फूलों सी गुलाबो – कहानी (भाग-6)

पायल की झंकार के स्वर मंदिम से तेज होते हुए कान में पङ रहे थे। शिखर उनमें खोया हुआ ही था कि गुलाबो भीतर आ गई। वह सकुचाई-घबराई सी आँगन में कुछ तलाश रही थी। उसकी हङबङाहट देखकर शिखर की हँसी छूट गई।

अगले ही पल उसे अपनी गलती क अहसास हो गया किंतु तब तक बहुत देर हो चुकी थी। गुलाबो को कुछ मिला नहीं किंतु उसकी आँख से आँसू निकल गए जिन्हें छिपाने का वह असंभव प्रयास करने लगी।

शिखर समझ ही नहीं पाया कि क्या हुआ! वह तो उसे तंग करने के इरादे से कुछ इस तरह खङा हुआ था कि हार उसके पीछे छिप जाए। गुलाबो के तलाशी अभियान में जब हार उसे नहीं मिले तो वह शिखर से बात करे। बस, उसी दौरान शिखर उसे आलिंगन में ले ले।
शिखर ने हँसकर पूरा खेल स्वयं ही बिगाङ लिया था। जमीन पर गिरा हार उसने उठाया और बङे प्रेम से रोती हुई गुलाबो के गले में नजाकत से पहना दिया। अब तक गुलाबो ने स्वयं पर नियंत्रण कर लिया था। वह बिना कुछ कहे बाहर जाने लगी तो शिखर ने उसका हाथ पकङ कर उसे रोक लिया।

वह अपना हाथ छुङाने का असफल प्रयास करने लगी किंतु सफल नहीं हो पाई। अभी भी उसकी नजरें झुकी हुई ही थी। थोङा बल प्रयोग करके शिखर ने उसे अपने बाहुपाश में जकङ लिया।

गुलाबो उस घेरे से अपने आप को निकालने का प्रयास कर रही थी किंतु यह प्रयास इतनी ताकत के साथ भी नहीं था कि शिखर को इस घेरे को बनाए रखने के लिए कङी मशक्कत करनी पङे। आज पहली बार उसे ईश्वर द्वारा दिये दो हाथ की सार्थकता समझ में आई थी। वह कई जन्मों तक ऐसे ही रह सकता था। कितना सुकून था इन पलों में।

तभी बाहर से कानफोङू स्वर सुनाई दिया जिसे सुनने का वह आदी था-

“तेरा घर म्अ अ सब चालतो होसी, अठे कोणी चाल्अ। खा-खाकर सांड (मोटी) होगी लेकिन काम रत्ती भर भी कोणी हुव।”
गुलाबो डर से काँपने लगी थी। आवाज का असर कुछ ऐसा था कि अनजाने में शिखर की पकङ कमजोर हो गई थी किंतु गुलाबो ने उससे अलग होने का प्रयास नहीं किया था वरन वह उसके और अधिक करीब आ गई थी।
यह स्वर बजरंग का था। वह अपनी पत्नी कमला से बात कर रहा था। काका के घर में न रहने पर कमला से बात करने का यह उसका चिरपरिचित अंदाज था। ‘उसके बनाये खाने को पसंद न आने पर उसी के मुँह पर फैंक देना’ यह वह अक्सर किया करता था।

तभी एक जोरदार धमाके सा स्वर आया जैसे कुछ भारी वस्तु जमीन पर गिरी हो। शिखर ने गुलाबो को खुद से अलग किया, उसे पलंग पर बैठाया और कहा-
“तू अठे बैठ, म्अ आऊँ। बार्अह (बाहर) मत आजे।”

उसके जवाब की प्रतीक्षा किये बिना वह चीते की फूर्ती से बाहर आ गया। उसे जिसका अंदेशा था बाहर वही हो रहा था। बजरंग ने धक्का मारकर कमला को गिरा दिया था। आँगन में रखी खाट के पाये से उसका सिर टकरा गया था और आँख के ऊपरी भाग से खून छलक आया था।

और कोई दिन होता तो वह भाभी को उनके कमरे में पहुँचाकर, उनके घाव पर मरहम पट्टी करके बाहर निकल जाता किंतु आज वह खुद पर काबू नहीं रख पाया। वह उस भाई के सामने आकर खङा हो गया जिसके द्वारा जोर से आवाज लगा देने पर ही दो वर्ष पहले तक उसकी पेंट गिली हो जाती थी-
“भाईसा, काई चावो हो थे। क्यूँ भोजाईसा क्अ पीछ्अ रेवो। घर में नया लोग आगया है, थोङो तो ध्यान राखो।”

बजरंग भला छोटे भाई के मुँह से इतना कुछ क्यों सुनता! वह भी तब जब अपनी पढ़ाई में वह सबसे बङा रोङा शिखर को ही मानता था। ऊपर से आज पराये घर से आई जनानी के सामने शिखर द्वारा दिखाई दिल्लेरी उसे अपना अपमान लग रही थी।
बजरंग ने आव देखा न ताव झटपट चार-पाँच थप्पङ शिखर के गाल पर रसीद कर दिये। इतने पर भी बजरंग का मन नहीं भरा तो वह पास में रखा हुआ नान्या (गाय का दूहने के समय उसके पिछले पैरों को बाँधने के लिए काम में ली जाने वाली रस्सी जिससे गाय हिलडूल न सके) ले आया। जैसे ही शिखर की पीठ पर उसका वार होने का हुआ कमला बीच में आ गई। उसका एक हाथ अपने सिर के ताजा घाव पर था और दूसरे हाथ से वह शिखर को बचाने का प्रयास कर रही थी।

कमरे के भीतर मौजूद गुलाबो पत्ते सी काँपने लगी थी। ससुर समान जेठ के मुँह से निकली गालियाँ पहले अपनी पत्नी एवं फिर अपने छोटे भाई के लिए स्थानांतरित हो गई थी यह समझने में उसे समय नहीं लगा।

उसके पिता भी जिस दिन शराब पीकर आते थे, उसकी माँ को किसी न किसी बात पर यह कहते हुए पीट देते थे-
“लुगाई क्अ जब तक दो-चार पङ नहीं, बा हाथ क्अ नीच्अ कोणी रेव्अ।”
दिन दहाङे किंतु ऐसा वह आज पहली बार देख रही थी। वह जानती थी उसे बाहर नहीं जाना है किंतु कमरे के भीतर भी वह शांत नहीं बैठ पाई। वह जोर-जोर से रोने लगी। उसके रोने की आवाज सुनकर या उसके वहाँ होने के अहसास से, पता नहीं,
बजरंग रस्सी को फैंककर बाहर निकल गया। उसके जाने के बाद कमला का तेज स्वर घर की चहारदिवारी में गूंज उठा-
“लल्लाजी कितनी बार थाण बोली हूँ, लोग-लुगाई (पति-पत्नी) की राङ (झगङा) म्अ बीच म्अ मत कूद्या करो। जाओ, बिणणीजी न्अ संभालो। बा थाका भाई का लखण (आचरण) देखकर डरगी दिखी।“”

शिखर को अब गुलाबो का अहसास हुआ। वह दौङकर कमरे में गया तो गुलाबो का रो-रोकर बुरा हाल था। विवाह के बाद का पहला दिन ससुराल में कङवी यादों का रूप बन गया था। अभी तो मेहमान ही अपने घरों तक नहीं पहुँचे थे कि घर के बङे बेटे ने अपना रंग दिखा दिया था। आज गुलाबो का भाई उसे पगफेरे के लिए लेने आने वाला है।
गुलाबो को सबसे अधिक चिंता इस बात की ही थी कि अगर उसके सामने भी उसके जेठजी ने ऐसे ही नाटक किया तो अपने मायके में उसकी क्या इज्जत रह जायेगी!

वह वहाँ जाकर कैसे अपना मुँह दिखायेगी!
एक अनजान के साथ फेरों के बंधन में बंधकर, उसके साथ एक रात बिताकर सोलह वर्ष की गुलाबो कितनी बङी एवं समझदार हो गई थी कि अपने पिता द्वारा जोङे रिश्ते को अब वह अपनी इज्जत से जोङकर देखने लगी थी।

शिखर को देखकर वह चुप हो गई किंतु उसकी सिसकियाँ अभी भी सूई पटक सन्नाटे को भंग कर रही थी। तभी बाहर से किन्हीं दो लोगों के हँसने का स्वर सुनाई दिया। इनमें से एक स्वर गुलाबो लाखों में पहचान सकती थी तो एक शिखर क्योंकि दोनों ही स्वर दोनों के भाई के थे।

बजरंग समधियों के बेटे को आया देख गिरगिट से भी अधिक तेज गति से अपना रंग बदल चुका था और अपनी वाणी में चाशनी घोलकर कह रहा था-
“शिखर्या की भोजाई, सुन्अ ह के। देख शिखर का साला बाबू आया है। कुछ चोखो सो जलपान लिया, आण भूख लाग गी होली।”

गुलाबो अब कुछ देर पहले हुई घटना भूलकर जेठजी को धन्यवाद कह रही थी। अपने भाई से मिलने कुछ ऐसे तङपने लगी थी जैसे जन्मों बाद उसे देखने वाली थी। भूल ही गई थी कि उसे आए अभी एक ही दिन तो हुआ है….

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