फूलों सी गुलाबो – कहानी (भाग-12)

शिखर को गुलाबो का साथ दुनिया के पार लगने लगा था। जिन पलों को महसूस करके वह बचपन से खुद को गुदगुदाता आ रहा था वे अब प्रत्येक रात्रि में सार्थक होने लगे थें।

विवाह दो दिलों के मिलन का नाम है, ऐसा कहा जाता है किंतु शिखर एवं गुलाबो के लिए गत एक महीने से यह दो देह का मिलन ही था। उनकी अब तक आपस में किसी भी विषय पर बातचीत नहीं हुई थी।

देर रात गुलाबो अपनी सासू माँ के पैर दबाकर (यह इस लिए नहीं क्योंकि सासूँ माँ के पैरों में दर्द था वरन इसलिए क्योंकि यह परम्परा थी।) कमरे में प्रवेश करती, बहुत देर से इंतजार करता शिखर कुछ यूँ उसके अधरों का रस पीने लगता जैसे जन्मों का प्यासा हो। अपने पति से गुलाबो कुछ बातें करना चाहती थी किंतु ऐसा हो ही नहीं पाता।

घंटों वह उसके साथ खेलता रहता, जब निढ़ाल हो जाता, करवट बदलकर सो जाता। रात्रि में यदाकदा कभी आंख खुलती, दोबारा खेलना प्रारम्भ कर देता।

ऐसा नहीं था कि इस खेल में गुलाबो को आनन्द नहीं आ रहा था किंतु इस आनन्द के साथ वह अनजान स्थान पर पति में अपना सबसे प्रिय मित्र भी तलाश रही थी।
कदाचित् नहीं भी तलाश रही थी क्योंकि बातों की पहल उसने कभी अपनी तरफ से की भी नहीं थी। शिखर कभी पहल करता था तो मात्र इतना ही कहता था-
“कितनी देरी कर दी, म्अ कब से उडिकरियो (इंतजार कर रहा हूँ) हूँ।”
वह मात्र इतना ही कहती-
“माँ साहब ने अब सोन्अ क्अ लिय्अ कियो (कहा) म्अ के करती!”

गुलाबो का कहना सही थी था। वह भला सासू माँ के इजाजत देने के पहले कैसे आ सकती थी।

आज गुलाबो को उठने में कुछ मिनटों की देर हो गई थी। शीघ्रता से वह बाहर आई तब तक कमला सकङी गली के लिए प्रस्थान कर चुकी थी। उसने आज न जाने क्यों जाने के पहले गुलाबो को उठाया नहीं था।
अब वह क्या करे? अकेली वह जा नहीं सकती। सासू माँ पहले ही जा चुकी थी। वह असमंजस में थी कि वहाँ बजरंग आ गया। उसे जेठजी से बात करना तो दूर उनकी तरफ झाँकने की भी इजाजत नहीं थी।

बंदिश इतनी गहरी थी कि वह उन्हें भोजन भी नहीं परोस सकती थी। वह रसोई में है और जेठजी आ जाए तो उसे तत्क्षण रोटियाँ बनाकर एक तरफ रखकर बाहर निकल जाना होता था। बजरंग आता अपनी थाली लेता और बाहर निकल जाता।
कमला एवं सासू माँ की अनुपस्थिति में उसे रोटियाँ, सब्जी, मिर्ची, नमक, प्याज एक साथ लेकर जाना होता था। किसी भी वस्तु को भोजन करने के दौरान न वह माँग सकता था और न ही रसोई घर में गुलाबो के सामने प्रवेश कर के ले लकता था।

बजरंग को देखते ही गुलाबो अपने कमरे की तरफ मुङी तो बजरंग ने उसे आवाज लगा दी-
“बिणणी, काई हुयो”
गुलाबो, के पूरे शरीर में झूरझूरी हो गई। वह क्या जवाब दे! उसे यह नहीं समझ में आ रहा था कि उसे सामने से आते देख राह बदल लेने वाला उसका जेठ आज उससे बात कैसे कर रहा है!
उसे दो दिन पहले के कुछ क्षण स्मृति में आये जब वह अपनी ननद राजेश्वरी से दालान में खङी-खङी बात कर रही थी तभी बजरंग ने घर में प्रवेश किया।

उसकी तरफ गुलाबो की पीठ होने से वह पहचान नहीं पाई। बजरंग ने राजेश्वरी तो पुकार कर गुलाबो को इसका अहसास करवाया। वह अक्सर कहता था-
“मैं जनानियों के मुँह नहीं लगता। इस प्रजाति की बुद्धि घुटनों में होती है, यह घुटनों के नीचे रही हुई ही अच्छी है।”

बजरंग के इस रवैये को देखकर सासूँ माँ एवं कमला फूली नहीं समाती थी। कमला सकङी गली जाते समय अपनी सखियों से इतराकर कहती-
“मेरे ये (बजरंग) जनानियों से सिर नहीं खपाते। इन्हें नहीं पसंद औरतों से बात करना। बाईसा (राजेश्वरी) से भी अधिक बात नहीं करते। माँ सा से भी जितना काम हो उतनी ही बात करते हैं।”
सखियाँ चुटकी लेकर कहती-
“तुमसे रात के अंधेरे में बातें करते हैं या काम करते हैं…”
कमला शरमा जाती और विषय बदल देती।

गुलाबो के कानों में फिर से बजरंग का कोमल स्वर गूंजा तब उसकी तंद्रा भंग हुई-
“के बात है बिणणी, थारी जीठानी तन्अ अकेली छोङगी के।”
गुलाबो क्या जवाब दे! वह अपने जेठ के अलग-अलग रुपों को पहचानने का प्रयास कर रही थी। पिछले एक महीने से खङूस का नाना लगने वाला उसका जेठ आज शहद से भी मीठा लग रहा था।

गुलाबो इस बार भी कोई जवाब नहीं दे पाई। गले तक पहले से सरके आंचल को उसने और नीचे कर लिया। वह धरती पर और अधिक जोर देकर जङवत खङी हो गई, मानों हिलेगी डूलेगी तो संतुलन खोकर गिर पङेगी।

बजरंग उसके कुछ करीब आ गया था। अब गुलाबो की साँसें धोंकनी सी चलने लगी थी। न जाने बजरंग के पदचापों के स्वर में कैसा अहसास था कि वह वहीं खङी-खङी रोने लगी। मौन रुदन उसकी बेबसी की कहानी चीख-चीखकर कह रहा था। वह चिल्लाना चाहती थी किंतु उसे अहसास हुआ कि वह गूंगी हो चुकी है। चाहकर भी वह कुछ बोल नहीं पा रही थी।

करीब आकर बजरंग ने यदि उसका हाथ पकङ लिया तो वह क्या करेगी! न जाने कैसे-कैसे ख्याल उसके मन में तैरने लगे। उसने स्वपन देखा था कि जेठ और ससुर से नई दुल्हन को दूर रखने के पीछे यह कारण है कि उनकी घर में आई नई स्त्री पर नियत खराब हो सकती है।

हे ईश्वर ये उजूल-फिजूल बातें कहाँ से उसके दिमाग में आकर नृत्य करने लगी थी।

तभी दालान से हेंडपम्म चलाने का स्वर आया। बजरंग के उसकी तरफ बढ़ते कदम तूफानी गति से बाहर की तरफ मुङ गए। गुलाबो ने राहत की साँस ली। हो सकता है बजरंग किन्ही गलत इरादों के साथ उसके करीब न आ रहा हो, वह सच में उसकी मदद करना चाहता हो। गुलाबो को अपनी मानसिकता पर घिन्न आने लगी।

उसकी सोच किंतु बेबुनियाद भी नहीं थी। उसने अपने गाँव में सुना था कि एक विधवा एवं एक बेरोजगार पति की पत्नी को परिवार के सभी मर्द ही नहीं पङोसी भी देह की तरह इस्तेमाल करते थे।

गुलाबो का जी मचलने लगा। शौच के लिए जाने की भावना अब तक तिरोहित हो चुकी थी। अभी तो उसके लिए नहाने की भी समस्या खङी हो गई थी। घर में कोई स्नान घर तो था नहीं। घर के मर्दों के उठने से पहले उन सब की चौक में बैठकर नहाने की आदत थी। बजंरग को उठा देखकर अब चौक में नहाना उसके लिए असंभव था।

वह लौटकर कमरे में आ गई। बाहर हुई घटनाओं के बाद उसे शिखर बहुत अपना सा लगा। उसने बिना कुछ सोचे शिखर को नींद से उठा दिया और अपनी सम्स्या का समाधान माँग लिया कि वह नहाये कहाँ-
शिखर नींद में था। रात की खुमारी अभी उतरी नहीं थी। कुछ दिन पहले तक अलार्म घङी में गुलाबो के उठने का समय निश्चित करता शिखर आज उसके कहन के बाद भी बेसुध सोया था। उसने एक बार फिर झकझोरा तो उनींदे स्वर में ही बोला-
“कोठे में नहालो। नहाना ही तो है, मेरी नींद क्यों खराब कर रही हो।”

गुलाबो ने छोटे से कमरे में नजरें दौङाई। उसकी तलाश सफल हुई। कोने में उसे एक नाला दिखाई दे गया। घर के पिछवाङे में यह खुलता है, वह यहाँ नहा सकती है। इस विचार ने उसे राहत दी।

वह शीघ्रता से बाहर गई, हेंडपंप के पास रखी बाल्टी में पानी भरकर लाई और अपने कमरे में ही नहाने लगी। तैयार होकर बाहर निकली तो उसके चेहरे पर विजयी मुस्कान थी।
देरी से उठकर भी वह जेठानी के लौटकर आने से पहले तैयार हो चुकी थी। भूल ही गई थी कि शौच की क्रिया को नजरअंदाज करके उसने दिन भर के लिए कितनी बङी आफत मोल ले ली है….

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