फूलों सी गुलाबो – कहानी (भाग-9)

गुलाबो इतने करीब से दारू की गंध की आदी नहीं थी। उसका जी मचलने लगा। वह शिखर की बलिष्ठ बाहों से स्वयं को छुङाने का प्रयास करने लगी किंतु वह भी जानती थी कि ऐसा करना अंधेरे में तीर मारने के समान ही है।
वह अपने आप को बाहों की कैद से छुङाने का प्रयास ही करती रह गई ऊधर शिखर ने उसके अधरों पर अपने अधर रख दिये।
हे ईश्वर, यह तो और भी भयावह था। उसे दारू का स्वाद अपने मुँह में घुलता सा प्रतीत होने लगा था। उसने अपना पूरा दम लगाकर शिखर को एक बार परे तो धकेल दिया किंतु शिखर को पुनः उसे अपनी गिरफ्त में लेने में समय नहीं लगा।
गुलाबो की आँखों से नीर टपकने लगा। कल की ही रात जो पति उसे देवता लगा था आज दानव लगने लगा था। वह किंतु अपनी इस सोच को अपनी सहमति कैसे दे सकती थी। वह एक भारतीय लङकी थी जिसे बचपन से ही सिखाया जाता है कि पति परमेश्वर होता है और ससुराल मंदिर। ये दोनों चाहे कैसे भी हो, इनके साथ सामंजस्य बैठाना ही नारी के लिए ईश भक्ति है।

अब उसकी सोच बदल गई थी। अब उसे यह सब कुछ देर पहले जितना भयावह नहीं लग रहा था। वह कान्हा के बारे में सोचने लगी थी जो कि अक्सर इतने ही नशे में घर लौटता था एवं कदाचित् उसकी भाभी नारायणी के साथ कोठे की चहारदीवारी में इसी तरह पेश आता था।

गुलाबो ने यह कहकर स्वयं को तसल्ली देली कि-
उसका परमेश्वर कम से कम उसको पीट तो नहीं रहा है। उसकी धुंधली पङी स्मृति आज फिर ताजा हो गई थी जब कान्हा ने अपनी सुहागरात के दिन ही दारू के नशे में नारायणी को जमकर पीट दिया था क्योंकि वह दर्द सहन नहीं कर पाई थी और जोर से चीख उठी थी। चहारदीवारी के बाहर चीखने की आवाज जाना कान्हा के पुरुषोचित्त अहम को बर्दाश्त नहीं हुआ और वह जंगली बन बैठा। नारायणी को अहसास करवाने के लिए कि अब चीखों जितना चीखना है। उसके बाद बाहर केवल कान्हा के मुंह से निकली भद्दी गालियों एवं मार के स्वर आ रहे थे। नारायणी की चीख अब उसके गले में ही दफन हो रही थी। कदाचित वह नहीं चाहती थी अनजाने में हुई गलती को वह अब जानबूझकर दोहराये।
यह दृश्य याद आते ही गुलाबो पसीने-पसीने हो गई। वह न चाहते हुए भी शिखर का साथ देने लगी जो अब तक पूर्ण रूप से जानवर बन चुका था। वह इसी में खुशी तलाश रही थी कि कम से कम पीकर शिखर उसे गंदी गालियाँ तो नहीं दे रहा। कम से कम उसकी पिटाई तो नहीं कर रहा।

अपनी भूख शांत करके शिखर गहरी नींद सो चुका था। गुलाबो ने उसे गहरी नींद में गया देख चैन की साँस ली। वैसे ही जैसे गुलाम, मालिक की नजरें हटने पर राहत महसूस करता है।
उसके नींद में उठकर फिर उसकी देह पर हमला होने के खौफ से डरी गुलाबो धीरे से कुंडी खोलकर बाहर निकल आई। वह दालान पार करके पेङ की ओट में आकर खङी हो गई जहाँ वह दिन की रोशनी में भी भूतों के भय से आने से डरती थी। आज उसे किंतु डर नहीं लग रहा था। शायद वह आज जान गई थी कि भूत जैसा कोई अगर इस दुनिया में कुछ है तो वह मानव ही है।
कल का सुखद अहसास अब तिरोहित हो गया था। वह ईश्वर से दुआ कर रही थी कि और सब ठीक है कम से कम उसका पति उस पर शारीरिक अत्याचार न करे।

अपनी देह को पकवान बनाकर वह उसके लिए प्रत्येक रात प्रस्तुत करती रहेगी किंतु वह इस देह पर थप्पङ, लात-घूसों के निशान किसी और की नजरों में आने के लिए बर्दाश्त नहीं कर पायेगी।
वह सोच रही थी, उसी समय उसके वक्षों में साँस की गति के साथ पीङा हो रही थी। वह इस पीङा को नजर अंदाज करना चाहती थी। बार-बार गालों पर एवं गर्दन पर हाथ जा रहा था। शरीर के इस भूभाग को वह पेङ के निकट रखी हुई पानी से आधी भरी बाल्टी में सितारों की चाँदनी में देखने का प्रयास कर रही थी।
वहाँ किसी निशान को न पाकर स्वयं को धन्य मान रही थी कि रात को उसके कमरे में जो हुआ उसके चिन्ह उसकी देह पर दिन के उजाले में किसी को नजर नहीं आयेंगे और उसकी पोल नहीं खोलेंगे।

वह घंटों वहाँ बैठी रही। बचपन से अब तक के अपने जीवन के बारे में सोचती रही। जब उसकी सखियों ससुराल से आकर अपनी सुहागरात के अनुभव उससे बाँटती थी तब उसके मन में कितनी गुदगुदी होती थी।

वे सच ही कहती थी किंतु कल एवं आज की रात ने उसकी सोच को नए आयाम दे दिये थे। कल जो बाँहें सुरक्षा कवच लग रही थी वे ही बाँहें आज सबसे बङा खतरा लग रही थी। कल वह उन्हें किसी की कीमत पर छोङना नहीं चाहती थी और आज उसी घेरे से बचकर भाग जाना चाहती थी।

आज उसे प्रेम एवं जबरदस्ती का फर्क समझ में आ रहा था। वह अक्सर सुनती थी कि किसी लङकी के साथ कोई पुरुष जबरदस्ती सम्बंध बनाता है तो वह लङकी किसी को मुँह दिखाने लायक नहीं रहती। उसकी इज्जत चली जाती है।

आज गुलाबो को एक बात और समझ में आ गई थी कि यही जबरदस्ती जब उसका पति उसके साथ करता है तब उसकी ईज्जत नहीं जाती। वरन उसके शरीर पर इस जबरदस्ती की बदौलत उभरे निशान उसके पति के प्यार की निशानी कहलाते हैं। कुछ देर पहले उसकी गर्दन पर कोई निशान नहीं था किंतु बढ़ते समय के साथ जब वह सभी के उठने से पहले दबे पाँव अपने कमरे में जाने लगी तो गाय की ठान (वह स्थान जिसमें गाय को चारा एवं पानी परोसा जाता है) में बचे पानी में उसे अपनी देहाकृति नजर आ गई।
उसकी गर्दन के नीचले भाग में दाग उबर आया था। किसी की नजर पङन के डर से उसने अपने दुपट्टे से उसे छिपा लिया था किंतु सूरज की रोशनी में यह करना उसके लिए संभन वहीं होगा वह जानती थी।

वह शिखर के करीब सिमटकर लेटते हुए,
कल सुबह अपनी सखियों एवं भाभी से यह सुनने के लिए तैयार हो रही थी-
बाईसा, नंनदोईसा थाण किता चाव्व है। भागण (खुश्किस्मत) हो थे भागण….

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *