आरक्षण में आवश्यक रूप से सुधार होना चाहिए

लोकसभा में राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देने वाले विधेयक के सर्वसम्मति से पारित होने से इसके प्रति सुनिश्चित हुआ जा सकता है कि उसे राज्यसभा में भी विपक्ष का समर्थन मिलेगा लेकिन लोकसभा में इस विधेयक पर चर्चा के दौरान विभिन्न राजनीतिक दलों की ओर से क्रीमी लेयर हटाने और आरक्षण की सीमा बढ़ाने की जो मांग की गई, उससे यही संकेत मिलता है कि आरक्षण संबंधी मांगों का सिलसिला थमने वाला नहीं है। महाराष्ट्र में मराठा समुदाय के संगठन मराठा क्रांति मोर्चा की ओर से मुंबई और आसपास के शहरों में बुलाए गए बंद के दौरान जिस तरह हिंसा का प्रदर्शन किया गया, उससे यही पता चलता है कि आरक्षण के नाम पर अराजकता फैलाने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है।
राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देने वाले विधेयक को दूसरी बार संसद में इसलिए लाना पड़ा क्योंकि पिछली बार राज्यसभा में कुछ विपक्षी दलों ने उसके मूल स्वरूप में बदलाव कर दिया था। उम्मीद है कि इस बार ऐसा नहीं होगा और पिछड़ा वर्ग आयोग जल्द ही संवैधानिक दर्जे से लैस हो जाएगा, ठीक वैसे ही जैसे अनुसूचित जाति- जनजाति आयोग है। यह अजीब है कि जब अन्य पिछड़ा वर्गों के लिए आरक्षण लागू हुए 25 वर्ष पूरे होने जा रहे हैं, तब उससे संबंधित आयोग को संवैधानिक दर्जा देने का रास्ता साफ हो रहा है।
निस्संदेह संवैधानिक दर्जा हासिल करने के बाद पिछड़ा वर्ग आयोग कहीं अधिक सक्षम होगा लेकिन यह कहना कठिन है कि वह आरक्षण संबंधी समस्याओं का समाधान करने में भी समर्थ होगा। विभिन्न जातीय समूह जिस तरह अन्य पिछड़ा वर्ग आरक्षण के दायरे में आने के लिए जोर दे रहे हैं और इस क्रम में धरना-प्रदर्शन भी कर रहे हैं, उससे लगता नहीं कि पिछड़ा वर्ग आयोग और साथ ही केंद्र एवं राज्य सरकारों के लिए कोई आसानी होने जा रही है।
अपने समुदाय के लिए आरक्षण मांग रहे मराठा नेता भली तरह यह जान रहे थे कि उनका आंदोलन हिंसक होता जा रहा है लेकिन वे तब चेते, जब उनके समर्थकों की हिंसा बेकाबू हो गई। इससे संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता कि आरक्षण मांगने निकले मराठा क्रांति मोर्चा ने बंद की अपील वापस ले ली क्योंकि जब तक उसने ऐसा किया, तब तक मुंबई के साथ-साथ अन्य शहरों में बड़े पैमाने पर तोड़फोड़ और आगजनी हो चुकी थी। इससे लाखों लोग प्रभावित हुए और सरकार एवं गैर सरकारी संपत्ति को क्षति भी पहुंची।

किसी समुदाय को आरक्षण देना इतना आसान नहीं है। इसमें कई कानूनी पेचीदगियां हैं। 1992 में इंदिरा साहनी केस, जिसे मंडल निर्णय के रूप में जाना जाता है, में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया था कि संविधान के अनुच्छेद 16 के तहत 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण नहीं दिया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में यह भी कहा था कि कुछ खास परिस्थितियों, जिनमंे देश की विभिन्नता भी शामिल है, रियायत के लायक होंगी। इस रियायत के लिए विशेष सावधानी बरतने का निर्देश भी सुप्रीम कोर्ट ने दिया था।
वर्ष 1993 में तमिलनाडु ने अपने आरक्षण को 69 फीसदी तक बढ़ा दिया। इस दक्षिणी प्रदेश की तत्कालीन सरकार ने तमिलनाडु पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति/जनजाति कानून के अंतर्गत यह बदलाव किया जो नौंवीं अनुसूची के तहत है। यह प्रावधान अदालत की समीक्षा से कानून को बचाता है। महाराष्ट्र में इस वक्त 52 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था है। अब यदि मराठा समुदाय की मांग के मुताबिक उसे 16 फीसदी आरक्षण दिया जाता है तो प्रदेश में यह बढ़कर कुल 68 प्रतिशत हो जाएगा। जाहिर है, ऐसा करने में काफी मुश्किले हैं।
आखिर इसकी अनदेखी कैसे की जा सकती है कि जब पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देकर समर्थ बनाया जा रहा है, तब कई सक्षम मानी जाने वाली जातियां अपने लिए आरक्षण मांग रही हैं। यह एक तथ्य है कि इन दिनों उग्र तरीके से आंदोलन कर रहे मराठा समूह इसके बावजूद आरक्षण चाह रहे हैं कि वे उसकी पात्राता की परिधि में नहीं आते। कुछ ऐसी ही स्थिति आरक्षण के लिए आंदोलन की राह पर चलने वाले अन्य जातीय समूहों की भी है।
उस हिंसा को कौन भूल सकता है जो जाट, पाटीदार, गुर्जर और कापू समुदाय के आरक्षण आंदोलन के दौरान विभिन्न राज्यों में देखने को मिली? भले ही आरक्षण मांगने सड़कों पर उतरे संगठन अपनी गतिविधि को आंदोलन का नाम देते हों लेकिन सच यह है कि इसके बहाने वे अराजकता फैसला कर सरकार पर अनुचित दबाव डालते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि अन्य राजनीतिक दल ऐसे आंदोलनों को हवा देते हैं। आरक्षण के नाम पर रेल एवं सड़क मार्ग ठप्पकर वाहनों में तोड़फोड़ करना और पुलिस को निशाना बनाना अराजकता के अलावा और कुछ नहीं।
गौरतलब है कि मराठा जाति महाराष्ट्र की कृषि प्रधान जाति है जो अभी भी राजनीतिक दबदबा रखती है, जैसे उत्तर भारत में जाट और राजपूत या गुजरात में पटेल रखते हैं। महाराष्ट्र में 52 कुलीन मराठा परिवार हैं जिन्हें विकास की राजनीतिक रोशनी का लाभ मिला है। कृषि की अनिश्चितता, कृषि से होने वाले लाभ में कमी ने मराठा युवकों के मन में सरकारी नौकरियों के प्रति आकर्षण पैदा किया जो काफी हद तक मजबूरी के कारण बना है।
यह लगभग तय है कि जैसे-जैसे चुनाव करीब आते जाएंगे, आरक्षण एवं अन्य मांगों को लेकर सड़कों पर हिंसक तरीके से उतरने वाले संगठनों की संख्या बढ़ती जाएगी। इसमें संशय नहीं कि महाराष्ट्र में प्रभावशाली माने जाने वाले मराठा समुदाय को उकसाने का काम विभिन्न राजनीतिक दल कर रहे हैं। पहले राजनीतिक दल वोटों के लालच में हर किसी की आरक्षण की मांग का समर्थन करने आगे आ जाते थे लेकिन अब वे इसलिए भी आगे आ जाते हैं ताकि सत्तारूढ़ दल को मुश्किल में डाला जा सके। इसीलिए आरक्षण मांगने वाले हिंसा का सहारा लेने में संकोच नहीं करते।
यह तय है कि यदि किसी अन्य जातीय समूह को आरक्षण मिला तो कुछ अन्य जातीय समूह आरक्षण की मांग लेकर आगे आ जाएंगे। इसमें संदेह है कि अन्य पिछड़ा वर्ग आरक्षण का वर्गीकरण करने से बात बनेगी। अच्छा होगा कि आरक्षण की व्यवस्था को ऐसा स्वरूप देने पर विचार हो, जिससे वह पात्रा लोगों को ही मिल सके और उसे सरकारी नौकरी पाने का जरिया भर न माना जाए। अभी तो ऐसा ही अधिक है।
आरक्षण मांग रहे समुदाय ही नहीं, उन्हें समर्थन देने वाले दल भी इस सच्चाई से भलीभांति परिचित हैं कि हर तबके को आरक्षण नहीं मिल सकता और वह उनकी सभी समस्याओं का समाधान नहीं लेकिन वे इस सच को रेखांकित करने को तैयार नहीं। कई बार तो वे नियम-कानून और यहां तक कि अदालती आदेशों के खिलाफ जाकर भी आरक्षण की पैरवी करने लगते हैं।
आरक्षण शोषित-वंचित एवं पिछड़े तबकों के उत्थान का माध्यम है। अच्छा होगा कि अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों के साथ अन्य पिछड़ी जातियों को हासिल आरक्षण व्यवस्था की इस दृष्टि से समीक्षा की जाए कि इससे मूल उद्देश्य की प्राप्ति सही तरह हो रही है या नहीं? इसी के साथ यह देखा जाना चाहिए कि आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को आरक्षण के दायरे में कैसे लाया जाए।

-नरेंद्र देवांगन-

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