आधी रात जब पूर्वा एक्सप्रेस रेल हादसे में पटरी से पलटे 10 डिब्बे, नई तकनीक ने बचाई सभी यात्रियों की जान

कल एक बड़ा हादसा सामने आया जहाँ हावड़ा से नई दिल्ली जा रही पूर्वा एक्सप्रेस देर रात रूमा यार्ड में डीरेल होकर पटरी से निचे आ गई और पूर्वा एक्सप्रेस के 10 डिब्बे निचे आ गए। यह हादसा देर रात 1 बजे करीब जब सभी यात्री गहरी नीदं में थे तो अचानक से एक तेज धमाका हुआ और पूर्वा एक्सप्रेस के कोच निचे आ गए। डब्बों के पटरी से निचे आते ही चरों तरफ अफरा-तफरी मच गई लोग बहुत घबराये हुए थे। किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या क्या है, लेकिन इस हादसे में एक ही बात अच्छी रही कि एक भी यात्री की जान नहीं गई, मात्र 5 लोगों को थोड़ी बहुत चोट आई।

इस ट्रेन में 2015 में लगे LHB (लिंक हॉफमैन बुश) कोच इन यात्रियों की जान के सुरक्षा कवच बने। यही वजह रही कि 127 किमी प्रति घंटे की रफ्तार के बीच डिब्बे पलटने के बावजूद हल्की फुल्की चोटें ही यात्रियों को आईं। लेकिन ये हादसा दिल दहला देने वाला था। अस्पताल में भर्ती होने की नौबत महज पांच यात्रियों को आई। इसमें से चार यात्री इलाज के बाद शनिवार शाम को डिस्चार्ज कर दिए गए। अगर इस ट्रेन में एलएचबी कोच न होते तो बड़ी संख्या में यात्रियों की जान जा सकती थीं।

जिस तरह से रूमा में 127 किमी प्रति घंटे की स्पीड से ट्रेन के कोच पलटे हैं, वह बेहद भयावह स्थिति की ओर इशारा करते हैं। 30 नवंबर 2016 को पुखरायां में इंदौर-पटना एक्सप्रेस भी इसी तरह से डीरेल हुई थी। उसमें एचएलबी कोच न होने से उसकी बोगियां एक दूसरे पर चढ़ गई थीं। उस हादसे में 152 यात्रियों की मौत हुईं थीं और 300 से अधिक घायल हुए थे। पूर्वा एक्सप्रेस ताश के पत्तों की तरह बिखरी हुई पड़ी थी। 23 अगस्त 2017 की रात को औरैया में कैफियात एक्सप्रेस के डीरेलमेंट में भी एलएचबी कोचों ने यात्रियों की जान बचाई थी। एलएचबी कोच स्टेनलेस स्टील और एल्युमीनियम की मिश्रित धातु से बनते हैं।

Loading...

इनमें एडवांस पेन्युमेटिक डिस्क ब्रेक सिस्टम होता है। इसके अलावा सेंट्रल बफलर कपलर्स (CBC) से कोच एक दूसरे से जुड़े होते हैं। इससे यह पूरी तरह शॉकप्रूफ होते हैं। किसी भी हादसे में यात्रियों को झटके नहीं लगते और डिब्बे एक दूसरे पर नहीं चढ़ते बल्कि अलग हो जाते हैं। एयर शॉकर होने से तेज गति में चलने पर भी यात्रियों को ट्रेन की गति का अंदाजा नहीं होता।

शताब्दी, राजधानी एक्सप्रेस जैसी ट्रेनों में एलएचबी बोगियां लगाई गई थीं। इसके बाद रेलवे ने सुरक्षा के मद्देनजर सभी ट्रेनों को 2017 के अंत तक आईसीएफ बोगियों के जगह एलएचबी बोगियों से लैस करने का लक्ष्य रखा था। इस समय करीब सात हजार एलएचबी बोगियां ट्रेनों में लगी हैं। कानपुर से दिल्ली जाने वाली श्रम शक्ति भी एलएचबी बोगियों वाली है। जर्मनी में बनी इस तकनीक को रेलवे ने खरीदा और अब यह बोगियां कपूरथला में बन रही हैं। अभी भी करीब 55 हजार पुरानी आईसीएफ बोगियां ट्रेनों में लगी हैं। एलएचबी बोगियों को 120  किमी प्रति घंटा की रफ्तार से चलने वाली ट्रेनों में लगाया जा सकता है। जबकि आईसीएफ बोगियों के लिए ट्रेनों की औसत स्पीड 80 से 90 किमी प्रति घंटा की है।

Loading...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *