फूलों सी गुलाबो – कहानी (भाग-11)

गुलाबो नाना प्रकार के गहनों से सजकर ससुराल लौट आई थी। लौटते समय उसके पिता ने उन्हें किराये की जीप से भेजा था। उनके साथ दिये उपहारों को भेजने के लिए ऊँट गाङी की व्यवस्था की थी।
वे बस में गए थे, आए जीप में। उसके ससुराल वालों ने सामान्य तौर पर बिना आडम्बर भेज दिया था। उसके पति के ससुराल वालों ने पूर्ण सुख-सुविधाओं के साथ विदाई का फर्ज निभाया था।

मायके पहुँची थी तब पूरे परिवार के साथ गाँव वाले भी बस अड्डे पर नए जवाईँ के स्वागत के लिए आए थे। ससुराल में घर के बाहर आकर जीप रुकी थी किंतु कोई उसे लिवाने नहीं आया था। शिखर के पार्श्व में, गले में पङी चिक (एक तरह का हार जो उसे उसकी माँ ने पहली बार मायके आने के उपलक्ष्य में आज ही उपहार में दिया था) को एक हाथ से सहलाते एवं एक हाथ से घूंघट संभालते हुए वह घर के भीतर प्रवेश कर गई।

बजरंग नीम की डाली को पूरे मुँह में घुमा-घुमाकर दातून कर रहा था। कमला दालान में बैठी गाय और बकरी के अवशिष्ठ को मिलाकर थापङी (कंडे) बना रही थी।
उन्हें देखकर वह उठकर आने लगी तो शिखर ने शीघ्रता से उसे इंकार करते हुए-
“भाभीसा रहने दो, आपको काम करल्यो। एक ही बात है।”
कमला ने उठने का उपक्रम ही औपचारिकता के लिए किया था। देवर की बात सुनकर वह तुरंत बैठ गई। शिखर ने राहत की साँस ली। गोबर से आने वाली गंध उसके नाक द्वारा जिस्म में पहुँच उबकाई पैदा करती थी। जहाँ तक हो वह इस गंध से बचने का प्रयास करता था। यहाँ तक की होलिका दहन के समय गोबर से बने बङकूले अग्नि के हवाले करने में भी उसे बहुत खौफ्त होती थी, जबकि तब तक वे सूख चुके होते थे एवं उनमें गंध का नामोनिशान भी नहीं रहता था।

माँ एवं काका कदाचित् खेतों में थे। धीमें कदमों से गुलाबो बजरंग एवं कमला के करीब गई, उन्हें प्रणाम किया और जेठानी का इशारा पाकर अपने कमरे में प्रवेश कर गई।

सिर से आँचल उतारकर गुलाबो ने लम्बी साँस ली ही थी कि वहाँ तूफान सी गति से कमला प्रवेश कर गई। उसका चेहरा तमतमाया हुआ था और उसके धूले हाथों से भी आती गोबर की गंध उसके मायके से लगाकर आए इत्र पर भारी पङ रही थी।
गुलाबो ने असंजसता के साथ कमला को देखा-
वह पहले से ही ठीक तरह लिए आँचल को ठीक करते हुए बिफर कर बोली-
“इतनी बङी हो गई यह भी नहीं जानती कि जेठजी और ससुरजी के पैर नहीं लगा जाता (चरण स्पर्श नहीं किये जाते)।”
गुलाबो के मुँह से आह सी निकल गई। वह इतनी बङी भूल कैसे कर सकती है! उसकी भाभी भी तो कभी उसके बापू के धोक नहीं देती।
शिखर ने जब प्रवेश करते ही अपने भाई-भोजाई को दूर से ही प्रणाम किया तो वह नजदीक से उन्हें प्रणाम करने पहुँच गई। बहुओं का ससुराल के परिवार की हर एक स्त्री के पैर लगने का कर्त्वय होता है। यहा तक की दो वर्ष की ननद के भी।
अपने जेठ एवं ननद के बच्चों को वह सम्मानसूचक शब्दों के इस्तेमाल के बिना (जी लगाए बिना) नहीं पुकार सकती। यह सब उसे पता था। आखिर वह भूल कैसे सकती है। जेठ एवं ससुर की तरफ उसे नजर डालने का भी अधिकार नहीं है। आखिर वह उन्हें प्रणाम कैसे कर सकती है!
उसके मुँह से तुरंत निकला-
“भाभीसा माफ कर दो। भूल हो गी।”

कमला गर्विली मुस्कान के साथ बाहर निकल गई। वह अपने काम पर बैठने ही वाली थी कि वहाँ एक स्त्री आई जो लगभग गुलाबो की उम्र की ही थी एवं नई नवेली दुल्हन लग रही थी।

कमला ने आगे बढ़कर उसका स्वागत किया एवं उसके पैरों में झुकती चली गई। गुलाबो असंजस की स्थिति में थी किंतु अपनी जेठानी के पदचिन्हों पर चलना उसका फर्ज था।
तभी वहाँ शिखर के साथ एक अधेङ उम्र के व्यक्ति ने प्रवेश किया। उसकी उम्र काका से कुछ ही कम होगी। शिखर उन्हें कह रहा था-
“ताऊ, नई ताई की बधाई।”

गुलाबो को समझते देर नहीं लगी। यह युवती इस प्रोढ़ युवक की धर्म पत्नी है इसलिए भाभी इसे प्रणाम कर रही थी। गुलाबो का मन खिन्न हो गया। उसे नवागंतुक युवती पर तरस आने लगा।

मन ही मन उसके पिता के बहुत गरीब होने की उसने कल्पन कर ली थी। अक्सर गरीब बाप अपनी बेटी का विवाह अपनी उम्र के पुरुष से करने के लिए बाध्य हो जाता है क्योंकि इस तरह के रिश्तों में दहेज तो देना ही नहीं पङता, विवाह के खर्च भी खुद को नहीं उठाने पङते वरन लङके वाले कुछ धन अदा कर देते हैं।

कर्ज से डूबा बाप भी इस तरह के सम्बंध कर देता है। गुलाबो के मन में टूटते सितारे सा एक विचार आया-
“बंधुवा मजदूर, खरीदी गई बहू।”
किसी के द्वारा उसके चेहरा पढ़ लेने के भय से उसने तुरंत ही विचार को जेहन से निकाल फैंका और अपनी जेठानी के पीछे रसोई-घर में चली गई।

बाहर ताउ, शिखर को हँस-हँसकर अपनी सुहागरात का किस्सा यह कहते हुए सुनाने लगा था-
“देख, तेरी और मेरी जनानी एक ही उम्र की है इसलिए आज से अपण दोनों पक्के भायले (दोस्त)।”

शिखर कुछ जवाब न दे सका। वह मुस्करा दिया तभी वहाँ सामान से लदी ऊँटगाङी पहुँच गई। उसी समय खेत से काका और अम्मा लौट आए।

अम्मा की थकान उपहारों से लदी गाङी देखकर तुरंत ही उतर गई। वह गाङी वाले से सामान अपने कमरे में रखने के लिए बोलकर, रसोई में आईं। जैसे ही गुलाबो उनके चरणों में झुकी उसे दोनों हाथ से उठाकर, उसके सिर पर हाथ फेरकर बोलीं-
“बिणणी आकती होगी (थक गई) होसी। थोङो आराम करले।”

कमला के चेहरे पर कुटिल मुस्कान तैर आई। इतने लाङ प्यार का कारण उसे समझ में आ गया था। आखिर छप्पर फाङ कर दहेज लान वाली बहू को कौन सिर पर नहीं बैठायेगा!

उसे अपना विवाह याद आ गया। उसके पिता तो दो ऊँटगाङी भरकर ही केवल दहेज में वस्तुएँ दे पाये थे। नकद भी उन्होंने बस ग्यारह हजार ही दिया था।

गुलाबो के मायके से सीधा इसका पाँच गुणा यानी पचास हजार आया था। दहेज का सामान ट्रेक्टर में भरकर आया था और पगफेरे के लिए विदा होने गई बेटी को उन्होंने उसके दहेज से आधा सामान दे दिया था।

कमला ने लम्बी साँस ली। आने वाले कल की तस्वीर उसकी आँखों के सामने तैर आई थी। उसे समझ में आ गया था कि अब गुलाबो के दूध में (जब गाय दूध बहुत अधिक देगी) अतिरिक्त मलाई डाली जायेगी, उसके अच्छी तरह काम न करने पर उसके मायके वालों के द्वारा काम सिखाकर न भेजने के उसे ताने नहीं दिये जायेंगे।

न चाहते हुए भी कमला, गुलाबो की विद्रोहिणी बनने वाली थी। उसे नीचा दिखाने के अवसर तलाशने वाली थी। सासूँ माँ को प्रभावित करने के लिए वह मायके से गुलाबो की तरह दहेज नहीं ला सकती थी किंतु गुलाबो को अपनी सामान्य चालों में फँसाकर नीचा तो दिखा ही सकती थी। आखिर इस घर में साँसें लेने के लिए उसे कुछ तो करना ही पङेगा। अपने पति से तो उसे सदैव दबकर रहना है किंतु रसोई-घर में तो अपना आधिप्तय स्थापित करना ही होगा।
यह शुरुआत थी एक गृह युद्ध की जिसकी जननी स्त्री न होते हुए थी स्त्री ही थी।
ऐसी कलह के कारण घरों में बढने वाले क्लेश के लिए दहेज को कटघरे में खङा किया जाना चाहिए किंतु अफसोस की बात है कि आज तक कभी ऐसा नहीं हुआ है….

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