फूलों सी गुलाबो – कहानी (भाग-7)

कान्हा (गुलाबो का भाई) कुछ देर बाहर बैठकर शिखर के साथ गुलाबो के कमरे में आया। उस समय गुलाबो उन्हीं के बारे में सोच रही थी किंतु उसकी सोच का दायरा कुछ देर पहले उसके नए घर में घटित घटना से जुङा था।

कान्हा का विवाह पाँच वर्ष पहले हुआ था। तब गुलाबो बच्ची ही थी किंतु उसकी माँ ने भाभी की जासूसी करने की जिम्मेदारी देकर उसे युवती बना दिया था।

खासकर तब, जब भाभी को शौच के लिए एवं कान्हा भाईजी के लिए भोजन लेकर खेतों में जाना होता था तब।

भोर में शौच के लिए जाने के लिए हर एक उम्र की महिलाओं के अलग-अलग समूह बने हुए थे। इन सब के जाने में यूँ तो दो-चार मिनट के समय का फर्क होता था किंतु ये दो-चार मिनट ही अपनी हमउम्र की सखियों के साथ समय बिताने में अहम भूमिका निभाते थे।

विवाह के एक वर्ष बाद गुलाबो की भाभी नारायणी ने जब अपनी हमउम्र सखियों की तलाश कर ली तो गुलाबो की माँ के सीने पर साँप लोटने लगे। उन्हें सदैव यह वहम रहता था कि नारायणी ने अपना समूह ही इसलिए बनाया है ताकी वह उनकी और उनके घर की सबसे बुराई कर सके।

इसके लिए उन्होंने गुलाबो को उनके साथ भेजना प्रारम्भ कर दिया। अब गुलाबो को प्रातः जल्दी उठना पङता, जिसमें प्राम्भ में उसे क्रोध आता किंतु धीरे-धीरे उसे निंदा पुराण में आनन्द आने लगा। उसकी भाभी के अतिरिक्त वहाँ हर कोई गालियों की बौछार के साथ जमकर अपनी सास ननद की बुराई करतीं।

ये गालियाँ वे ही सब थी जिनको वाक्यों में ढाले बिना उसकी अपनी माँ की बातें भी पूरी नहीं होती थी। गुलाबो ने वहीं से गालियाँ सिखी थी। इस्तेमाल करना अपनी भाभी, नारायणी की सखियों से सीख लिया था।
कान्हा पहले पहल नारायणी से ऊँची आवाज में बात नहीं करता था किंतु तब उसकी माँ उसे नामर्द तक कह देती थी।
उसे जोरू का गुलाम कहकर उसका मजाक उङाया करती थी। याद है उसे एक बार दोपहर के समय कान्हा किसी काम से खेत से आया था। काम पूरा करके वह दो मिनट नारायणी को देखने अपने कमरे के भीतर चला गया था।
माँ ने उसे ऐसा करते देख लिया था।
बस, घर में ऐसा तूफान मचाया था कि उसके बाद कान्हा रात को भी तब तक अपने कमरे में नहीं जाता था जब तक ठाकुर (कुत्ता जो सङक का होते हुए भी सबके सोने के बाद रात को इनके घर के बाहर आकर विश्राम करता था) घर के बाहर आकर नहीं बैठ जाता था।

आज अपने जेठ बजरंग का अपनी पत्नी कमला के लिए अभद्र व्यवहार देखकर उसे पहली बार अपनी माँ गलत लगी थी। वह नारायणी में स्वयं को देखने लगी थी। क्या होगा यदि उसकी सासू माँ भी उसके साथ वैसे ही व्यवहार करेगी जैसे उसकी माँ उसकी भाभी के साथ करती है।

उसे आज सुबह की घटना भी स्मृति में आ गई जब हार के बहाने शिखर ने उसे कमरे में बुलाकर आलिंगन किया था। क्या होता यदि इसकी खबर उसकी जेठानी या सासू माँ को हो जाती!

वह अधिक नहीं सोच पाई थी। कान्हा उसके कमरे में आ गया था। अपने भाई को सामने देखकर गुलाबो की आँखें भर आई थी। उन्हें पौंछते हुए वह उसके कदमों में झुक गई थी।

अपने भाई के सामने वह बचपन से पली-बढ़ी थी। बेहिचक वह पलंग पर बैठकर उससे बातें करने लगी। वहीं शिखर भी बैठा था।

तभी उसकी सासू माँ बाहर से आई। उन्हें देखकर गुलाबो फूर्ती से उठ गई किंतु वे उसे बेपर्दा पलंग पर बैठे देख चुकी थी। वे कान्हा को अभिवादन करके तुरंत बाहर निकल गई।

उनके पदचाप के बदले स्वर शिखर को किसी तूफान के आने के पहले की शांति लगे थे जिन्हें गुलाबो नहीं पहचान पाई थी।

तभी कमरे में स्वर गूंजा-
“छोटी बिणणी, ए छोटी बिणणी।”

गुलाबो घूंघट करके बाहर चली गई।

स्वर रसोई की तरफ से आया था। गुलाबो ने जैसे ही भीतर प्रवेश किया, उसकी सासू माँ ने झटके से उसके घूंघट को खींच दिया और फुफकारते हुए बोली-
“लाज शर्म सब खो बैठी है, इतना भी माँ ने न सिखाया कि बङे भाई के सामने चाचरा (सिर) उघाङकर खसम (पति) के बराबर महारानी की जैसे बिछावना (पलंग) पर न बैठा जाव।”

आँचल खींचकर उतारने से उसके कुछ बाल भी सासू माँ के हाथों में आ गए थे। उनकी पीङा इतनी नहीं थी जितनी उस अपमान की थी जो नए घर में जेठानी के सामने उसकी दूसरी माँ अर्थात सासूँ माँ ने उसका कर दिया था।

जेठानी मुस्करा रही थी। वह मुस्कान कुछ वैसी ही थी जैसी नारायणी के अपमामित होने पर गुलाबो के होठों पर अपने मायके में आया करती थी।

वह जमीन में गङी जा रही थी। उसे लग रहा था कि बेवजह उसकी सासू माँ ने बात का बतंगङ बनाया है। सिर पर दोबारा घूंघट लेकर वह चुपचाप खङी रही।

तभी उसकी जेठानी का स्वर गूंजा-
“देखो तो सासूजी बेशर्मी। अभी भी माफी कोणी माँग री। ऐसे खङी है जैसे आप ही गलत हो।”

गुलाबो जैसे नींद से जागी और बोली-
“सासूँ माँ इस बार माफ कर दो। आगे से ऐसा कभी न होवगा।”

सासू माँ के चेहरे पर विजयी मुस्कान तैर आई। उसके दोनों हाथों में दो गिलास पानी पकङाकर कमला (जेठानी) ने गुलाबो को कमरे में भेज दिया। साथ में हिदायत देना नहीं भूली-

“लल्लाजी और अपने भाई के सामने नीचे बैठना, बिछावन (पलंग) हम बहुओं के लिए रात के अंधेरे में काम लेने वाली वस्तु ही है।”

हाँ, उसकी भाभी को भी तो उसने कभी पलंग पर बैठे नहीं देखा था। उसके सामने भी तो वह आंगन में बैठती थी जबकि वह तो अपनी भाभी से बहुत छोटी थी।

आज उसे पहली बार इन प्रथाओं में अपना अपमान महसूस हुआ था।
वही तो थी जिसने भाभी द्वारा कान्हा भाईजी से उसकी उपस्थिति में हँसकर बात कर लेने पर अपनी माँ को बढ़ा-चढ़ा कर बताने के पुरस्कार के रूप में, माँ ने उसकी भाभी को एक समय का भोजन नहीं दिया था।

साथ में सख्त हिदायत भी दे दी थी कि दुनिया इधर की उधर हो जाए वह रात दस बजे के पहले न अपने कमरे में जा सकती है और न ही अपने पति के सामने।

गुलाबो के मन में सासू माँ के आक्रोश का ऐसा खौफ बैठा था कि अपने भाई और शिखर के साथ पगफेरे के लिए मायके लौटते समय बस में वह पूरे रास्ते घूंघट करके बैठी रही।

अपने पुराने घर पहुचँकर भी वह घूंघट नहीं हटा पाई। माँ के कहने पर हटा भी दिया तो सिर से पल्लू तो उतार ही नहीं पाई।
माँ को इसमें भी नायायणी (गुलाबो की भाभी) को तंज कसने का मौका मिल गया-
“देखो, अ हुव संस्कार। मेरी बेटी है, जाण कब कैसे रहनो है। घूंटी म्अ घोटकर पिलाई ही म्अ इण।
मजाल की सासूँ उंगली भी उठा देव्अ।”

बेचारी गुलाबो कह भी नहीं पाई कि उसकी सासू माँ द्वारा किये अपमान ने ही उसे ये संस्कार दिये हैं…

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