फूलों सी गुलाबो – कहानी (भाग-14)

शिखर के साथ गुजरे कुछ समय को याद करके गुलाबो दिन भर मुस्काराती रही। कमला को लगा था कि भोर में उसके द्वारा गुलाबो को न उठाने एवं अकेले ही सकंङी गली चले जाने पर गुलाबो उससे नाराज होगी किंतु गुलाबो बिल्कुल सामान्य थी।
कमला को यही बात असामान्य कर रही थी। मानव मन कई बार सामान्य परिस्थिति से भी असामान्य हो जाता है बशर्ते यदि उस समय विशेष में असामान्य परिस्थिति की उम्मीद पाल बैठा हो।

दरअसल कमला, गुलाबो को दुखी करना चाहती थी। वह इसमें सफल नहीं हो पाई तो असहज हो गई। रही-सही कसर शिखर के व्यवहार ने पूरी कर दी। आज वह भी बहुत खुश नजर आ रहा था। घूंघट के पार दोनों की एक-दूसरे से आत्मीय बातचीत कमला की तेज आँखों से छिप नहीं पा रही थी।

दिन के दूसरे पहर के बाद गुलाबो को बैचेनी हो गई। उसके पेट में दर्द उठने लगा। स्थिति ऐसी हो गई कि शौच को रोक कर रखना अब उसके लिए असंभव हो गया तब वह अपनी सासू माँ के पास आई और बोली-
“माँसा मुझे सकङी गली जाना है।”

उसकी सासूँ माँ ने उसे घूरकर देखा और राजेश्वरी के साथ भेज दिया। सासू माँ को लगा गुलाबो का पेट गङबङ हो गया है।
वहाँ उन्हें राजेश्वरी की कुछ सहेलियाँ मिल गई। शौच की क्रिया के निवृत होकर सभी सहेलियाँ वहाँ से एक खुले मैदान में पहुँच गई जहाँ कदाचित् शाम को कोई आता–जाता नहीं था।

वहाँ वे मिट्टी खोदकर गिली मिट्टी से घर बनाने लगी। पहले-पहल गुलाबो को घर पहुँचने की जल्दी थी किंतु राजेश्वरी को सहेलियों के साथ बचपन की दुनिया में खोया देखकर वह भी बच्ची बन गई।
वह अपने बचपन में डूबने-उतरने लगी। अपने मायके में वह शौच की क्रिया के बाद एवं उसकी सखियाँ पात्र में थोङा सा पानी बचा लेती थीं।
राजेश्वरी की ही तरह मिट्टी खोदती थीं और उससे बङे-बङे निजी घर बनाकर घंटों खेलती थीं। पात्र में जो पानी बचाती थीं उसमें बकरी का अवशिष्ट, कुछ पत्ते, छोटे पत्थर आदि डालती थीं और फिर उसे सूखी मिट्टी का छोटा सा ढेर बनाकर उस पर उलट देती थीं।

पानी, मिट्टी के कणों के बीच अपना आधिप्तय स्थापित करता तब आने वाली गुङ-गुङ की आवाज उनके लिए मुख्य आकर्षण का केंद्र थी। वे इसे भूत-भूतनी नचाना कहा करती थीं।

जब आवाज खत्म हो जाती तब पात्र को सावधानी से हटा देती। जो छोटा-मोटा सामान उन्होंने पात्र में डाला था वह मिट्टी पर जम जाता, जिसे वे भूत-भूतनी द्वारा नाचते समय घर को सजाने के रूप में किया गया कार्य कहा करती थीं।

इस प्रकिया से जिसका घर सबसे सुंदर सजता उसे भूत-भूतनी का सबसे आत्मीय कहा जाता था। ये भूत-भूतनी भी प्रतिदिन ठिकाना बदल लेते थे। कभी गाँव के बीचो-बीच बने बङ के पेङ को इनका ठिकाना बना दिया जाता तो कभी गाँव की सीमा पर बने पीपल के पेङ को।

बबूल के पेङ पर लगे काँटों को तो ये प्रत्यक्ष रूप से भूत-भूतनी ही कहा करती थी।
इन स्मृतियों में कितनी खुशियाँ थी। काश गुलाबो आज भी यह सब कर पाती जो वह महज एक वर्ष पहले किया करती थी।
अब वह बहू बन चुकी थी। यह सब करना उसे शोभा नहीं दे सकता था। दिन ढलने को आ गया था। राजेश्वरी से वह जल्दी चलने की प्रार्थना करने लगी किंतु राजेश्वरी तो अपनी खेलने की दुनिया में ऐसी व्यस्त थी कि उसे समय का कुछ होश ही नहीं रहा। अब गुलाबो डरने लगी थी। देर होने से घर पर मिलने वाले बेसमय का तूफान आज उसकी दिन भर की खुशी को तहस-नहस करके आज के दिन को सबसे दुखद दिन बना सकता था।

तभी वहाँ पर अचानक शिखर आ गया। सुबह सदैव की तरह गाय चरने के लिए आई थी किंतु वह अभी तक घर नहीं पहुँची थी। शिखर उसी की तलाश में आया था।
वहाँ गुलाबो को देखकर वह खुश हो गया। उसे तभी सामने चरती गाय भी नजर आ गई थी। राजेश्वरी को कुछ देर वहीं प्रतीक्षा करने के लिए कहकर गाय को तलाश करने के बहाने गुलाबो को अपने साथ ले गया।

वहाँ सुनसान था। शिखर के लिए अपने गाँव की राहों में गुलाबो के साथ घूमना किसी सपने से कम नहीं था। उसे लग रहा था जैसे आज वह दुनिया का सबसे आधुनिक आदमी हो गया हो।

आह! गाय को जबरदस्ती और आगे तक लेकर जाने में कितना सुकून था। गाय यदि उनके साथ रही तो वे उसे तलाश करने के बहाने कितनी भी आगे तक जा सकते थे।

गाय भी सामान्य नहीं थी जिसे इस भरोसे छोङ दिया जाए कि स्वयं ही देर रात तक चली आयेगी। एक समय में पूरा पाँच किलो दूध देती थी। एक दो बार तो उसकी शराफत का फायदा उठाकर किसी ने रोही (गाय के चरने का स्थान) में ही उसके थनों से दूध चुरा लिया था।

आजकल शराफत का जमाना नहीं है, सोचकर काका ने शिखर को तुरंत गाय की तलाश में भेजा था। आज पहली बार शिखर और गुलाबो ने ढेरों बातें की थी। बचपन की बातें, स्कूल की बातें, मित्र-सहेलियों की बातें।
अचानक से शिखर पूछ बैठा-
“गुलाब, तुझे मेरे साथ अच्छा तो लगता है न।”
गुलाबो शर्म से लाल हो गई। उसे जवाब देते न बना। उसने अपने घूंघट को और थोङा नीचे कर लिया जो पहले से ही गले तक था। वह शिखर के अनुरोध पर बीच-बीच में एक हाथ से अपना घूंघट पलटकर शिखर की तरफ देख रही थी किंतु अब वह शिखर से नजरें नहीं मिला पा रही थी।

शिखर ने अचानक उसके हाथ को अपने हाथ में ले लिया। गुलाबो के पूरे शरीर में सनसनी हो गई। उसे याद आ गया कि उसे घर से निकले बहुत देर हो चुकी है।
वह गाय को विपरीत दिशा में हाँककर पलट गई। शिखर को भी उसका अनुसरण करना पङा। राह से राजेश्वरी को लेकर वे लौट आए। एक रुपए की सौ आने वाली छोटी मीठी गोलियों के लालच में शिखर ने घर पहुँचकर उसकी जुबान से अपनी कहानी दोहराने ले लिए राजेश्वरी को तैयार कर लिया था जो मात्र इतनी ही थी कि उन तीनों ने तीन दिशाओं में गाय की तलाश की तब कहीं जाकर गाय मिल पाई।

आज अगर वह और उसकी भाभी, शिखर को वहाँ नहीं मिलते तो उसके शिखर भाईसा कभी गाय की तलाश नहीं कर पाते और कोई न कोई कसाई गाय को ले जाकर कसाई खाने में बेच देता।
कसाई खाने के दरवाजे तक गई गाय के लौट आने के अहसास से अम्मा खुश हो गई एवं भूल ही गई कि गुलाबो एवं राजेश्वरी पूरे दो घंटे बाद लौटी है।

कमला ने दबे स्वरों में यह कहना चाहा था किंतु अम्मा ने उसे यह कहकर झिङक दिया-
“तीनों मिलकर गाय लिवा लाए, नहीं तो क्या तेरे पीयर वाले देते!”
यह सब सुनना उसका नित्य का क्रम था। जिस तरह घनिष्ठ पुरुषों की आपसी चर्चा में माँ-बहन की गाली देना एवं सुनना अति घनिष्ठता का सूचक है वैसे ही अम्मा द्वारा कमला को मायके के नाम पर ताने देना, कमला को अच्छा ही लगता था किंतु आज जब यही गुलाबो की उपस्थिति में हुआ तो वह तिलमिला गई।

पुरुष वर्ग भी तो अनजान के मुँह से या अनजान के समक्ष घनिष्ठ के मुँह से गाली सुनकर अपनी माँ-बहन के अपमान के अहसास से तिलमिला जाता है वैसे ही कमला आज अपने मायके वालों का अपमान समझकर तिलमिला गई थी।

माँसा के सामने जुबान खोलना तो उसके लिए असंभव था वह इस घर में इसका बदला केवल गुलाबो से ही ले सकती थी, उस गुलाबो से जो उसे इस घर में धीरे-धीरे अपनी दुश्मन नजर आने लगी थी…..

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