पैंतीस प्रतिशत महिलाओं का निरक्षर होना चिंताजनक है

हमारे देश में संपूर्ण साक्षरता अभियान की शुरूआत इसीलिए की गई थी ताकि निरक्षरता का कलंक मिटाया जा सके। साक्षरता कार्यक्रमों पर करोड़ों रूपए खर्च किए गए हैं और इनके नतीजे भी आए हैं लेकिन आज भी देश संपूर्ण साक्षरता के लक्ष्य को हासिल नहीं कर पाया है। महिलाओं का निरक्षर रहना अधिक चिंताजनक है क्योंकि मां के रूप में ही एक महिला बच्चे की प्रथम गुरू होती है। जब बच्चे को जन्म देने वाली मां ही निरक्षर है तो उस बच्चे के साक्षर हो जाने की संभावना पर प्रश्न चिन्ह लग जाता है।
पिछले सात दशकों में भारत ने अपनी साक्षरता दर बढ़ाई है और वह 20 प्रतिशत से बढ़कर वर्तमान में लगभग 75 प्रतिशत हो गई है। यह एक उल्लेखनीय उपलब्धि है क्योंकि इस बीच देश की जनसंख्या में तीन गुना वृद्धि हुई है लेकिन नकारात्मक तत्व तेजी से बढ़े हैं और पूरी क्रूरतापूर्वक वे वास्तविक उपलब्धियों पर हावी हो गए हैं। ग्रामीण भारत, वंचितों के भारत तथा हाशियाकृत लोगों के भारत को अनदेखा किया गया है और अपनी किस्मत पर छोड़ दिया गया है। संसाधन संपन्न व सत्तारूढ़ वर्गों ने अपने लिए एक अलग व्यवस्था बना ली है और वह बड़ी खुशी से कुछ चयनित विशिष्ट समूहों के लिए काम कर रही है।
केरल के कोट्टायम शहर को 1989 में संपूर्ण साक्षर घोषित किया गया। यह वह दौर था जब संपूर्ण साक्षरता कार्यक्रम की देश में शुरूआत ही की गई। किसी एक शहर को संपूर्ण साक्षर घोषित करने का यह उदाहरण न केवल भारत बल्कि दुनिया में अनूठा है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर कोट््टायम में ऐसा क्या था कि लोगों में साक्षर होने की ललक जाग उठी और देश के अन्य कई हिस्सों में आजादी के इतने साल गुजरने के बाद भी हम लोगों के संपूर्ण साक्षर होने का इंतजार कर रहे हैं।
महिला साक्षरता का राष्ट्रीय औसत लगभग 65 प्रतिशत है। ऐसे में कई राज्यों के लिए यह अफसोस का विषय होना चाहिए कि उनका औसत राष्ट्रीय औसत से भी कम है। विभिन्न राज्यों में शासन की ‘स्कूल चले हम, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ‘, मध्यान्ह भोजन योजना, लड़कियों को मौलिक शिक्षा देने हेतु सुविधाएं बढ़ाना‘ जैसी तमाम योजनाओं का प्रचार तो खूब हुआ किंतु ये कितनी सफल हुईं, यह मानव संसाधन मंत्रालय के आंकड़ों से पता चल जाता है। जितना खर्च विज्ञापनों पर किया गया, यदि उसी खर्च पर सुविधाएं जुटाने, महिला निरक्षरता दूर करने के ईमानदार प्रयास किए गए होते तो महिला साक्षरता की दर शत-प्रतिशत न सही, कम से कम 90 प्रतिशत तक तो पहुंच ही जाती।
केरल के कोट््टायम में निरक्षरांे को केवल अक्षर या अंकों के ज्ञान तक ही सीमित नहीं रखा गया। वहां अधिकारियों का मानना था कि जब तक किसी व्यक्ति को भाषा में दक्ष नहीं किया जाएगा, तब तक उसे साक्षर की परिभाषा में रखना ठीक नहीं। कोट्टायम की तरह ही देश के सभी हिस्सों में साक्षरता कार्यक्रम हाथ में लिया जाए तो संपूर्ण साक्षरता के लक्ष्य को हासिल करना मुश्किल नहीं है। आज साक्षरता की दर को 100 प्रतिशत करने के लिए पूरे देश में कोट्टायम जैसे प्रयास करने की आवश्यता है। इसके लिए निस्वार्थ भाव से कोशिश की जानी चाहिए, तभी सफलता मिलेगी।
महिलाओं में साक्षरता की कमी के आंकड़े न केवल सरकारी योजनाओं पर उंगली उठा रहे हैं बल्कि नारी स्वतंत्राता, महिला सशक्तिकरण, प्रत्येक क्षेत्रा में स्त्रिायांे की बढ़ती भागीदारी जैसे मुद्दों पर भी सवाल बनकर खड़े हैं। यह सही है कि कुछ राज्यों ने पंचायतों में महिलाओं को 50 फीसदी आरक्षण देकर सत्ता में भागीदारी देने का ईमानदार प्रयास किया है किंतु अक्सर देखने में आता है कि सरपंच बनी अनपढ़ महिला के पंचायत संबंधी सारे कामकाज तो उसका पति या बेटा ही करता है। ऐसे में क्या ये जरूरी नहीं लगता कि सत्ता का अधिकार देने से पहले शिक्षा का अधिकार दिया जाए? महिला शिक्षा के लिए किए जा रहे तमाम सरकारी प्रयासों में प्रचार ज्यादा और परिणाम गौण दिखाई देते हैं।
जरूरत इस बात की है कि साक्षरता कार्यक्रम को सरकार का नहीं बल्कि जनता का कार्यक्रम बनाया जाए। कोट्टायम को संपूर्ण साक्षर शहर घोषित करने के लक्ष्य को पाने में जनता के जुड़ाव को जरूर रेखांकित किया जाना चाहिए। केरल के महात्मा गांधी विश्वविद्यालय ने 1988 में कोट्टायम शहर का एक सर्वे किया था, उसके मुताबिक तब यहां साक्षरता की दर 84 प्रतिशत थी। इस शहर को शत-प्रतिशत साक्षर करना कोई कठिन लक्ष्य था भी नहीं। यहां नगर निकाय, सरकार और नागरिक सब जुट गए। ‘ईच वन टीच वन‘ का नारा दिया गया यानी प्रत्येक साक्षर व्यक्ति एक निरक्षर को पढ़ाएगा। करीब 14 हजार स्वयंसेवक तैयार हुए जिनमें 12 हजार महिलाएं थीं। इन स्वयंसेवकों ने रहने-खाने या पढ़ाने का कोई खर्चा नहीं लिया। एक तरह से अमीर-गरीब सब इस अभियान में सक्रिय रूप से शामिल थे। अक्षर ज्ञान के बजाय भाषा ज्ञान पर जोर दिया गया ताकि निरक्षरों को साक्षर होने के बाद वह दैनिक जीवन में उपयोगी रहे। सभी का सम्मिलित प्रयास रंग लाया और साल भर में ही कोट्टायम को संपूर्ण साक्षर करने में कामयाबी मिल गई।
यह कहावत दोहराने की आवश्यकता नहीं कि एक महिला शिक्षित होती है तो दो परिवारों को शिक्षित बनाती है मगर ऐसी कहावतों के सच होने से पहले ही परिवार, समाज और राष्ट्र के शिक्षित होने की ये पहली कड़ी जुड़ते-जुड़ते टूट जाती है। इतनी बड़ी संख्या में महिलाओं का निरक्षर रहना समाज के सर्वांगीण विकास में बहुत बड़ी बाधा है। सरकार को प्रयास करना होगा कि आने वाले सालों में आंकड़ों से लेकर जमीनी हकीकत तक बदलाव दिखे और हमारी स्त्रिायां सचमुच शिक्षित हों।

-नरेन्द्र देवांगन-

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