन को ज्यादा पल नहीं बीते थे कि ‘एथिकल हैकर्स’ नामक दूसरे ग्रुप ने आधार नंबर से महत्त्वपूर्ण जानकारियां जुटाकर शर्मा के बैंक अकाउंट में आधार से जुड़े पेमेेंट सर्वर के ही माध्यम से एक रुपया भेजने का दावा किया जिसका उन्होंने स्क्रीन शाट भी शेयर किया। इसके बाद इसका खंडन करने के बजाय 31 जुलाई को यूआईडीएआई को आखिरकार लोगों को यह चेतावनी देने पर विवश होना पड़ा कि वे अपना आधार नंबर इंटरनेट व सोशल मीडिया पर शेयर न करें।
सवाल यह है कि यदि आधार वाकई इतना ही सुरक्षित है तो फिर यूआईडीएआई की इस चेतावनी का क्या औचित्य है? फ्रैंच सिक्योरिटी एक्सपर्ट एल्डर्सन तो पहले भी कई बार आधार की सुरक्षा से जुड़ी जानकारियों का खुलासा करने का दावा करते रहे हैं। अगर हमारे देश के अलावा फ्रांस तक के हैकर्स आधार की जानकारियां लीक करके दिखा रहे हैं और यूआईडीएआई अब आधार नंबर को सोशल मीडिया पर शेयर न करने की चेतावनी दे रहा है तो आसानी से समझा जा सकता है कि आधार की जानकारियां सुरक्षित होने के दावे कितने खोखले हैं। अब यह तो सरकार की ही जिम्मेदारी बनती है कि वो हैकर्स की तमाम चुनौतियों को ध्वस्त करते हुए जनता को आधार के सुरक्षित होने का विश्वास दिलाए।
करीब चार माह पहले आधार कानून की वैधता पर सुनवाई कर रही सर्वोच्च अदालत की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने तो केन्द्र सरकार से यह सवाल भी किया था कि वह हर चीज को आधार से क्यों जोड़ना चाहती है? क्या वह हर व्यक्ति को आतंकवादी समझती है? आधार के जरिये हजारों करोड़ रुपये की धोखाधड़ी, बेनामी लेनदेन और तमाम फर्जी कम्पनियों का खुलासा होने संबंधी सरकार के तर्कों को खारिज करते हुए सर्वोच्च अदालत कह चुकी है कि आधार में ऐसा कुछ नहीं है, जिससे व्यक्ति को वाणिज्यिक गतिविधियों की श्रृंखला में लेन-देन से रोका जा सके और अदालत नहीं समझती कि आधार ऐसे बैंक धोखाधड़ी को रोक सकता है। सुप्रीम कोर्ट केन्द्र के तमाम तर्कों को खारिज करते हुए पहले ही कह चुका
है कि आधार हर धोखाधड़ी का इलाज नहीं है और न ही इससे आतंकवादियों को पकड़ने में मदद मिल सकती है।
आधार से निजता का गंभीर प्रश्न जुड़ा है और इसके दुरूपयोग के मामले भी अक्सर सामने आते रहे हैं। बड़ी तादाद में आधार तथा बैंक खातों से जुड़ी जानकारियां लीक होने की बातें भी सामने आती रही हैं और ऐसी खबरें भी आती रही हैं कि इंटरनेट पर लाखों लोगों के आधार कार्ड और उससे जुड़ी समस्त जानकारियां आसानी से उपलब्ध हैं जिन्हें कोई भी हासिल कर सकता है। सरकार या यूआईडीएआई भले ही आधार के सुरक्षित होने को लेकर कितने भी दावे करें किन्तु हकीकत यही है कि सवा सौ करोड़ की विशाल आबादी के व्यक्तिगत आंकड़ों को सुरक्षित रखने का हमारे पास अभी तक कोई भरोसेमंद नेटवर्क है ही नहीं। हैकर्स द्वारा 2015 में अमेरिकी सरकार के नेटवर्क से करीब पचास लाख लोगों के फिंगर प्रिंट हैक कर लिए गए थे। ऐसे में आधार के बायोमैट्रिक डाटाबेस की सुरक्षा पर अगर सवाल उठ रहे हैं तो इन्हें इतनी सहजता से खारिज नहीं किया जा सकता। कुछ समय पहले महाराष्ट्र के यवतमाल जिले में एक कुएं की सफाई के दौरान उसमें से प्लास्टिक बैग में हजारों आधार कार्ड मिलना आधार कार्ड को लेकर संबंधित प्राधिकरण के संवेदनशीलता के दावों की पोल खोलता है।
आधार को लेकर समय-समय सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणियों के बाद ही मोबाइल सिम लेने के लिए आधार की अनिवार्यता को खत्म किया गया और अब कुछ जरूरी योजनाओं के लिए भी आधार की अनिवार्यता को खत्म किया गया है। दरअसल आधार को लेकर हालत यह हो गई थी कि बैंक खाता खुलवाना हो या पेंशन लेनी हो, बच्चों का स्कूल में दाखिला कराना हो अथवा राशन लेना हो, बगैर आधार के छोटे से छोटा कार्य भी अटक जाता था। माना कि आधार की शुरूआत इसी उद्देश्य के साथ की गई थी कि कल्याणकारी योजनाएं सहजता से लक्षित समूहों तक पहुंचाई जा सकें किन्तु कुछ समय से जिस प्रकार इसे तमाम सेवाओं के साथ-साथ नागरिकता की पहचान से जोड़ने की भी बाध्यता देखी गई, उससे आधार को लेकर व्यावहारिक मुश्किलें पैदा होती रही हैं। बुजुर्गं व्यक्ति अक्सर बैंक संबंधी कामकाज या पेंशन इत्यादि के लिए उम्र के इस नाजुक पड़ाव में भी आधार कार्ड की बदौलत यहां-वहां धक्के खाने को विवश रहे हैं।
सरकारी योजनाओं का लाभ उठाते वक्त किसी के फिंगर प्रिंट मैच नहीं होते तो किसी के समक्ष कोई अन्य तकनीकी समस्या आ जाती है। ऐसे में आधार की बदौलत आम जनता को हो रही व्यावहारिक परेशानियों की अनदेखी भी उचित नहीं। आवश्यकता इस बात है कि सरकार को सभी जनोपयोगी सेवाओं के लिए आधार अनिवार्य करने से पहले इस प्रकार की अव्यवस्थाओं को दूर करने की ठोस पहल की जाए।
लाखों लोग ऐसे हैं जिन्हें उनके आधार कार्ड की मूल प्रति कभी प्राप्त ही नहीं होती और ऐसे आधार कार्डों के गलत तत्वों के हाथ लगने के पश्चात् उनके दुरूपयोग की संभावना बरकरार रहती है। कुछ ऐसे मामले सामने भी आए हैं, जब दूसरों का आधार नंबर हासिल कर उनके बैंक खातों से रकम उड़ा दी गई। आधार की बायोमैट्रिक जांच प्रक्रिया होने के बावजूद जाली आधार कार्ड के रैकेट का पर्दाफाश होता रहा है। अतः जब तक आधार के डाटा की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो जाती, आधार के प्रति संदेह तो बरकरार रहेगा ही।

-योगेश कुमार गोयल-

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