हल्द्वानी में खुलेगी प्रदेश की पहली ऑर्गेनिक मंडी

उत्तराखंड के ऑर्गेनिक उत्पादों को बाज़ार दिलाने के लिए सरकार ऑर्गेनिक मंडी और ऑर्गेनिक स्टोर खोलने जा रही है

जिन लोगों को ये खेती करनी है उन किसानों की ट्रेनिंग के लिए सरकार के पास कोई मॉडल नहीं है।

हल्द्वानी। प्रदेश सरकार उत्तराखंड के ऑर्गेनिक उत्पादों को भारत के बाज़ारों में पहुंचाने के लिए विशेष तरह की मंडी और क्रय केंद्र खोलने जा रही है। कृषि मंत्री सुबोध उनियाल के मुताबिक हल्द्वानी में ऑर्गेनिक मंडी खोली जाएगी। जहां से पहाड़ के ऑर्गेनिक उत्पादों को बाज़ार मिल सकेगा। कृषि मंत्री के मुताबिक पहाड़ में साग, सब्जियों से लेकर फल और फूल तक का उत्पादन ऑर्गेनिक विधि से होता है इसलिए इन्हें मंडी दिलाई जाएगी। मंडी विपणन बोर्ड के अध्यक्ष गजराज बिष्ट ने हल्द्वानी में मंडी खोलने का प्रस्ताव सरकार को भेजा था जिस पर मंत्रालय के स्तर पर मंजूरी मिल गई है।

चुनौती

सरकार मंडी खोलने की तो बात कर रही है। सरकारी स्तर पर उत्तराखंड को ऑर्गेनिक स्टेट बनाने की बातें भी जोर-शोर से हो रही हैं लेकिन जिन लोगों को ये खेती करनी है उन किसानों की ट्रेनिंग के लिए सरकार के पास कोई मॉडल नहीं है। उत्तराखंड में पहाड़ के इन सीढ़ीनुमा खेतों से लेकर तराई के मैदान तक सरकार ऑर्गेनिक खेती के सपने देख रही है।

सरकार का दावा है कि प्रदेश में कई लाख एकड़ में ऑर्गेनिक फार्मिंग हो रही है लेकिन हैरानी की बात यह है कि इस ऑर्गेनिक फार्मिंग के लिए सरकार के पास न तो पर्याप्त ट्रेनर हैं और न ही वर्तमान में मौजूद ट्रेनर्स को सम्मानजनक पैसा मिल रहा है। इसकी वजह से किसानों को ऑर्गेनिक खेती से जुड़ी जानकारी भी नहीं मिल रही और सरकार के ऑर्गेनिक स्टेट वाले सपने पर भी ब्रेक लग रहा है।

ट्रेनिंग का यह है हाल

प्रदेश के 95 ब्लॉकों में पिछले 15 साल के एक-एक ऑर्गेनिक ट्रेनर रखे गए हैं लेकिन इन्हें सरकार साल भर में 11 महीने का मानदेय देती है। यह मानदेय सात हज़ार रुपये है।  हैरानी की बात देखिए इन्हीं  ट्रेनर्स के भरोसे सरकार के कृषि मंत्री सुबोध उनियाल ऑर्गेनिक स्टेट का दावा कर रहे हैं।

उनियाल के मुताबिक इस समय देश में जितनी ऑर्गेनिक खेती हो रही है उसकी पचास फीसदी से ज्यादा खेती उत्तराखंड हो रही है। सरकार ने ऑर्गेनिक खेती का टारगेट सैट किया है और सीडीओ को इस टारगेट को पूरा करने की जिम्मेदारी दी गई है।

कृषि मंत्री के मुताबिक तीन साल पहले जहां एक लाख एकड़ जमीन पर ऑर्गेनिक खेती हो रही थी वो आज बढ़ते-बढ़ते साढ़े चार लाख एकड़ तक पहुंच गई है। हालांकि वह मानते हैं कि ऑर्गेनिक बोर्ड में बहुत कुछ सुधार की गुंजाइश है जिससे उत्पादों को तेज़ी से पहचान दिलाई जा सके।

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