सियासी नूराकुश्ती से बिगड़ती जा रही है स्थिति

एनआरसी के मुद्दे पर तृणमूल कांग्रेस नेत्राी और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्राी ममता बनर्जी और उनकी पार्टी के लोग सबसे ज्यादा मुखर हैं। कांग्रेस और अन्य समर्थक दल भी इस मुद्दे पर बीजेपी को घेरने की कवायद कर रहे हैं। सम्पूर्ण विपक्ष चाहता है कि सरकार मानवीय रुख अपनाए लेकिन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह चाहते हैं कि घुसपैठियों पर विपक्ष अपना रुख स्पष्ट करे। श्री शाह ने राज्यसभा में राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर मसौदे को जायज ठहराते हुए कहा है कि घुसपैठियों की पहचान जरूरी थी, इसलिए यह ड्राफ्ट लाया गया है।
दरअसल, घुसपैठियों की पहचान करने की हिम्मत आज तक किसी सरकार ने नहीं दिखाई पर आज ऐसी सरकार है जो हिम्मत दिखाते हुए घुसपैठियों की पहचान कर रही है। यह कौन नहीं जानता कि एनआरसी तो कांग्रेस ही ले आई है लेकिन उसे ईमानदारीपूर्वक लागू नहीं कर सकी। आखिर वह बंगलादेशी घुसपैठियों को क्यों बचाना चाहती है?
केंद्रीय स्वास्थ्य राज्यमंत्राी अश्विनी चैबे ने दो टूक कहा कि एनआरसी को अब बिहार में भी अपना काम शुरू करना चाहिए क्योंकि जो भारत का नागरिक है, सिर्फ उसी को इस देश में रहना चाहिए और अन्य घुसपैठियों को देश की सीमा से बाहर कर देना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट कहा कि बंगलादेशियों ने देश को बहुत ज्यादा प्रभावित करने का प्रयास किया है।

बता दें कि बंगलादेशियों के देश में बे-रोकटोक घुसपैठ के कारण सीमावर्ती जिले मुस्लिम बहुल हो गए हैं। इससे सम्बन्धित प्रांतों का जनसंख्या संतुलन भी बिगड़ गया है। एक दशक पहले असम के पूर्व राज्यपाल अजय सिंह ने केंद्र सरकार को सौंपी एक रिपोर्ट में स्पष्ट किया था कि हर दिन छह हजार बंगलादेशी देश में घुसपैठ करते हैं।
दूसरी तरफ संयुक्त राष्ट्र की एक तब की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछली जनगणना में बांग्लादेश से एक करोड़ लोग गायब हैं। इन घुसपैठियों के चोरी, लूटपाट, डकैती, हथियार एवं पशु तस्करी, जाली नोट एवं नशीली दवाओं के कारोबार जैसी आपराधिक गतिविधियों में शामिल होने के कारण कानून व्यवस्था पर भी गंभीर खतरा पैदा हो गया है। इसके अलावा बंगलादेशी घुसपैठ आतंकवादी संगठनों एवं पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई की गतिविधियों के लिए एक हथियार के रूप में उभरकर देश की सुरक्षा के समक्ष खतरा पैदा कर रहे हैं।
याद दिला दें कि तत्कालीन केन्द्रीय गृह राज्यमंत्राी श्रीप्रकाश जायसवाल ने भी डेढ़ करोड़ बंगलादेशियों का घुसपैठ की बात स्वीकार की थी। इसके अलावा, वैध तरीके से वीजा लेकर आए करीब 15 लाख बंगलादेशी भी देश में गायब हैं। छह मई 1997 को संसद में दिए एक बयान में तत्कालीन गृह राज्यमंत्राी इंद्रजीत गुप्ता ने भी स्वीकार किया था कि देश में एक करोड़ बंगलादेशी हैं।
इस बात में कोई दो राय नहीं कि घुसपैठ आज देश की सबसे बड़ी समस्या बन चुकी है। आलम यह है कि बंगलादेशी यहां अवैध रूप से राशन कार्ड और मतदाता पहचान-पत्रा बनाकर कई विधानसभा और लोकसभा क्षेत्रों में निर्णायक भूमिका निभा रहे हैं जिससे देश की एकता और अखंडता के लिए गंभीर खतरा पैदा हो गया है।
आरोप तो यहां तक लग चुका है कि वोट बैंक की राजनीति के कारण तथाकथित धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक पार्टियां अब देश के मानचित्रा को बदलने की साजिश का हथकंडा बनती जा रही हैं। तभी तो असम के अलावा, पश्चिम बंगाल के 52 विधानसभा क्षेत्रों में 80 लाख और बिहार के 35 विधानसभा क्षेत्रों में 20 लाख बंगलादेशी घुसपैठिए रच-बस चुके हैं। तकरीबन 40 वर्षों से घुसपैठ विरोधी आंदोलन चला रहे लोगों का स्पष्ट कहना है कि ब्रिटेन पूर्वोत्तर क्षेत्रा को मिनी इंग्लैंड बनाना चाहता है, चीन इस क्षेत्रा पर अपना नियंत्राण स्थापित करना चाहता है जबकि बंगलादेश यहां अपने प्रभाव का विस्तार कर इसे ग्रेटर बंगलादेश बनाना चाहता है।

-कमलेश पांडे-

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