उग्रवाद जैसी विकृति का इस्लाम में कोई स्थान नहीं

अगर हर तरह से उग्रवाद को हराना है तो मुसलमानों को ईमानदारी से अपनी बहस के मुद्दे को इस्लाम पर केन्द्रित करना होगा, ठीक वैसे ही जिस प्रकार उग्रवादी धर्म का बेजा इस्तेमाल अपने संकीर्ण मनसूबों को पाने के लिए करते हैं। मसलन ऐसा माना जाता है कि किसी जानवर को मारने से पहले चाकू की धार को तेज किया जाता है व आराम से उसको मौत की नींद सुला दिया जाता है। दुर्भाग्य से यह देखा गया है कि अनगिनत भेड़-बकड़ियों, अन्य जानवरों को ट्रकों में ठंूस कर लादा जाता है और कई बार तो बिना वजह उन्हें क्रूरता से मार दिया जाता है।
इसके अलावा यह भी देखा गया है कि इन जानवरों को कई मर्तबा तपती दुपहरी में बिना पानी की एक बूंद दिए खड़ा होने पर मजबूर किया जाता है। अगर इन मुद्दों पर कोई मुसलमान दया व करुणा की दुहाई देता है तो उसे चमचा, कृतघ्न, पीठ पीछे चुगली करने वाल, भगोड़ा, अतार्किक, आदर्शहीन व अंत में गैर मुस्लिम या नास्तिक तक का नाम दे दिया जाता है।
कुछ मुसलमान जिनका झुकाव उग्र विचारधारा की ओर होता है, उनका मानना है कि गुड बाय जैसा लफ्ज गैर इस्लामी है तथा वे इस बात पर जोर देते हैं कि इसके स्थान पर अस्सलाम-ओलेकुम शब्द का इस्तेमाल ही किया जाना चाहिए। ये तमाम बातें किसी न किसी रूप में समाज को पीछे की ओर ले जाने वाली है। इससे हमें परहेज करना होगा। समाज में प्रगति के लिए अंधानुकरण नहीं पर प्रचलन में जो बातें आ जाती है, उससे कन्नी काटना समाज को कट्टर बनाना है, साथ ही उसे पीछे की ओर ले जाने जैसा है।
उग्रवादी ऐसा इंसान होता है जिसकी मानसिक स्थिति करीब-करीब एक मानसिक रोगी की तरह होती है। वह हमेशा कुरान या अन्य धार्मिक आयतों को तोड़-मरोड़ कर अपने स्वार्थ के अनुसार बिना संदर्भ के उनकी गलत व्याख्या करते हुए इस्तेमाल करता है। अपने आप को इस धरती का सबसे शुद्ध मनुष्य तथा अन्य सभी को गलत मानता है। उसकी सहनशीलता का स्तर बहुत कम होता है।
वे सभी जो उससे इत्तेफाक नहीं रखते, उनको वह काफिर या गैर मुस्लिम तक करार देता है। इसके अलावा उसे हल्की-फुल्की बातों, चुटकलों व एक दूसरे से किए गए मजाक में भी गैर धार्मिकता नजर आती है। वह अपने हृदय की गहराइयों तक दिखावटी होते हैं। उनका यह भी मानना है कि जो कुछ पश्चिम से आया है, वह अपवित्रा है जबकि व्यक्तिगत जिंदगी में पश्चिम द्वारा ईजाद की गयी तकनीकी चीजों का वे खूब इस्तेमाल करते हैं।
उनके अंदर कई बार बदला लेने की भावना कूट-कूट कर भरी होती है एवं जो लोग इससे इत्तेफाक नहीं रखते उनसे वे कभी भी समझौता नहीं करते। यह आज की मांग है कि मुसलमान चरमपंथ के खिलाफ आवाज उठाएं क्योंकि इस्लाम न तो इसका पर्यायवाची है और न ही इसे तर्कसंगत मानता है बल्कि इसके विपरीत इस्लाम को चरमपंथ से सख्त नफरत है।
कुराम की कई आयतों में ऐसा कहा गया है कि ऐ इंसान, आप अपने धर्म की इंतहा में न जाएं-सूरा-अन-निसारू 171। फिर इसमें आगे कहा गया है कि मजहब में कोई मजबूरी नहीं होती-अल-कबरारू 256। कुरान में यह मशविरा दिया गया है कि जो आपसे इत्तेफाक नहीं रखते, उनके प्रति सहनशक्ति व फिराकदिली बरती जाए।
कुरान में आगे कहा गया है कि खुदा कहता है कि तुम्हारी सच्चाई मालिक से है और जो कोई उसे प्राप्त करना चाहता है, उसे उसमंे यकीन करने दो और जो कोई उससे ना इत्तेफाकी रखता है, उसे ऐसा करने दिया जाए-अन-नहलरू 29।
ऐसा देखा गया है कि इंतेहा पसंद लोग अपने उग्र विचारों को सही ठहराने के लिए मजहब का बेजा इस्तेमाल करते हैं और आवेश में अगर वे कई मर्तबा कुरान के संदेश की अनदेखी करते हुए भी ऐसा कर बैठते हैं जो कि हजरत मोहम्मद साहब द्वारा दिए गए संदेशों के भी विरुद्ध हैं।
उदाहरण के लिए, उनके अनुसार मजहब में इंतहाई से बचा जाए क्योंकि वह उन्हें तबाह कर देता है। कुरान में भी लोगों में भिन्नता को मानना है तथा सामाजिक-सहिष्णुता के लिए एक रास्ता दिखाया है। एक जगह कुरान में कहा गया है कि ए इंसान, हमने तुझे औरत और आदमी से इजात किया है और तुममें से ही देश और जातियां बनी ताकि तुम सब एक दूसरे को जान सको-अल-हजरातः 13।
इस्लाम के पवित्रा गंथों तथा हजरत मोहम्मद द्वारा की गयी इन बातों में इस तरह के अनेक उदाहरण हैं जिनमें लोगों को अपने दीन को व्यक्त करने की आजादी दी गयी है किन्तु दुख के साथ कहना पड़ता है कि बहुत से मुसलमानों ने इस्लाम के सच्चे स्वरूप एवं मूलभूत शिक्षाओं को नजरअंदाज कर दिया, खासकर जब मजहबी आजादी व सब्र की बात आती है।
कई बार देखा गया है कि इंतहा पसंद लोगों को उनके समाज में इज्जत की नजर से देखा जाता है तथा यह माना जाता है कि सिर्फ वे ही इस्लाम के मूल स्वरूप का पालन करते हैं। बहरहाल, उनकी तंगदिली सोच अल्लाह तथा हजरत मोहम्मद द्वारा बताई गयी समाज की धारणा से बिलकुल मेल नहीं खाती।
बढ़ते उग्रवाद से निबटने के लिए सरकारों तथा सभ्य समाज को इस्लाम के विभिन्न स्रोतों की ओर देखना होगा। कुरान के अध्याय 109 के संदर्भ में बहुत महत्त्वपूर्ण हो जाता है जिसके अनुसार ए मेरे मजहब को ना मानने वालों, मैं उसकी इबादत नहीं करता जिसकी इबादत तुम करते हो और न ही तुम उसकी इबादत करते हो, जिसकी इबादत मैं करता हूं। न ही मैं उसकी इबादत करना चाहूं जिसकी इबादत तुम करते हो और न ही तुम उसकी इबादत करना चाहोगे जिसकी इबादत मैं करता हूं। तुम्होरे लिए तुम्हारा मजहब, मेरे लिए मेरा मजहब। इस बात में कोई मतभेद नहीं होना चाहिए कि कुरान मजीद में इस मुद्दे को बड़े ही स्पष्ट रूप से मजझाया गया है। इसके बावजूद, इस्लामी दुनिया में इस्लाम की इस मूल शिक्षा को नजरों से ओझल कर दिया गया। हमें इसपर तसल्ली से विचार करना चाहिए।
यह कहा जा सकता है कि दिक्कत धार्मिक विचारधारा में नहीं है बल्कि कुछ सिरफिरे लोगों में है। जो लोग एक ही दिशा में सोचने की प्रक्रिया पर आरूढ़ हैं, जो किसी भी प्रकार के धार्मिक संवाद की संभावना को नकारते हैं दिक्कत उन्हीं के द्वारा उत्पन्न होती है। मुस्लिम समाज को चाहिए कि वह इस्लाम के नाम पर रूढ़िवाद की आंधी को बढ़ावा न देते हुए एक सच्ची व सही धार्मिक क्रांति लाए जो समाज, देश और दुनिया के लिए हितकर हो।

-कलीमुल्ला खान-

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