फूलों सी गुलाबो – कहानी (भाग-13)

कमला लौटकर आई तब तक गुलाबो चूल्हे में आग जला चुकी थी। बिना घासलेट, केवल सूखे कंडों एवं छङी (बबूल के पेङ की डालिया) की मदद से चूल्हे में आग जलाना पहाङ चढ़ने से कम आसान काम नहीं था। उसके मायके में यही काम घासलेट की मदद से किया जाता था इसलिए आसान हो जाता था।

भगोने में चाय का पानी चढ़ाकर वह गाय दुहने चली गई थी। उसे इस कार्य में बहुत आन्नद आता था। वह नहीं जानती थी कि कार्यों का विभाजन उम्र एवं पद के आधार पर किया जाता है।

कुछ कार्य करने का अधिकार केवल सासू माँ को ही होता है, एवं कुछ कार्य करने का फर्ज बहू को निभाना पङता है। वह जैसे ही नान्या बाँधकर गाय दुहने बैठी वहाँ सासू माँ आ गई। उसे ऐसा करते देख उनका पारा साँतवे आसमान पर पहुँच गया। वे अपने चिरपरिचित अंदाज में चिल्लाने ही वाली थी कि न जाने उनमें किसकी आत्मा ने प्रवेश किया। वे नम्र लहजे में बोली-
“बिणणी उठ, अठे गायाँ बिण्णा कोणी दुव्अ। सासुवाँ ही दुव्अ।”
गुलाबो सकपका गई। इसकी तो उसे जानकारी ही नहीं थी। वह प्रतिदिन कोशिश करती कि उससे कोई गलती नहीं हो किंतु फिर भी कोई न कोई भूल कर ही बैठती। घर के तौर-तरीके सिखाने की जिम्मेदारी कमला पर थी किंतु उसे इसमें कोई रुचि नहीं थी। वह सदैव इसी प्रयास में रहती कि गुलाबो कोई गलती करे और सासू माँ उसे ताने मारे। उसकी यह मुराद अभी तक पूरी नहीं हो पाई थी क्योंकि जिन गलतियों के लिए कमला टनों के भार में उलाहना एवं तानों के वजन से दबती आई थी उन्हीं सब गल्तियों के लिए गुलाबो को उसकी सासू माँ किलो के भार से ही दबाती थी।

कमला का गुलाबो से ईर्ष्या करने की यह सबसे खास वजह थी। सासू माँ के फर्क करने का कारण गुलाबो के मायके से आया दहेज था। सासू माँ के वे अरमान पूरे हुए थे जिनका उसने कभी सपना ही नहीं देखा था। उसने जोधपुरी बंधेज का आज तक केवल नाम ही सुना था।

गुलाबो उसके लिए जो पोशाक आई थी वह जोधपुरी बंधेज की ही थी जो गाँव की सरपंचानी (सरपंच की पत्नी) के पास भी नहीं थी।

ऐसे अनगिणत उपहार थे जिनका वजन गुलाबो की गल्तियों के लिए उनके मुँह से निकलने वाले शब्दों के भार पर पङकर उनकी ताकत कम कर देता था।

गुलाबो कमरे में आकर रोने लगी थी। उसे समझ में ही नहीं आ रहा था कि वह कैसे यहाँ के तौर-तरीको को सीखे।

उसी समय शिखर बाहर से नहाकर आया। उसके बदन पर वस्त्रों के नाम पर मात्र एक तौलिया था। दिन के उजाले में वह पहली बार नंगे बदन गुलाबो के सामने आया था। यूँ तो गुलाबो की इस तरह के वेश में मर्दों को देखने की आदत थी किंतु आज अपने ही पति को ऐसे देखकर वह क्षेंप गई।

वह गर्दन झुकाकर बाहर निकलने लगी तो शिखर ने हाथ पकङकर उसे रोक लिया। तभी उसे अहसास हुआ कि वह रो रही है।

शिखर ने कमरे की कुंडी लगाई, गुलाबो को पलंग पर बैठाया और स्वयं उसके घुटनों पर अपने दोनों हाथ रखकर आँगन में घुटनों के बल बैठ गया।

गुलाबो का ह्रदय काँप उठा। उसे इस घर में अपना दूसरा दिन याद आया जब कान्हा एवं शिखर के साथ पलंग पर बैठ जाने के लिए उसे सासूँ माँ ने लताङा था। वह एक पल के लिए भी यहाँ नहीं रुकना चाहती थी किंतु शिखर का बंधन इतना मजबूत था कि उससे छूटकर उठना उसके लिए असमंभव प्रायः ही था।

शिखर के नर्म स्पर्श के अहसास से वह अपनी भावनाओं को काबू में नहीं रख पाई और फफक-फफक कर रो पङी।

दिन के उजाले में वे मिल रहे थे और वह भी आँसुओं के पहरे में। गुलाबो को यह अच्छा नहीं लग रहा था किंतु वह चाहकर भी अपने आसुँओं को रोक नहीं पा रही थी।

शिखर कुछ देर यूँ ही बैठा रहा। न जाने अचानक से गुलाबो को क्या हुआ कि वह अपना सम्पूर्ण बल लागाकर उठ गई। शिखर कुछ समझ पाता उससे पहले ही उसने अपने स्थान पर शिखर को बैठाया और स्वयं उसके स्थान पर आँगन में बैठ गई।

कदाचित यह प्रक्रिया गुलाबो ने इसलिए की थी कि उसे लगा उसका पति उसके कदमों में बैठा है। पत्नी का स्थान पति के चरणों में होता है, वह भला अपने पति को अपने चरणों में कैसे बैठा सकती थी!

शिखर शायद इतना नहीं सोच पाया। अब उसके घुटनों पर गुलाबो का आँचल से ढका सिर था। शिखर ने सावधानी से गुलाबो का आँचल उसके सिर के ऊपर से उठाया और उसके बालों को सहलाने लगा।

गुलाबो ने आज के पहले इतना सुकून कभी महसूस नहीं किया था। वह इन पलों को आज तक की अपनी जिंदगी के बेहतरीन क्षणों के नाम कर सकती थी। तभी शिखर का मीठा स्वर उसके कान में पङा-
“सुन, सुबह तुने मुझे नहाने की जगह पूछी थी। मैं नींद में था बता ही न पाया। मुझे माफ कर दे।”

आह! इन अंतिम चार शब्दों पर गुलाबो अपनी जिंदगी न्यौछावर कर सकती थी। एक ही पल में शिखर के लिए उसके मन में आज तक उपजे सभी क्रोध के पल कपूर की आग से नदारद हो गए।

उसका शराब पीना, बीङी पीना, रात को उसका देह की तरह इस्तेमाल करना वह सब कुछ इस क्षण में भूल गई थी। शिखर के घुटनों में मध्य गुलाबो ने अपने सिर को फँसाकर दोनों हाथ से उसकी पिंडलियों को कसकर पकङ लिया।
शिखर अभी भी उसके तेल लगे बालों को सहला रहा था जिनसे बनी सुंदर चोटी के बाल अब गर्दन पर यत्र-तत्र बिखर गए थे।
शिखर ने उसी मुद्रा में एक बार फिर कोमल लहजे में पूछा-
“क्या हुआ? रो क्यों रही है? अम्मा ने कुछ कहा!”

गुलाबो का रुदन अब तक सिसकियों में बदल गया था किंतु शिखर के पूछने पर वह एक बार फिर फफक पङी।
उसे मालूम ही नहीं था कि वह क्यों रो रही है? मायके से विदा होकर आने के बाद आज वह पहली बार रोई थी। बीते दिनों में वह चाहकर भी नहीं रो पाई थी क्योंकि उसे ऐसा करने के लिए स्थान ही नहीं मिला था। चौबीस घंटे वह किसी न किसी से घिरी हुई रहती थी।

आज भी वह अकेली नहीं थी किंतु आज शिखर उसे अपना ही एक अंश लग रहा था जिसके सामने वह अपने मन का कर सकती थी।

शिखर ने फिर से रोने का कारण पूछा तो वह वर्तमान में आई।

आज उसकी सास ने उसे इतनी जोर से नहीं डाटा था कि वह रो ही पङे किंतु फिर भी उसने मन की उलझन शिखर को बता दी-
“मुझे समझ ही नहीं आता कि मैं क्या करूँ और क्या न करूँ। बस, इसीलिए मुझे रोना आता है।”
गुलाबो ने इतनी मासूमियत से कहा था कि शिखर खिलखिलाकर हँस पङा। गुलाबो ने क्रोध से भरी अपनी नजरें सिर ऊपर करके शिखर की नजरों से मिलाई तब शिखर का ध्यान अपनी हँसी की तरफ गया।
वह शीघ्रता से बोला-
“बस इतनी सी बात। आज स्अ म्अ तेरो मास्टर।”
रोना भूलकर गुलाबो हँस पङी।
तभी किसी ने दरवाजा खटखटा दिया।

बाहर से आने वाले तूफान का कदाचित् शिखर को अहसास हो गया था इसलिए वह तुरंत चिल्लाकर बोला-
“हे भगवान! न जाने आजकल मेरा दिमाग कहाँ रहता है! मेरी गलती की वजह से तुम्हारा पैर फिसल गया।” कहते हुए उसने फर्श पर थोङा सा सिर में लगाने वाला नारियल का तेल बिखेर दिया और अपने हाथ में गुलाबो का पैर लेकर उस बिखरे तेल पर रगङवा दिया।
तब तक गुलाबो उसके झूठ में सहभागिनी बन चुकी थी। वह फर्श पर कुछ यूँ बैठ गई मानों फिसलकर गिरी है और उठने का प्रयास कर रही है। उसका एक हाथ चोटी में से निकले बालों को ठीक कर रहा था तो दूसरा आँचल को घूंघट में तब्दील करने में लगा था। शिखर दरवाजा खोल चुका था। तूफान सी गति से अम्मा ने प्रवेश किया जो कह रही थी-
“ब्याह हो गया किंतु बचपना नहीं गया। अब भी बच्चों की तरह जमीन पर ढोलकर (गिराकर) तेल लगाव्अ है तू। देख, बिणणी क्अ लाग गी। मरजाणो है मरजाणो।”

शिखर के होठों पर मुस्कान तैर आई थी। दिन दहाङे पत्नी के साथ कमरे में बंद रहने के प्रतिफल में मिलने वाले तानों को उसने सहानुभूति में बदलवा लिया था।

गुलाबो के होठों पर भी मुस्कान थी जिसे परिलक्षित करने के स्थान पर दबाना था और रुँआसा मुँह बनाना था। जिसमें वह पूरी तरह सफल हो गई थी…

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