यमकेश्वर क्षेत्र के विकास हेतु सदैव तत्पर रहने वाली राजनेता व सामाजिक कार्यकर्ता ‘डॉ मीरा रतूड़ी’

जीवन में संघर्ष हो और उस संघर्ष से हार मान ली जाये तो समझिये आप हमेशा के लिए हार गए हैं, लेकिन संघर्ष को चुनौती के रूप में स्वीकार कर ले तो वही हार जीत के रूप में समाज के मंच पर फूलों का हार बन जाती है। बचपन से कामरेड परिवार से नाता, फिर युवा अवस्था में राजनीति की धूरी कांग्रेस से नजदीकी और फिर शादी के बाद राष्ट्रीय स्वयं सेवक परिवार से नाता, और राजनीति में जब हाथ आजमाया तो कमल ने आगे बढने का साहस दिखाया, पहला चुनाव ब्लॉक प्रमुख 01 वोट से हारना और फिर दो बार लगातार जिला पंचायत सदस्य। राजनीति के सफर में जब बढते कदमताल आगे बढ रहे थे तब 2011 में काल चक्र ने अपने चक्र में जकड़ उनके पति को सदैव के लिए यादों का सितारा बना दिया। समाज और क्षेत्र के प्रति लगाव ने उन्हें दुख से उभरने के लिए पुनः कर्मस्थली की ओर ढकेल दिया, आज यही महिला क्षेत्रीय महिलाओं के दिलों में राज करती है, और उनके लिए प्रेरणा के रूप में उभर कर सामने आयी है, आज इण्डिया टाइम्स ग्रुप उसी महिला का साक्षात्कार आपके लिए ले कर आया है। यह महिला कोई और नहीं बल्कि यमकेश्वर विकासखण्ड में एक ऐसा राजनीतिक और सामाजिक चेहरा बन गया है जो पूरी यमकेश्वर में अपनी पैठ बना चुकी है। निवर्तमान पंचायत सदस्य गुमाल गांव यमकेश्वर की डॉ मीरा रतूड़ी से  इण्डिया टाइम्स ग्रुप के संपादक अमित अमोली के साथ हुई बातचीत के कुछ अंशः-

नमस्कार। आपको सबसे पहले आपकी पसंदीदा जिला पंचायत उमरोली सीट महिला सामान्य होने पर बधाई।
जी धन्यवाद। यह तो संवैधानिक प्रक्रिया है, और मेरे लिए यह गौरवान्वित पल है कि यह सीट महिला सामान्य सीट हो गयी है, यह यमकेश्वर की हर महिला के लिए गौरव का पल है। वैसे तो मेरे लिये यमकेश्वर की तीनों सीट पसंदीदा है, लेकिन उमरोली जिला पंचायत सीट के कुछ कार्य जो पिछले कार्यकाल में नही कर पाई हूँ उन्हें पूर्ण करने का इरादा है।

आपकी पारिवारिक पृष्ठभूमि किस तरह की रही है।
मेरा जन्म ग्रामीण परिवेश में सन् 1970 में जिला पौड़ी गढवाल के कोट ब्लॉक के रणाकोट गॉव में हुआ। मेरे पिताजी स्व0 सुन्दर लाल ध्यानी और माता जी श्रीमती लक्ष्मी देवी हैं। हम चार भाई बहनों में मैं दूसरी संतान हूँ। मैंने सबदरखाल इण्टर कॉलेज से 12वीं और उसके बाद ग्रेजुएशन और फिर पोस्ट ग्रेजुएशन उसके बाद पत्रकारिता में बी0जे0 और एम0 जे0 किया। उसके बाद 2014 में पत्रकारिता विषय में पीएचडी पूर्ण की। मेरे पिताजी कामरेड और उस जमाने में प्रधान थे। प्रधान पद की बड़ी गरिमा होती थी हर कोई आकर प्रधान जी प्रधान जी कहते, तब बडा फक्र होता था। उसके बाद मेरी दिसम्बर 1994 में यमकेश्वर प्रखण्ड के जिया दमराडा में रतूड़ी परिवार में शादी हो गयी। मेरे पति श्री विनय रतूड़ी थे जिनका साल 2011 में देहान्त हो गया और उस समय मेरी बेटी मात्र चार माह की थी, तब मेरे ऊपर पूरी जिम्मेदारी आ गयी।

उत्तराखण्ड के पहाड़ी क्षेत्र में एक महिला का राजनीति में प्रवेश करने का मतलब रूड़ियों को तोड़ना है, आपने तो पत्रकारिता विषय में पीएचडी की है फिर आपने राजनीति जैसे क्षेत्र में कदम रखने के बारे में ही क्यों सोचा?
मैं पहले से ही राजनीतिक पृष्ठभूमि से रही हूं मेरे पिताजी कामरेड़ और उस जमाने में प्रधान थे। साथ ही मेरे पिताजी एक लेखक थे उस दौर में उनने लेख विभिन्न अखबारो और पत्रिकाओं में छपते थे जिसका असर मुझ पर भी पड़ा और मैंने भी पत्रकारिता के क्षेत्र में जाने का निर्णय लिया। पत्रकारिता के समय मैंने भी विभिन्न अखबारों में अपने लेख प्रकाशित ही नहीं किये बल्कि काम भी किया। अमर उजाला, दैनिक जागरण, सहारा, हिमालय दर्पण, और युगवाणी पत्रिका में अपनी सेवा दी। आज भी सयुंक्त रूप में मेरा साप्ताहिक अखबार “ग्रामीण पंरपरा” प्रकाशित होता है। मेरे ससुराल में सभी आरएसएस से जुड़े थे, धर में आरएसएस से जुड़े लोगों का आना जाना हुआ तो फिर आरएसएस की पृष्ठभूमि को समझा और राजनीति में पदार्पण के रास्ते खुलते गये।

राजनीति में आपका सबसे पहला अनुभव क्या रहा और किस पद से आपने राजनीति में पदार्पण किया?
जैसे मैंने पहले बताया कि मेरी पारिवारिक पृष्ठ भूमि पहले से ही राजनीतिक रही है। पत्रकारिता में भी रही तो राजनीतिक लोगों से मिलना जुलना स्वाभाविक था। ससुराल में आरएसएस का माहौल था तो पति ने कहा कि अगर आप अपने क्षेत्र के हित में राजनीति को अपना रास्ता बनाना चाहते हो तो यमकेश्वर को अपने प्रयासों से आगे लेकर जाओ। मैनें 2003 में ब्लॉक प्रमुख का चुनाव लड़ा जिसमें मुझे 01 मत से पराजय मिली। उसके बाद 2008 का चुनाव मैनें जिला पंचायत उमरोली सीट से चुनाव लड़ा और क्षेत्रीय जनता ने मुझे भारी मतों से विजय श्री दिलायी। 2011 में पति के आकस्मिक देहान्त के बाद 04 माह की बिटीया को संभालने की जिम्मेदारी मुझ पर आ गयी इस कारण 2011 से 2013 तक मैं क्षेत्र में ना जा सकी जिस कारण क्षेत्र के लोगों की मेरे प्रति नाराजगी थी, और उनका नाराज होना भी जायज था लेकिन मेरी भी परिस्थितियां थी। उसके बाद मैनें यमकेश्वर में ही गुमाल गॉव जिला पंचायत सीट से चुनाव लड़ा और दोबारा जनता ने मेरे कार्यशैली को देखकर पुनः विश्वास जताया और भारी मतों से विजयी बनाया।

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आप पर आरोप है कि आप यमकेश्वर तक ही सीमित रही हैं, जबकि आपकी छवि सामाजिक कार्यकर्ता के साथ नेता के तौर पर भी है। आपने यमकेश्वर क्षेत्र को ही क्यों चुना जबकि आपके पूरे परिवार की राजीनीतिक पृष्ठ भूमि राज्य स्तरीय रही है?
पहली बात यह कि मेरा यमकेश्वर क्षेत्र तक सीमित उन लोगों को नजर आता है जो मेरे पूरे जीवन संघर्ष को नहीं जानते। आपके माध्यम से मैं अवगत करा देती हूँ कि मैंने 2003 से पहले हरिद्वार क्षेत्र में सामाजिक कार्य किये उसके बाद 2003 में ब्लॉक प्रमुख यमकेश्वर का चुनाव लड़ा। उसके बाद 2004-05 मेंं मैं प्रदेश स्तर पर महिला मोर्चा की प्रदेश प्रवक्ता रही, फिर 2007- 09 तक बीजेपी की महिला मोर्चा की प्रदेश मंत्री रही। 2008 में जिला पंचायत उमरोली और 2014 में जिला पंचायत गुमाल गाँव। यमकेश्वर की निवासी होने के कारण मेरी पहली प्राथमिकता यमकेश्वर है और हमेशा रहेगी। इसके साथ ही राजनीति में आने से पूर्व मैंने पत्रकारिता क्षेत्र में कार्य किया जिसमें अमर उजाला, दैनिक जागरण, सहारा, जैसे प्रमुख समाचार पत्रों के माध्यम से सामाजिक और विशेष कर महिला अधिकारों के मुद्दों पर लिखा। इसके साथ ही हिमालय दर्पण, युगवाणी जैसी पत्रिकाओं के लिए लेख लिखे। आज भी मैं ग्रामीण पंरपरा साप्ताहिक पत्र में सहयोगी के रूप में कार्य कर रही हूँ। पत्रकारिता मेंं जुड़े होने से भी मुझे राजनीतिक क्षेत्र में आने के लिए प्रेरणा मिली, क्योकि मैनें वहां से राजनीति को करीब से देखा है। सामाजिक कार्यो में तो मेरी बचपन से ही रूचि रही है, इसलिए हर उस सामाजिक कार्य में रूचि लेती हूँ जो समाज हित में सर्वोपरि हो।

आप पर आरोप है कि आपने जिला पंचायत गुमाल गॉव का बजट उमरोली क्षेत्र में लगाया है। क्या यह सही है?
यह सच है कि मैंने जिला पंचायत गुमाल गॉव क्षेत्र का कुच्छ हिस्सा उमरोली जिला पंचायत में लगाया। लेकिन यह सच नहीं है कि मैंने जिला पंचायत गुमाल गाँव में विकास कार्य नहीं किये। एक जिला पंचायत की हैसियत से मैंने गुमाल गाँव जिला पंचायत में डांडा दमराड़ा के लिए सड़क, भृगुखाल स्कूल के मैदान तक सड़क, डाबर में सड़क, इसके अलावा कई आवश्यक स्थानों में पुश्तों आदि कार्य करवाये। इसी के साथ मैनें भादसी जिला पंचायत के हित में भी कार्य किया और उमरोली में भी सड़क निर्माण के लिए अपने स्तर से बजट दिया। यमकेश्वर की तीनों सीटें अपने क्षेत्र की हैं, किसी भी क्षेत्र का विकास हो, वह यमकेश्वर का विकास है। हर एक नागरिक को अधिकार है कि उसके लिए सड़क की सुविधा हो, उलेला गाँव जो डांडामण्डल जोगियाणा का उप ग्राम हैं वहां के लिए सड़क कटवायी उन लोगों के लिए भी तो सडक की आवश्यकता थी वह भी इस देश के नागरिक हैं।

आप पर दूसरा आरोप है कि आप निवर्तमान जिला पंचायत सदस्य गुमाल गॉव की है तो पुनः फिर वहां से न लड़कर जिला पंचायत उमरोली से दावेदारी कर रही हैं, क्या आपको गुमाल गाँव सीट सुरक्षित नहीं लग रही है?
देखिये यमकेश्वर प्रखण्ड की तीनों सीट मेरे लिए बराबर हैं, मुझे हर जगह से जनता का सहयोग मिलता है। गुमाल गॉव की जनता ना आज मुझसे नाराज है और ना पहले थी। मेरा जिला पंचायत उमरोली से चुनाव लड़ने का मुख्य मकसद यह है कि जब 2008 में मुझे यहाँ की जनता ने आशीर्वाद देकर विजय बनाया था। दो साल तक क्षेत्र में सक्रियता से समाज सेवा की, लेकिन 2011 में पति के अकस्मात देहान्त होने से मैं पूरी तरह टूट गयी थी, जिस कारण मैं दो ढाई साल क्षेत्र में सक्रिय नहीं हो पायी, और वह कर्ज यमकेश्वर और जिला पंचायत उमरोली का मेरे पर है, जिसे मैं अब पूरा करना चाहती हूँ। इसके साथ ही जिला पंचायत उमरोली क्षेत्र में मेरा पहले से बहुत करीबी संबंध रहा है, यहाँ का प्रबु़द्ध नागरिक और मातृ शक्ति का हमेशा समर्थन मिला, मैं एक राजनीतिक महिला कम और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में ज्यादा हूँ। मेरे लिए हर सीट सुरक्षित है, क्योंकि पूरा यमकेश्वर विधानसभा सीट की जनता का सहयोग मेरे साथ है।

 

आप जिला पंचायत उमरोली से चुनाव लड़ने जा रही हैं, आपकी ऐसी क्या खास उपलब्धि हैं जो जनता आप पर विश्वास कर सके?
जैसे कि पहले आपने बताया कि मुझ पर आरोप है कि मैंने जिला पंचायत गुमाल गाँव का बजट उमरोली जिला पंचायत में लगाया। मैं जिला पंचायत गुमाल गाँव की निर्वाचित निवर्तमान सदस्य हूॅं। मैनें जिला पंचायत भादसी में भी काम करवाया, साथ ही द्वारीखाल में आवश्यकता को देखते हुए कीच गॉव के लिए भी सडक बनवायी, मैनें क्षेत्रवाद पर नहीं बल्कि आवश्यकता को ध्यान में रखा। उमरोली जिला पंचायत में मैने ताछला अमोला, आमकाटल के लिए भी जिला पंचायत से बजट पास करवाया, लेकिन कुछ विवादों के कारण वह सड़क नही बन पायी, इसी तरह उलेला और कचुंण्डा, कसाण गॉव मेंं भी सड़क निर्माण करवाया, साथ ही कई सार्वजनिक क्षेत्रों, जैसे मंदिर, खेल मैदान आदि सार्वजनिक स्थानों में शौचालय निर्माण करवाये, यमकेश्वर में टीन शेड, उमरोली, सीला आदि गॉव के लिए कार्य करवाये हैं। भादसी क्षेत्र में भी जुलेड़ी पम्पिग योजना में सहयोग किया। विभिन्न मंदिरों में टीन शेड या सुरक्षा दीवार आदि के लिए सहयोग किया, यह सब प्रयास यमकेश्वर क्षेत्र के लिए किया गया क्योंकि मैं यमकेश्वर में बसती हूँ और मुझमें यमकेश्वर बसता है।

अंतिम सवाल यह कि आप एक महिला हैं, और आज राजनीति में महिलाओं का प्रतिनिधित्व किस प्रकार देखती है, वह भी खासकर जब ग्रामीण परिवेश हो। क्योंकि आज भी महिला प्रधान, क्षेत्र पंचायत या जिला पंचायत होती हैं, लेकिन सारी व्यवस्था उनके पति या परिवार के अन्य पुरुष संभालते हैं।
देखिये आज ग्रामीण हो या शहरी परिवेश, अब महिलायें जागरूक हो गयी हैं, मैं पिछले 20 साल से यमकेश्वर और अन्य क्षेत्रों में सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में सक्रिय हूँ। मैंने महिलाओं के बीच बहुत कार्य किया है, और नजदीकी से देखा है, आज की महिलायें जागरूक हैं अपना कर्त्तव्य और अधिकारों को समझती हैं। संवैधानिक प्रक्रिया होने से महिलाओं को जनप्रतिनिधित्व करने का अवसर मिला है तबसे महिलायें अच्छा कार्य कर रही हैं। वैसे उत्तराखण्ड में अभी महिलाओं को उतना अधिक प्रतिनिधित्व तो नहीं मिला है, लेकिन पहले से ज्यादा सुधार अवश्य हुआ हैं। महिला प्रतिनिधि के होते हुए उनके स्थान पर पति पुत्र के द्वारा कार्य किया जाना वास्तव में सही नहीं है, यह महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने में बाधक है। महिलाओं को भी आवाज उठाने का पूर्ण अधिकार है, और महिलाओं से ज्यादा ग्रामीण क्षेत्र की समस्या को कौन समझ सकता है, क्योंकि वह उस क्षेत्र में सबसे ज्यादा सक्रिय रहती हैं। यमकेश्वर के परिपेक्ष्य में कहूँ तो महिलायें काफी जागरूक हैं और अपने अधिकारों को जानती हैं।

आगामी पंचायत चुनाव में प्रतिनिधित्व करने हेतु अग्रिम शुभकामनायें।
धन्यवाद। अभी तो जब तक नामांकन की प्रक्रिया पूर्ण नहीं होती तब तक मैं एक आम नागरिक हूँ, लेकिन रूझान को देखते हुए प्रतिनिधित्व के लिए अंतिम फैसला लिया जाना अभी वक्त पर निर्भर करेगा। वैसे क्षेत्र की जनता के समर्थन और सहयोग को पक्ष में देखते हुए मन तो बना लिया है।

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