शादी के दिन दिव्यांग हुए राजेन्द्र प्रसाद कुकरेती की जीवटता ने बनाया लेखक, मौत को भी दी चुनौती

आसाढ़ माह के आठ गते यानि 22जून 1988 को शादी का शुभ मुहूर्त था, आँगन के एक कोने पर चूल्हे की भट्टी जल रही थी, उधर थोड़ी दूरी पर ओखली में भीगे चावलों को गांव की कुछ महिलायें कूट रही थी, दूसरी तरफ बुजुर्ग महिलाये कूटे हुए चावल को छन्नी से छान रही थी।

इधर गांव के एक बुजुर्ग अरसा बनाने की पाक कला में सिद्ध हस्त थे, गांव के और रिश्तेदारो के बच्चे घर के चौखटों पर औऱ आँगन में सुतली की रस्सी पर रंग बिरंगे तिकोने कागज को पके हुए आटे के गोंद से बंदनवार को लगा रहे थे, दूल्हा भी इधर उधर काम में व्यस्त था। शाम को न्यूतेर थे, तो रिश्तेदार पहुँचने शुरू हो गए। इधर बहु बेटियां गाँव की पानी का प्राकृतिक स्त्रोत जिसे नाव कहते हैं, वँहा से पानी बंठो में भरकर ला रही हैं ,उनके लिये आटे का हलवा उड़द कि दाल और चावल बन रहा है। दूल्हे कि माँ बाहर भीतर कर रही है इधर अरसे बनने शुरू हो गए हैं, पूरे घर मे खुशी का माहौल है, अगले दिन बारात ने जानी है।

माँ ने दूल्हे से कहा कि बेटा पानी घर मे है, यंही नहा लो, शादी के दिन घर से दूर नही जाते है, ग्रह दशाएं कमजोर होते हैं, लेकिन दूल्हा नव युवक उसने इन बातों पर ध्यान नही दिया और कहा कि माँ फिक्र मत करो मैं अभी नीचे नहाकर आता हूँ। दूल्हा नहाने नीचे नाव में चला गया वँहा देखा तो पानी नही था, क्योकि सब पानी ऊपर गाँव मे महिलाये ले गयी थी। दूल्हे ने सोचा कि चलो ये पानी तो मेरी ही शादी के लिये गया है, लेकिन नहाकर तो जाना ही है, शाम को मेहमान आएंगे तो क्या सोचेगे।

दूल्हा आगे गदेरे में पहुंच गया, वँहा पर गाँव के अन्य बच्चे भी नहा रहे थे, दूल्हे के भांजा भी वंही नहा रहा था, भांजे ने कहा मामा आप भी नहा लो साथ ही ऊपर घर चलेंगे, मामा ने कहा तुम नहाओ मैं जरा रास्ता बना कर आता हूँ, क्योकि एक जगह पर रास्ता टूटा हुआ था तो उसने सोचा कि लोग इस रास्ते से आते हैं पानी ले जाते हुए गिर गए तो मुसीबत हो जाएगी, वह रास्ता बनाने लगा, तब तक भांजा और अन्य बच्चे घर चले गये, दूल्हा ने रास्ता बना लिया नहाने आया और वापिस जाने लगा, जँहा पर रास्ता बनाया था वँहा पर ऊँन्हे लगा कि पीछे से आवाज आई कि यँहा पर एक पत्थर रख देता तो अच्छा था, जैसे ही वह पीछे मुड़ा और संतुलन खो बैठा, सीधे नीचे खाई में गिर गया जब नीचे रुका तो देखा कि खाई में गिर गया हूँ जैसे ही उठने की कोशिश की और वह बेहोश हो गया, उसके बाद उसे क्या हुआ कुछ होश नही था।

जब अस्पताल ले गए वहां होश आया तो पता चला कि उसके सारे तंत्रिका तंत्र फेल हो गए है। उसको बाद में परिवार के लोगो ने बताया कि जब वह खाई में गिर गया तो गाँव के पशु पालक अपनी गायों को चुगाने के लिये और पानी पिलाने के लिये उसी गदेरे में ला रहे हैं, उसमे से किसी की नजर दूल्हे पर पड़ गयी जो बेहोशी के हालात में था, गाँव में खबर भिजवाई लोग चारपाई में लेकर गए, घर मे जँहा खुशियों का वातावरण था वह गमगीन माहौल में बदल गया। जँहा अगले दिन दुल्हन लेने बारात ने जाना था वंही अब दूल्हे को अस्पताल ले जाने की तैयारी शुरू हो गयी।

बहुत सारे लोग अस्पताल में ले गए, कभी उम्मीदों की किरण जग उठती कभी बुझ जाती, घर की हालात माली हो गयी, दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में 8 साल तक रहे, लेकिन स्थिति में जब सुधार नहीं आया तो आखिर एक दिन उसने अपनी माँ को कहा कि मुझे घर ले चलो, अगर मरना ही होगा तो अपने निवास पर ही अपना प्राण त्याग दूंगा।
कभी आशा कभी निराशा यह भाव थे। अब समय था गांव लौटने का, धीरे धीरे स्मरण शक्ति वापस आ रही थी, पर अधिक सुधार न हुआ, सूर्य की किरण भी पीली नजर आ रही थी। दिन निकलते गए और एक दिन वह अप्रैल के महीने में खिसकते खिसकते बाहर आँगन में धूप में आ गया दिन भर धूप में रहा तो शरीर मे हलचल सी होने लगी। पूरी जेठ की तपती धूप की गर्मी में रहा और सूर्य की किरणों से शरीर क्रियाशील होने लगा, सूर्य की तपिश से हाथ पैर हिलने डुलने लगे।

एक दिन जब गाँव मे सब महिलाये पुरुष जवाहर रोजगार की ध्याडी करने चले गए तो गाँव मे कोई नही था, उनके मन मे अनेको ख्याल आने लगे कि मेरा शरीर सही होता तो मैं भी ध्याडी करता मन मे निराशा के भाव उपजने लगे, लेकिन फिर सोचा कि निराश जिंदगी से कुछ हासिल होने वाला नही है, तब उन्होंने कलम और कॉपी निकाली लिखने लगे, केवल मन को बहलाने के लिये, उसके बाद कभी कभी कविताये, लेख, मन की पीड़ा लिखने लगे। स्कूल के बच्चों के लिए 15 अगस्त 26 जनवरी के लिए कविता भाषण लिखकर दे देते, जब बच्चे स्कूल में सुनाते तो सब लोग तालियां बजाते और बच्चो से पूछते कि किसने लिखा है तब वह उनका नाम लेते, इस तरह से उनको लिखने का शौक बढ़ता गया।
आखिर एक दिन उत्तराखंड संस्कृति विभाग ने उनकी फ्यूली गढवाली काव्य, नीति के व्यंग हिंदी का प्रकाशन हुआ। आज भी उनकी अनेको रचनाएं अप्रकाशित है।
उपरोक्त लिखी बाते कोई पर्दे पर चलने वाले नाटक की कथावस्तु नही बल्कि एक हकीकत कहानी है, यह जानकारी मुझे मेरे मित्र सुदीप कपरवान से प्राप्त हुई फिर मैंने इस व्यक्ति से बात की तो उन्होंने मुझे अपनी जीवन गाथा दूरभाष पर बताई।

यह हकीकत वाकया जिला पौड़ी गढ़वाल के यमकेश्वर ब्लॉक के अंर्तगत ग्राम सभा मागथा, पट्टी मल्ला उदयपुर निवासी राजेन्द्र प्रसाद कुकरेती की है। उन्होंने उपरोक्त घटना के अतिरिक्तअपने बारे में यह भी बताया कि मेरा जन्म 1957 में मागथा गांव में हुआ। दो भाई हैं बड़े भाई दिल्ली में नौकरी करते हैं।

आज मेरी उम्र 60 वर्ष है।।27 वर्ष की उम्र में विवाह के दिन ही उपरोक्त घटना घटी, मैं गर्दन और कमर दोनों खो बैठा। अब मैं
घिसट – घिसट कर अपने छोटे मोटे काम कर लेता हूँ।
जैसा कि उन्होंने बताया कि तब से आज तक किसी भी तरह का रोग नही हुआ और न किसी भी प्रकार की  दवाई आजतक खाई। 32 साल से कहीं चल फिर नही पाता, सहारा लेकर उठ बैठ पाता हूँ।
लेकिन उत्साह वही कि कुछ करने की किसी के लिए कुछ करने की।
सोच यही है कि जीवन लिया है कब तक और किस किस को मजबूरी गिनानी,
जीवन मे कुछ करने का कुछ बनने का हुनर तो बचपन से ही था तो पढाई भी उस समय पूरी की,शिक्षा बीकॉम किया हुआ है। और  तमाम प्रशस्ति पत्र आज भी प्रमाण हैं इस बात के। आज भी स्वयं की डायरियों व किताबों का ढेर लगा हुआ है,लेकिन स्वयं के सिवाय उनको देखने पढ़ने वाला कोई नही है,जब  कभी खुद ही खोल बैठते हैं और और उस समय मे चले जाते हैं। याद करते हैं उस वक्त को जब अपने पुराने घर मे जो गांव से अलग था वहां जंगली मुर्गे,चिड़ियाएं,हिरन, घवीड सभी दोस्त बन गए थे, चारों तरफ इन्ही जीवों का बसेरा रहता था।

खैर समय बीतता गया राजेन्द्र आज चल फिर नही पाते हैं, रोटी खिलाने वाली छोटे भाई देवेंद्र प्रसाद की वधू है राजेन्द्र कहते हैं कि मुझको मेरी माँ के रूप में भाई वधु सेवा कर रही है।
बताते हैं कि कभी भी भाई को या बहु को किसी प्रकार की परेशानी नही हुई है। उन्होंने खुश मन से मेरी 32 साल से देखभाल की है।

आज 1000 रुपये पेंशन जो समाज कल्याण विभाग के द्वारा मिलती है यही एकमात्र गुजारे का जरिया है।जैसे तैसे करके गुजारा चल रहा है।

गांव के अन्य असहाय लोग जो कि  पढ़ लिख नही पाते उनकी पत्राचार में मदद करते हैं। ऐसे ही विभिन्न गांवों के 15 से अधिक लोगों की वृद्धा वस्था पेंशन लगवाने में  कागजी कार्यवाही में इन्होंने मदद की।
समस्त समस्याओं के निवारण के लिए पत्र ब्यवहार विभागों से करते रहते हैं जिसके परिणाम स्वरूप समस्या का निदान भी हो जाता है।
32 वर्षों से खाट में पड़े हुए हैं लेकिन काम वह कर दिए जो किसी कल्पना से भी परे है।आज भी कई लोग अंतिम उम्मीद लेकर इनके पास आते हैं,और यहां मिलता है उनको समाधान।

राजेन्द्र ने ग्रामीण जगेश चन्द्र, और जगदीष प्रसाद जिनकी उम्र 88 वर्ष है के साथ मिलकर मुख्य सड़क से अपने गांव तक वृक्षारोपण का कार्य किया,जो पेड़ आज भी जीवित हैं,एक मांग इनकी यह है कि इन पेड़ों को बचाने का कोई समाधान जैसे ट्री गार्ड की ब्यवस्था कहीं से हो जाये।।
जगदीष प्रसाद का राजेन्द्र को आज भी सामाजिक कार्यों में प्राकृतिक,संस्कृति, शब्द साहित्य बचाने में सहयोग हमेशा मिलता रहता है। यह दोनों कभी जब समय मिलता है बैठते हैं बातें करते हैं।
इनकी गढ़वाली बोली भाषा को बचाने के लिए हमेशा मन मे एक कोशिस रहती है। 2012 में ‘नीति के व्यंग’ रचित पुस्तक बहुत प्रसिद्ध हुयी।

‘बेचारा रूपया’ व्यंग्य के लिए उत्तराखण्ड के हैडिल विभाग से सम्मान भी मिला। शारीरिक अक्षमता, धन के अभाव और किसी का सहयोग न होने के कारण इनकी तमाम पुस्तकें  प्रकाशन नही हो पायीं हैं।
राजेन्द्र आज भी प्राइमरी से हाई स्कूल के बच्चों को निशुल्क ट्यूशन पढ़ाते हैं। राजेन्द्र का जीवन समाज सेवा में बीता है।

स्वयं शारीरिक रूप से कमजोर हैं लेकिन मन की दृढ़ इच्छा ऐसी कि जन सेवा के लिए हमेशा आगे रहते हैं। गढ़वाली से हिंदी शब्दकोश की रचना भी  राजेन्द्र द्वारा की गई है जो कि धन के अभाव में छप नही पायी है।
इसके अलावा -श्रद्धा सुमन,बिखरयां पन्ना,तीन फूल,व्यंग् बहार रचनाएं प्रकाशित नही हो पाई हैं। आज जरूरत है इनको तो मदद की जो इनकी पुस्तकों का प्रकाशन कर सके।

कुकरेती जी की पलायन, पहाड़ के रीति रिवाजों पर अपनी कविताये लिखी हैं, जो उन्होंने मुझे फोन के माध्यम से सुनाई है।
अपनी किताब फ्योंली का परिचय कुछ इस तरह लिखा है:

यी किताब मा जैक नाम छ फ्यूंली
म्यार पहाड़ क म्यार गढ़वाल जीवन छ तुमन बोली
या किताब जैक नाम छ फ़यौली
या याद दिलान्द तुम तै संस्कृति
रीति रिवाज बार त्यौहार गौ गुठयार, जै तै ग्याव तूम भूली।

ऐसे ही वो पलायन की पीड़ा पर लिखते हैं:
पलायन कू दर्द मेरी छाती मा हूँणु छ,
यूँ दानी आँखयूं मा खैरी सागर मड़राणा छ।
वंही दूसरी ओर वह चौक और गुठयार कि रोचक वार्ता कुछ इस तरह लिखते हैं:

गुठयार तै सुनताळ देखी चौक तै हँस
चौक ब्वाल भाई गुठयार कख गीन
त्यार गुठयार खूंटा पर बंध्या गौड़ी बाछी भैंस।।

गुठयार न ब्वाल कि: –
अब चौक कुन बुल्दू गुठयार
अब तू बता दगड्या चौक म्यार
कख गीन नौनी नौंन
जौन तेरी जिकुड़ी मा ग्वे लगेंन
अंगुली पकड़ी कन हिटण सीखैन।।

हाल ही में पौड़ी के एक कार्यक्रम में सक्षम संस्था जो कि दिव्यांगो के लिए कार्य करती है सक्षम के प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर के पदाधिकारियों ने श्री राजेन्द्र कुकरेती को सम्मानित किया एवम उनका उत्साहवर्धन किया,कार्यक्रम में सक्षम के आनंद जी ने कहा कि राजेन्द्र सम्पूर्ण समाज के लिए एक मिशाल एवम प्रेणना के स्रोत हैं।
श्री राजेन्द्र प्रसाद कुकरेती की जीवटता उन सभी लोगो के लिये प्रेरणा है जो जीवन से उदास होकर नकारात्मक सोचने लगते हैं। बहुत जल्दी ही हमारी श्री राजेन्द्र प्रसाद जी से मुलाकात होगी। यदि कोई भी व्यक्ति या संस्था श्री राजेन्द्र कुकरेती जी की मदद करना चाहते है तो वह इस नम्बर से राजेन्द्र कुकरेती से सम्पर्क कर सकते है- 8057788040

हरीश कंडवाल मनखी की कलम से….

Loading...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *