फूलों सी गुलाबो – कहानी (भाग-8)

गुलाबो एक ही दिन ससुराल रहकर आई थी किंतु उसे मायके में ऐसा लग रहा था जैसे वह किसी कैद से रिहा होकर आई है। उसके साथ एक समानांतर भाव और आ रहा था कि उसे अब यह घर अपना भी नहीं लग रहा था।
दोनों विचारधारा एक-दूसरे के विपरीत थी किंतु दोनों ही मानस का समानांतर हिस्सा थीं।

पूरे दिन शिखर, गुलाबो के आसपास रहने का प्रयास करता रहा था। गुलाबो थी कि उससे दूर भाग रही थी। अपनी सासू माँ द्वारा फटकार मिलने के बाद अब वह शिखर की परछाई से भी दूरी बनाने का प्रयास करने लगी थी।

नारायणी यानी गुलाबो की भाभी, शिखर की सेवा में कोई कमी नहीं छोङ रही थी। पूरा परिवार ही नहीं पूरा गाँव उसकी मेहमाननवाजी करता नजर आ रहा था। आखिर आता भी क्यों नहीं, गुलाबो के पिता गौरीशंकर गाँव में इकलौते थे, जिनका सो बीघा खेत था।

शिखर को इतने सम्मान की आदत नहीं थी। यहाँ वह शिखर्या से कवर साँ हो गया था। यह मेहमाननवाजी पहले उसे असहज कर रही थी, फिर विशेष विभूति होने का भान देने लगी।
उसे सच में लगने लगा कि वह इतना विशेष है कि उसे विशेष आदर मिलना ही चाहिए।
दिन भर गाँव भर के हमउम्र सालों से वह घिरा रहा। शाम को वे उसे गाँव की सीमा पर ले गए जहाँ रेत के टीलों के पीछे से झांकता सूरज भले डूबने की कगार पर था किंतु वातावरण में मुस्कुराहट फैलाता प्रतीत हो रहा था।

तभी सकङी गली (लङकियों एवं स्त्रियों के लिए शौच के लिए जाने का स्थान) से आती एक लङकी नजर आई, वह कहाँ से आ रही है इसकी पहचान उसके हाथ का लोटा थी।

सभी लङके उसे देखकर हँसने लगे। वह अकेली थी। उसके चेहरे पर तनाव पसर आया। वह तेज कदमों से उनके सामने से गर्दन झुकाये जाने लगी। तभी सरपंच साहब के बेटे ने शिखर को संबोधित करते हुए तंज कसा-
“कवँरसा म्हारे गाँव की हिरोइन है। दिन ढलने के समय अकेले घूमने की ये ही पहचान है। बोलो तो थाक्अ लिय टेम लेऊँ।”

शिखर ने बोलने वाले को ध्यान से देखा फिर जा रही लङकी को देखने लगा। अब तक यह समूह किसी अन्य विषय पर बात करने लगा था।

शिखर भी फिर से लङकों की बातों पर ध्यान देने लगा था। उधर लङकी, जो शिखर के ससुर के खेतों में काम करने वाले मालू की बेटी श्यालमी थी की आंखों से झर-झर पानी टपकने लगा।

आज माँ के लाख मना करने पर भी उसने पेङ से तोङकर बहुत सारी कच्ची इमली खाई थी। उसी का परिणाम था या न जाने क्या कि उसे इस समय शौच के लिए जाने की आवश्यकता हो गई।

वह जानती थी कि इस समय उसकी कोई सहेली उसके साथ नहीं जायेगी। बस, उसे अकेले ही आना पङा। जिसका डर था वही हुआ। गाँव की सीमा पर उसे आवारा लङकों का समूह मिल ही गया। साथ में गाँव का जवाईँ भी उनके साथ था।
उसे अपने आप पर क्रोध आ रहा था कि आखिर माँ के मना करने के बाद भी उसने क्यों इतनी सारी इमलियाँ खाई।

दिन में शौच के लिए न जाना पङे उसके लिए उसके लिए उसने बचपन से ही घर एवं गाँव की सभी स्त्रियों को ऐसा भोजन करते देखा था जो शौच की क्रिया को नियंत्रण में रखता था।

बर्बाद न जाने के डर से पेट को गोदाम समझकर भर लेने वाली घर की स्त्रियाँ ऐसे खाद्यानों को कूङेदान में डाल देना अधिक उचित समझती थी जो उन्हें दिन की रोशनी में शौच के लिए जाने के लिए मजबूर कर सकता था।
श्यामली को घर आकर झूठ कहना पङा कि उसे राह में कोई नहीं मिला।
उधर शिखर मंडली के साथ अपने ससुराल पहुँच चुका था जहाँ उसके मनोरंजन के लिए गाँव की ही कुछ छोटी बच्चियाँ घूमर करने के लिए आई हुई थी। वहाँ भी वह गुलाबो को तलाशता रहा। यह मनोरंजन केवल पुरुषों के लिए था जो किया तो महिलाओं (बच्चियों) द्वारा जा रहा था किंतु महिलाओं को उसमें शरीक होने की इजाजत नहीं थी।
शिखर कुछ पलों के लिए गुलाबो को भूलकर बच्चियों के घूमर में घूमने लगा था। कान्हा के जोर देने पर वह भी उसके साथ नृत्य करने लगा था।
न जाने कब कान्हा ने उसके हाथ में देशी दारू की बोतल थमा दी थी। आज के पहले उसने कभी दारु नहीं पी थी। बीङी के कश लगाने की उसे कक्षा आठ से ही आदत हो गई थी क्योंकि वह उसे अपने ही घर में सहज रूप से प्राप्त हो जाती थी।

अपने पिता की कमीज से बीङी चुराकर घर के पिछवाङे में पेङ की ओट में जाकर पीना उसके लिए मुश्किल काम नहीं था किंतु दारू…..।

शिखर ने इसे एक सुनहरा अवसर माना और एक ही घूंट में बोतल खाली कर दी। उसे सीना जलता हुआ सा महसूस हुआ, लगा जैसे होम्योपैथिक की दवाई सीधे तौर पर गले में गई है जिसे वह एसिड कहा करता था। शिखर ने कान पकङ लिए कि आज के बाद वह कभी इस जहर को हाथ भी नहीं लगायेगा किंतु कुछ देर बाद जब दारु उसके खून में घूलकर अपना रंग दिखाने लगी तो उसे मजा आने लगा। उसके ऊपर हल्का-हल्का सुरुर छाने लगा था।
जैसे ही उसके ससुरजी, सरपंच साहब एवं समाज के अन्य वरिष्ठ जनों के साथ वहाँ पहुँचे दारू की बोतलें जादुई रूप से वहाँ से गायब हो चुकी थी। सभी के मुँह लाल रंग से रंग गए थे जो कहने भर को पान की मेहरबानी थे, वास्तविकता में दारू की गंध को वातावरण से हटाने का जरिया थे।
देर रात तक उत्सव चलता रहा। बच्चियाँ जब अपने घर लौट गई तो लङकों की मंडली ही चंग हाथ में लेकर नाचने लगे।

शिखर अब तक पूरे रंग में आ गया था। दारू अब उसके सिर चढ़कर बोलने लगी थी। वह इतना होश
में था कि जानता था कि क्या कर रहा है किंतु करना न करना उसके वश में नहीं था।
तभी उसे गुलाबो याद आई। उसकी याद आने के बाद अब उसे उससे मिलने से कोई नहीं रोक सकता था। लङखङाते कदमों से वह हवेली के भीतर प्रवेश कर गया।
नारायणी ऐसे कदमों से कान्हा को अक्सर प्रवेश करते देखने की आदी थी। उसने चुपचाप शिखर को गुलाबो के कमरे की तरफ भेज दिया। वह नहीं जानती थी कि उस कमरे में गुलाबो के साथ उसकी माँ भी है जो उसे ससुराल में शालीनता के साथ रहने के साथ सासू माँ एवं पति को वश में रखने के सबक सिखा रही है।

शिखर कमरे में प्रवेश कर गया। पलंग पर इत्मीनान से बैठी गुलाबो को उसने सासू माँ की उपस्थिति के अहसास का भान किये बिना पीछे से जाकर ही आलिंगनबद्ध किया। वह स्वयं को संभाल नहीं पाया एवं वहीं गुलाबो को साथ लेकर पलंग पर पसर गया।
जो हुआ वह इतनी शीघ्रता से हुआ कि गुलाबो और उसकी माँ कुछ समझ ही नहीं पाये। गुलाबो की माँ अपने जवाईं से कुछ कहे बिना तुरंत बाहर निकल गई। उसके चेहरे पर कुछ पलों के लिए चिंता के भाव आए किंतु वे जिस गति से आये थे उससे भी तेज गति से नदारद हो गए। अब वहाँ संतुष्टि के भाव थे मानों कह रहे हो “मर्द जात जब तक नशा न करे…..उसका मर्द होना ही सार्थक नहीं है…

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