फूलों सी गुलाबो – कहानी (भाग-10)

शिखर के नजदीक लेटी गुलाबो न जाने कब तक अपने अतीत एवं भविष्य के बीच झुलती रही। पक्षियों के चहचहाहट के खुशनुमा शोर से जब उसकी आँख खुली वह अपनी ननद राजेश्वरी के सामने हाथ जोङकर खङी थी।
उसके चारों तरफ रोशनदान से झाँकती हल्की रोशनी के अतिरिक्त अंधकार फैला हुआ था। उसकी साँस में साँस आई। वह कोई बुरा सपना देख रही थी जो आँख खुलते ही विस्मित हो गया था।
उसकी देह से उसे आग निकलती महसूस हो रही थी। उसने बिस्तर से उठने का प्रयास किया तो पलंग की लकङी की चर्र की आवाज से कमरा गूंज उठा।
आवाज तेज नहीं थी किंतु शिखर की नींद उङाने में पर्याप्त थी। वह करवट लेकर सो रहा था, आँखें खुलते ही गुलाबो की तरफ घूम गया और उसे अपनी कैद में ले लिया।
यह स्पर्श रात जैसा नहीं था। यह वैसा था जैसे उसने सुहागरात के दिन महसूस किया था। न चाहते हुए भी वह उसके आगोश में समाती चली गई।
शिखर कह रहा था-
“गुलाब, कल रात मैं होश में न था। मुझे पूरा याद नहीं है किंतु मैंने तेरे साथ शायद अच्छा व्यवहार ना किया। यह मेरी गलती ना थी, कान्हा भाईजी ने मुझे जबरदस्ती दारू पिला दी। वादा करता हूँ आज के बाद कभी न पीऊंगा।”
शिखर के ये शब्द सुनकर गुलाबो की देह की सम्पूर्ण पीङा पल में ही उङनछू हो गई। रात भर की सभी चिंताएँ जेहन से यूँ उङ गई जैसे नया खिलौना देखते ही बच्चा रोने का कारण भूलकर जोर-जोर से हँसने लगता है।
एक बार फिर ये बाहें सुरक्षा कवच लगने लगी। गुलाबो ने कुछ नहीं कहा किंतु उसका समर्पण बहुत कुछ कह रहा था। अब उसे बहुत गहरी नींद आ रही थी। वह सब कुछ भूलकर कुछ देर सोना चाहती थी किंतु शिखर गहरी नींद से उठा था।

वह गुलाबो के साथ अब समय बीताना चाहता था। कल नशे में जो कर चुका था अब होशोहवाश में करना चाहता था। गुलाबो तन-मन से इसके लिए बिल्कुल तैयार नहीं थी किंतु शिखर का मृदु व्यवहार देखकर उसने तुरंत अपनी नींद उङा दी एवं पीङा को पलंग के कोने पर रखकर शिखर में खो गई।
शिखर उसके रूप की प्रशंसा कर रहा था। वह निहाल हो रही थी। कल रात वह स्वयं को दुनिया की सबसे बदनसीब लङकी मान रही थी किंतु आज उसे स्वयं से खुशनसीब कोई नहीं लग रहा था। शिखर के प्यार भरे कुछ शब्द उसके द्वारा दिये दर्द को गुलाबो के कोमल मन से निकालने में सफल हो गए थे।
शिखर एक बार फिर सो चुका था। दिन निकल आया था। गुलाबो भी कुछ देर सोना चाहती थी किंतु अब उसके लिए यह संभव नहीं था। वह पलंग के कोने पर रखी पीङा की गठरी को पीठ पर लादकर ही वह नीचे उतर पाई।
उसकी कमजोर देह यह पीङा दालान में पङी खाट तक ही सह पाई। वह निढ़ाल होकर वहाँ जाकर पसर गई। उसकी माँ उसी समय शौच से लौटकर आई थी। उन्होंने उसे उठाकर अपने कमरे में भेजा। स्त्री सुलभा लज्जा एवं पति-पत्नी के आपसी शारीरिक सम्बंधों के विषय में माता-पिता द्वारा कोई बातचीत न करने की परम्परा को माँ ने बनाये रखा था। वे जानती थी कि गुलाबो की पीङा का कारण क्या हो सकता है किंतु उन्होंने उससे इस बारे में कोई बात नहीं की। वे उसे निर्देश दे रही थी-
“थोङी देर में कवरँसा उठ जावगा। तू दस मिनट में ऊठकर सँकङी गली जाय्या।”
अर्द्ध नींद में गुलाबो ने सिर हिलाकर अपनी मंजूरी दे दी। पलकों पर नींद हथोङे बजा रही थी किंतु फिर भी गुलाबो निश्चिंत होकर सो नहीं पाई। उसके दिलोदिमाग पर शिखर छाया हुआ था। न जाने वह कब उठ जाए और उसे किस वस्तु की आवश्यकता पङ जाए।

जब से वह यहाँ आई थी उसक मन शिखर के आसपास ही बिखर रहा था। वह अकेला तो नहीं है, उसने भरपेट खाना खाया है न, उसे चाय-पानी तो नहीं चाहिए, गांव में कोई हँसी-मजाक के नाम पर उससे उद्ढंता से तो पेश नहीं आ रहा।

वह उसके साथ न होकर भी उसके आसपास ही थी। बिस्तर पर पङे-पङे टूटी खिङकी से कमरे में प्रवेश करने की कोशिश करती बिलाई (बिल्ली) को देखकर गुलाबो हँस पङी।
एक यह बिल्ली थी जिसे चोरी छिपे घर में प्रवेश करना पङता था। जिस किसी की नजर पङ जाती लात-घूसों से इसका सत्कार करता था।
एक बिल्ली और थी जो सफेद रंग की थी। दिखने में बिल्कुल खरगोश जैसी थी इसलिए कान्हा ने उसका नाम रेबिट निकाल दिया था। वह नाम जो उसने कक्षा आठ में अंग्रेजी की किताब में खरगोश के लिए पढ़ा था। कान्हा को न जाने कैसे खेत में दिख गई थी। वह उसे अपने साथ ले आया था। बङे जतन से उसकी देखभाल करता।
नारायणी के लिए तो अपने भोजन से अधिक उसका ध्यान रखन आवश्यक था। रेबिट कभी-कभी कान्हा के जिस्म में अपने दाँत भी गङा देती, घर में गंदगी कर देती किंतु किसी के चेहरे पर शिकन नहीं आती।
गुलाबो अपनी तुलना सामान्य बिल्ली से एवं शिखर की तुलना रेबिट से करने लगी। उसके मन में एक कहानी चलने लगी जिसमें लङके एवं लङकी का ससुराल घूमने लगा।
लङकी का ससुराल में स्थान सामान्य बिल्ली जैसा होता है। लङके का ससुराल में स्थान रेबिट जैसा होता है। आंख दिखाओ तो भी सब स्नेह और आदर, मटके भर भर कर उङेलते हैं।
लङकी के साथ उसके ससुराल में इससे उलट कहानी है। सब कुछ करते हुए भी उलाहना एवं तिरस्कार ही प्राप्त करती है।

बाहर से शिखर एवं कान्हा की आवाज सुनकर वह तुरंत उठ गई। अपनी विचार धारा पर उसे क्रोध आने लगा। बिल्ली अभी भी खिङकी के भीतर आने का प्रयास कर रही थी। अपना क्रोध उसने उसी पर उतारा। उसके आधे फँसे शरीर को इतनी जोर से खिङकी के बाहर की तरफ धकेला कि वह घर के पिछवाङे में गिरकर कुछ देर तङपती रही, फिर म्याऊँ म्याऊँ के स्वरलहरी के साथ खेतों की तरफ तेज गति से दौङ गई।
गुलाबो कमरे से बाहर निकली तो कान्हा के हाथ में रेबिट थी जिसे वह प्यार से सहला रहा था। अब तक कदाचित् गुलाबो का क्रोध शांत हो गया था क्योंकि उसने भी रेबिट के हाथों पर स्नेह से हाथ फेर दिया था।

वह शिखर के करीब जाकर दूरी बनाकर खङी हो गई। यह जानने के लिए उसे ससुराल में कोई तकलीफ तो नहीं है। वह अपने मायके में ऐशोआराम से थी तो शिखर अपने ससुराल में।

उसे यह सब सोचने का अधिकार नहीं था। वह जान गई थी कि स्त्री की कीमत ससुराल में सामान्य बिल्ली से अधिक नहीं होती।
पुरुष ससुराल में रेबिट जैसा होता है। यदि नोच खाये तो भी सब चारों तरफ जी हुजूरी करते खङे रहते हैं।
कान्हा एवं शिखर बीती रात की मौज-मस्ती को याद करके ठहाके लगाने लगे थे। गुलाबो की माँ को उसे विदाई में दिये जाने वाले उपहारों के कम न होने की चिंता सता रही थी। नारायणी रसोई में आज कितने पकवान बनने वाले थे उनका हिसाब लगा रही थी, गुलाबो, शिखर द्वारा पहने जाने वाले कपङों को दोबारा तह कर रही थी……….
शिखर, ससुराल में था वह अपने साले बाबू के साथ खेतों में घूमने जा चुका था,
घर से निकलते समय कान्हा के स्वर गुलाबो के कान में पङे थे-
कवरँसा, आओ थाण सकङी गली स लौटती सोवणी-सोवणी (सुंदर-सुंदर) छोर्या दिखाऊं…

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