फूलों सी गुलाबो – कहानी (भाग-15)

आज श्रवण घर पर आया था।
बजरंग उससे बङा था इस नाते वह रिश्ते में कमला का देवर लगता था। कमला उससे हँस बोल सकती थी। यूँ भी कमला, श्रवण की तरफ सहज रूप से आकर्षित थी। इसका कारण न जाने बजरंग का उपेक्षित व्यवहार था या श्रवण का स्नेह।
जब भी श्रवण घर आता, कमला गुलाब के फूल सी खिल जाती थी। कल हुई घटनाओं से उसका मन खिन्न था किंतु श्रवण पर नजर पङते ही वह सब कुछ भूल चुकी थी।

श्रवण, शिखर से मिलने आया था। नए-नए विवाह के रोमांचक किस्से जानने एवं यह भी जानने की सुहागरात को उसके द्वारा दिया तोह्फा गुलाबो को पसंद आया या नहीं।

वे दोनों कमरे में बैठकर बातें कर रहे थे।
श्रवण-यार, तूने तो बताया भी न तेरी बिणणी को उपहार कैसा लगा, ब्याह होते ही बहुत नशा हो गया है तुम्हारे।
शिखर- अरे, कैसा नशा यार, बस ऐसे ही खेतों के काम से समय ही न मिला।
तभी गुलाबो वहाँ दो गिलास पानी लेकर आई तो दोनों की बातचीत में विघ्न आ गया। श्रवण, गुलाबो से बात करना चाहता था।
वह शहर में रहा था इसलिए छोटे भाई की पत्नी से बात करने को गलत नहीं मानता था किंतु वह कुछ कहता उससे पहले ही गुलाबो जा चुकी थी। तभी वहाँ कमला आ गई।
वह चाय या छाछ के लिए पूछने आई थी।
शिखर ने मुस्करा कर कहा-
“भाभीसा हम शहर वाले हैं, छाछ-वाछ न पीते। हम तो चाय ही पीते है या फिर अंग्रेजी….”
शिखर ने कुछ यूँ आँखें मटका कर कहा कि कमला शरमा कर मुस्करा दी।
वह लौट गई थी। शिखर किन्हीं विचारों में खो गया था। श्रवण ने उसे झकझोर कर वर्तमान में लाने का प्रयास किया तो वह हङबङाकर बोला-
“नहीं, आगे से कभी ऐसा न करुंगा, कान पकङता हूँ।”
श्रवण-अरे, क्या नहीं करोगे। क्या हो गया।
शिखर-कुछ नहीं वो बस ऐसे ही।
श्रवण-चलो, जाओ फिर मैं चलता हूँ। तुम मुझे आजकल अपना यार ही नहीं मानते। सच में तुम ब्याह के बाद बहुत बदल गए हो।
श्रवण सचमुच उठने लग गया तो शिखर ने हाथ खींचकर उसे बैठा लिया और कहा-
“अरे नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है। वो यार मेरे सासरे गया था न पगफेरे के लिए, तो गांव के सालों ने देशी दारू पिला दी। मैं मना करता रहा किंतु वे माने नहीं।”
श्रवण को शिखर की बातें सुनकर मजा आने लगा था। वह सोच भी नहीं सकता था कि शिखर दारू पी सकता है। वह उसे इस कार्य के लिए बच्चा ही मानता था। यह अलग बात थी कि दोनों बीङी के कश अक्सर साथ ही लगाया करते थे जिसमें भी वह शहर रहने पर वहाँ के मित्रों के साथ केवल सिगरेट ही पीने के किस्से बढ़-चढ़कर सुनाया करता था।
उसने उत्साहित होकर पूछा-
“तब तो रात को बल्ले-बल्ले हो गई होगी।”
श्रवण की आँखों में अजीब सा नशा चढ़ गया था।
शिखर- हाँ यार, लेकिन मुझे अच्छा नहीं लगा। दूसरे दिन मुझे रात की कुछ बातें याद थी। मुझे गुलाबो के साथ ऐसा नहीं करना चाहिए था। वह बेचारी मेरी वजह से कितनी पीङा से गुजरी।
शिखर की बात सुनकर श्रवण ठहाका मारकर हँस पङा। वह व्यंग्य करते हुए बोला-
“शिखर, एक काम कर, अपनी लुगाई को महंगे गहने कपङे पहना और काँच के घर मे सजा दे। शहरों में जैसे शोरुम में डम्मी को सजाया जाता है बिल्कुल वैसे।”
शिखर को श्रवण की बात बिल्कुल अच्छी नहीं लगी किंतु उसने कुछ नहीं कहा। उसने विषय बदल दिया-
“तुमने नौकरी के लिए आवेदन किया था न क्या हुआ?”
श्रवण को उन्हीं सब बातों में रस आ रहा था। वह फिर से उसी विषय पर आ गया-
“क्या यार तुम भी! बापू ही बहुत है दिन भर कचहरी लगाने के लिए। अब तुम तो शुरु मत हो।
चल छोङ यह सब, उस बात को तो बहुत दिन हो गए। उसके बाद कभी एक आध अमृत की बूंद ली की नहीं। सुन, मेरे पास पूरा विदेशी माल है। गंध का नामोनिशान भी नहीं है। चढ़ती भी बहुत धीरे-धीरे है। एक बार चढ़ जाती है तब जन्नत का मजा आता है, तो आज रात पक्का—–”
शिखर ने उसकी बात समाप्त होने के पहले ही कहा-
“नहीं यार, मुझे नहीं चाहिए यह सब। गुलाब बङी मुश्किल से तो मुझ से थोङी बहुत बात करने लगी है। मैं नहीं चाहता कि फिर से वह मुझसे दूर-दूर रहने लगे। आखिर वह भी तो अपना घर छोङकर आई है, उसे भी तो अपने मन की बात कहने के लिए कोई चाहिए।”
श्रवण इस बार पहले से भी अधिक जोर से हँसा। उसी समय कप के आकार के सिलवर के दो गिलास जिसमें चाय थी के साथ कमला ने भीतर प्रवेश किया। कमला ने हँसते हुए पूछा-
“क्या हुआ लालाजी, भांग पी ली या स्वर्ग का खजाना मिल गया जो इतना हँस रहे हो।”
श्रवण उसी तरह हँसते हुए बोला-
“आपके इस लाडले देवर की बातें सुनोगी तो आप भी हँसते-हँसते लोटपोट हो जाओगी। कह रहा है कि उसकी पत्नी को एक सहेली चाहिए, उसकी कमी यह पूरी कर…..”
अपनी भाभी के सामने शिखर के मन की बात को मजाक के लबादे में लपेटकर प्रस्तुत करने की श्रवण की गतिविधि पर शिखर को बहुत क्रोध आया। वह शर्म से गङा जा रहा था क्योंकि उसकी कमला से कुछ विशेष बात नहीं होती थी।
होली के दिन तक ही उनका हँसी-मजाक का रिश्ता था। तब वह श्रवण के साथ मिलकर पूरे मनोयोग से भाभी को होली खिलाता था।

शिखर ने श्रवण की बात काटकर कहा-
“भाभीसा, यह बावला हो गया है कुछ भी बोले जा रहा है। आज खाणे में क्या बनाया है। जोर से भूख लग रही है।”
कमला को समझते समय नहीं लगा कि उसका देवर अपनी पत्नी की बात उसके सामने नहीं करना चाहता। यह भी समझ गई कि उसके पति से उसका देवर अलग है। उसका पति अर्थात बजरंग गालियों एवं मारपीट की बोछार के बिना उसके सामने नहीं आता, शिखर, गुलाबो के साथ प्रेम एवं स्नेह से ही पेश आयेगा।

उसका मन उदास हो गया। अनाप-शनाप दहेज लाकर गुलाबो, सास-ससुर की पहले ही लाडली बन चुकी थी। अब शिखर जैसा प्यार करने वाला पति पाकर वह कमला के सिर पर बैठकर नाच सकती थी।
कमला को इस बात से समस्या नहीं थी कि शिखर, गुलाबो को बहुत चाहता है। उसे इस बात से समस्या था कि उसका पति उसे क्यों नहीं चाहता।
यह कारण गुलाबो से ईर्ष्या करने के लिए पर्याप्त था क्योंकि मानव मन अपने दुःख से इतना दुःखी नहीं होता जितना दूसरे के सुख से दुःखी हो जाता है।

वह भी गुलाबो की ही तरह इस घर की बहू थी। वह अगर इस घर में उसके बराबर का सम्मान चाहती थी तो कुछ बेवाजिब नहीं चाहती थी किंतु इन सब के लिए गुलाबो को दोष देना तो बेवाजिब था ही….

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