सत्तापक्ष के आगे विपक्ष की कमजोर स्थिति

राज्यसभा के उपसभापति के चुनाव में राजग प्रत्याशी के रूप में जदयू के सांसद हरिवंश नारायण सिंह की जीत इसलिए कहीं अधिक उल्लेखनीय है, क्योंकि एक तो उच्च सदन में बहुमत न होने के बाद भी सत्तापक्ष को विजय हासिल हुई और दूसरे करीब चार दशक बाद यह पद किसी गैर कांग्रेसी दल के खाते में गया। राजग का नेतृत्व कर रही भारतीय जनता पार्टी को यह जीत एक ऐसे समय मिली जब विपक्षी दल महागठबंधन बनाने की तैयारी कर रहे हैं। आगामी विधानसभा चुनावों और साथ ही आम चुनाव के पहले इस नतीजे ने भाजपा के खिलाफ विपक्ष की एकजुटता की कोशिशों की हवा निकाल दी।
कर्नाटक विधानसभा चुनाव में पराजय के बाद भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के लिए जद(एस) को समर्थन देने के बाद कांग्रेस 2019 में नरेन्द्र मोदी की राह रोकने के लिए विपक्ष को एकजुट करने की कोशिश में है। इसके लिए राहुल गांधी भी सक्रिय हैं और सोनिया गांधी भी। खुद विपक्ष आरोप जड़ता रहा है कि उसे संस्थाओं के इस्तेमाल से प्रताड़ित किया जा रहा है। राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाने के लिए राजकीय संस्थाओं का इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है। चुनावी वर्ष में यह अपने चरम पर पहुंच सकता है। इस संस्थागत हमले के तले विपक्ष छटपटा रहा है और खुद को राज्यसत्ता के मनमाने इस्तेमाल का शिकार बता रहा है।
सत्तापक्ष के हरिवंश ने विपक्ष के हरिप्रसाद को मात देकर यही रेखांकित किया कि कम से कम कांग्रेस के नेतृत्व में महागठबंधन का आकार लेना उतना सहज-सरल नहीं जितना आभास कराया जा रहा है। विपक्षी खेमे में सब कुछ ठीक नहीं, यह तभी प्रकट हो गया था जब महागठबंधन की पैरवी करने वाले दलों ने यह जिम्मेदारी कांग्रेस पर ही डाल दी थी कि वह राज्यसभा उपसभापति के लिए अपने ही सदस्य को प्रत्याशी बनाए। राज्यसभा उपसभापति के चुनाव में अपने प्रत्याशी की हार के लिए राहुल गांधी की रणनीति को ही जिम्मेदार माना जा रहा है। इस पर आश्चर्य नहीं कि इस हार को व्यक्तिगत तौर पर उनके लिए कहीं ज्यादा बड़े झटके के तौर पर देखा गया।
विपक्षी खेमे द्वारा राज्यसभा उपसभापति प्रत्याशी की जिम्मेदारी कांग्रेस को सौंप देने से यही संकेत मिला कि वे या तो जीत को लेकर सुनिश्चित नहीं थे या फिर कांग्रेस से निकटता बढ़ाते हुए नहीं दिखना चाह रहे थे। ध्यान रहे कि विपक्षी दलों में कई दल ऐसे हैं जो कांग्रेस विरोधी राजनीति की उपज हैं। चुनाव नतीजे से यह भी साफ हो गया कि कांग्रेस ने अपने प्रत्याशी के पक्ष में वैसी लामबंदी नहीं की जैसी जरूरी थी। उसकी रणनीति जो भी रही हो, उसे अपने रवैय्ये को लेकर सवालों का सामना इसीलिए करना पड़ रहा है कि वह इस प्रतिष्ठापूर्ण चुनाव के प्रति गंभीर नहीं दिखी।
विपक्ष समझ नहीं पा रहा है कि संस्थागत संकट से कैसे लड़ा जाए। इसके कई कारण हैं। विपक्ष में कई दलों का अतीत इतना दागदार है कि वे गहन संस्थागत सुधारों को लेकर खुद भयाकुल हैं। समाजवादी पार्टी से लेकर तृणमूल कांग्रेस तक कुछ दलों के राजकाज की शैली ऐसी रही है कि वे संस्थागत अखंडता का दावा नहीं कर सकते, आगे बढ़कर संस्थाओं को बचाने की मशाल नहीं थाम सकते। यह भी साफ हो गया है कि सभी विपक्षी दल कांग्रेस का नेतृत्व स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं। कई विपक्षी दल तो ऐसे हैं जो इसके स्पष्ट संकेत भी दे चुके हैं।
जहां ममता बनर्जी खुद प्रधानमंत्राी पद के लिए दावेदारी पेश करती दिख रही हैं, वहीं बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में अपनी शर्तों पर ही कांग्रेस से समझौता करना चाह रही हैं। बसपा के अलावा रालोद के साथ अपना तालमेल पक्का कर रहे समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने भी यह कहकर कांग्रेस की मुसीबत बढ़ाई है कि उत्तर प्रदेश में आगामी लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ज्यादा सीटों पर लड़ने की दावेदार नहीं है।
संस्थागत सुधार का काम राजनीतिक रूप से आकर्षक नहीं होता। अधिकतर दल सोचते हैं कि इससे जन गोलबंदी नहीं की जा सकती। हमारी राजनीतिक संस्कृति ऐसी है जो अब भी राजनीतिक सत्ता को व्यक्ति में देखती है। हम लोग सियासी ड्रामे को संस्थागत सुधारों की जंग के बजाय व्यक्तियों के गुणों की जंग के रूप में देखने के आदी हैं जो अक्सर अहम भी होता है। इस ऐतिहासिक पड़ाव पर हालांकि यह धारणा बदलने की सख्त जरूरत है।
हरिवंश का राज्यसभा का उपसभापति बनना यह भी बताता है कि भारतीय जनता पार्टी और जदयू का साथ और प्रगाढ़ हुआ है। भाजपा के घटक दल के किसी नेता को प्रतिष्ठित पद मिलने से गठबंधन धर्म को मजबूती मिलती दिखी है। यह मजबूती भाजपा के नए सहयोगियों की तलाश में सहायक बन सकती है। भाजपा के साथ दोबारा जुड़ने के बाद यह माना जा रहा था कि जदयू के प्रतिनिधियों को केंद्रीय कैबिनेट में जगह मिलेगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ। देखना है कि राज्यसभा उपसभापति का पद हासिल करने के बाद जदयू और भाजपा के बीच आपसी समझबूझ कितनी बढ़ती है।
विपक्ष को शायद यह बात अभी तक समझ नहीं आई है अगर वह एकजुट नहीं हुआ तो परेशानियां और बढ़ सकती हैं। इसका थोड़ा अहसास तो उसे है लेकिन साथ ही यह समझदारी भी जरूरी है कि देश की तमाम संस्थाओं को दुरूस्त करना होगा। किसी भी सामाजिक टकराव की स्थिति में संस्थाओं के बगैर न तो विश्वसनीय मध्यस्थता मुमकिन है और न ही कोई ताकतवर ही देश को शासित कर पाएगा। साझा संस्थागत सुधारों की प्रतिबद्धता के बगैर विपक्षी एकता भी कायम नहीं रह पाएगी क्योंकि उसे राज्यसत्ता के मनमाने इस्तेमाल से तोड़ना हमेशा आसान होगा।

-नरेंद्र देवांगन-

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