पाक की नापाक संतान-खालिस्तानी आतंकवाद

कहते हैं कि दो पैसे की हांडी फूटी और कुत्ते की जात पहचानी गई लंदन में रविवार 12 अगस्त को हुई खालिस्तानी अलगाववादियों की रैली में जिस तरह पाकिस्तान की इंटर सर्विस इंटेलिजेंस (आईएसआई) ने आयोजक, प्रायोजक व प्रबंधक की भूमिका निभाई, उससे अब यह दिन के उजाले की तरह साफ हो गया है कि पंजाब में लगभग अढ़ाई दशक तक चले आतंकवाद के पीछे हमारा खुराफाती देश पाकिस्तान ही है।
वैसे यह कोई बड़ा रहस्योद्घाटन नहीं है और न ही पहला मौका जब पाकिस्तान की फितरत सामने आई हो परंतु जिस तरीके से आईएसआई ने सिख फार जस्टिस के नेतृत्व वाली आतंकवादियों व अलगाववादियों की रैली में अपनी सारी ताकत झोंकी, उससे अब खालिस्तान के नाम पर चल रहे कथित आंदोलन के पीछे की वैचारिक दरिद्रता का पटाक्षेप हो गया है। सिख समाज सहित पूरी दुनिया के लोग जान चुके हैं कि लश्कर-ए-तैयबा जैसे जिहादी संगठनों के बाद खालिस्तानी आतंकवाद पाकिस्तान की दूसरी अवैध संतान है और इसका सिख धर्म से कोई सरोकार नहीं है। हर्ष की बात है कि पाकिस्तान के कुछ वेतनभोगी सिख संगठनों व उनके नेताओं को छोड़ कर संपूर्ण सिख समाज ने इस रैली को कोई महत्त्व नहीं दिया और पंजाब में इसके खिलाफ सभी राजनीतिक दल एकजुट नजर आए।
रविवार 12 अगस्त को लंदन के ट्रैफलगर स्क्वायर में खालिस्तानी समर्थकों ने भारत विरोधी नारे लगाए और अलग देश की मांग दोहराई। पंजाब को खालिस्तान बनाने की मांग कर रहे अलगाववादी संगठन सिख फार जस्टिस (एसएफजे) ग्रुप ने रेफरेंडम 2020 के तहत रैली निकालकर लंदन घोषणापत्रा का एलान किया। कहा- जब तक खालिस्तान नहीं बनेगा, लड़ते रहेंगे। रैली में यूके और अमेरिका के अलावा यूरोपीय देशों से भी कुछ खालिस्तान समर्थक पहुंचे। एसएफजे ने जो दावा किया था उतनी संख्या में लोग नहीं पहुंचे।
रेफरेंडम के पीछे पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई का हाथ साफ हो चुका है। बताया जाता है कि ओसामा बिन लादेन जैसे दुर्दांत आतंकियों को शरण देने वाली पाकिस्तान की गुप्तचर एजेंसी आईएसआई ने इस मामले की भनक मिलते ही अपनी टीम को इस मुद्दे को हवा देने के लिए लगा दिया था। इसके लिए पाकिस्तान से सक्रिय खालिस्तान समर्थक दयाल सिंह रिसर्च एंड कल्चरल फोरम को आगे किया। इसने रेफरेंडम 2020 को लेकर पाकिस्तान में सिख धार्मिक स्थलों पर आने वाले भारतीय सिखों के बीच में खालिस्तान और रेफरेंडम के समर्थन में पर्चे और साहित्य बांटना शुरू किया।
आईएसआई की कोशिश रही कि भारत में भी अगर कोई सिख खालिस्तान के समर्थन में रेफरेंडम 2020 में शामिल होना चाहता है तो उसको आनलाइन पोर्टल पर मतदान का मौका मिल सके। कनाडा में रह रहा पाकिस्तानी आतंकी हरदीप सिंह निज्जर और खालिस्तानी आतंकी परमजीत सिंह पम्मा खुलकर रेफरेंडम के समर्थन में आए। इस काम के लिए पाकिस्तान सिख गुरुद्वारा प्रबंधक समिति का भी सहयोग लिया गया। यह कमेटी आईएसआई के जबरदस्त प्रभाव में है और इसके अध्यक्ष गोपाल सिंह कई बार दुर्दांत अंतरराष्ट्रीय आतंकी हाफिज सईद के साथ भी सार्वजनिक तौर पर मंचों पर देखे गए हैं। अबकी बार बैसाखी पर्व पर पाकिस्तान के ननकाना साहिब आने वाली सिख संगत को रेफरेंडम 2020 को लेकर खूब भड़काया गया और जगह-जगह बैनर लगा कर भारत विरोधी विषवमन किया गया।
खालिस्तानी दहशतगर्दी के लिए पाकिस्तान किस तरह कोशिश कर रहा है इसके उदाहरण उसके अधिकारियों द्वारा की जा रही करतूतें भी हैं। पाक सेना का लेफ्टिनेंट कर्नल शाहिद मोहम्मद मल्ही ही आंदोलन को बढ़ावा दे रहा है। अमेरिका, कनाडा और यूके में खालिस्तान समर्थकों को एकजुट करने में लगा है। दूसरी ओर खालिस्तानी रैली को अनुमति देने वाले लंदन के मेयर सादिक खान भी पाक मूल के हैं। वे भारत विरोधी मानसिकता से ग्रसित हैं और उन पर वहां रह रहे भारतीयों से पक्षपात के आरोप लगते रहे हैं। इसी तरह ब्रिटेन के ऊपरी सदन हाउस आफ लार्ड के सदस्य नजीर अहमद भारत विरोधी लाबी के सेनापति माने जाते हैं। उनका जन्म पाक कब्जे वाले कश्मीर में हुआ है। अहमद पर यूके में यहूदी लोगों के खिलाफ भावनाएं भड़काने के आरोप भी लगते रहे हैं।
अलगाववादियों की इस रैली में जो तीन प्रस्ताव पारित किए गए, वे भारतीय एकता-अखण्डता को सीधी-सीधी चुनौती हैं। प्रस्ताव के अनुसार पंजाब के लिए पूरी दुनिया में गैर सरकारी तौर पर जनमत संग्रह करवाने,भारत से पंजाब को अलग करवाने तक संघर्ष जारी रखने और रेफरेंडम के परिणामों के आधार पर मामला संयुक्त राष्ट्र में लेकर जाने का संकल्प लिया गया। पाकिस्तान की इस हरकत से भारत को लेकर उसका दोहरा चरित्रा एक बार फिर सामने आ गया है। एक तरफ पाकिस्तान के नवनिर्वाचित प्रधानमंत्राी पद के नेता इमरान खान पड़ोसियों से संबंध सुधारने की बात कर रहे हैं तो उनके इस साक्षात्कार के कुछ दिनों बाद ही भारत विरोधी रैली को सफल करने के लिए आईएसआई ने पूरी ताकत झोंक दी।
प्रश्न पैदा होता है कि क्या है सिख फार जस्टिस। असल में यह पंजाब में आतंकवाद के दौरान विदेश में शरण ले चुके खालिस्तानी तत्वों, पूर्व आतंकियों, अलगाववादी नेताओं का संगठन है जो सिखों के लिए न्याय के लिए संघर्ष की आड़ में आईएसआई का खालिस्तानी एजेंडा आगे बढ़ा रहा है। यह संगठन भारत में सिखों पर अत्याचार होने, सिख पंथ खतरे में होने, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को अल्पसंख्यकों के लिए खतरनाक होने का दुष्प्रचार फैला कर दुनिया के सिख समुदाय में भारत विरोधी भावनाएं भरने का काम करता है। यह संगठन खालिस्तान के पक्ष में धार्मिक तर्क-कुतर्क भी देता रहा है परंतु अब यह साफ हो गया है कि इसकी कोई वैचारिक पृष्ठभूमि नहीं बल्कि यह आंदोलन विशुद्ध रूप से दुश्मन देश की चाल है। आरोप है कि पंजाब के विगत विधानसभा चुनाव के दौरान इस संगठन ने आम आदमी पार्टी को अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन देकर पंजाब की राजनीतिक शक्ति अपने हाथ में लेने का प्रयास किया था परंतु आप के औंधे मुंह गिरते ही एसजेएफ की यह योजना भी धराशायी हो गई। अब एसजेएफ रेफरेंडम 2020 के नाम पर नया दांव आजमा रही है जिसकी
कड़ी में रविवार को लंदन में रैली की गई।
हर्ष की बात है कि इस मुद्दे पर भारत में राजनीतिक एकजुटता देखने को मिल रही है। पंजाब के मुख्यमंत्राी कैप्टन अमरिंदर सिंह इन्हें महत्त्व न देने की बात कह चुके हैं तो अकाली दल बादल के अध्यक्ष स. सुखबीर सिंह बादल ने राज्य के युवाओं को सावधान रहने को कहा है। अकाली दल के राज्यसभा सांसद नरेश गुजराल ने कहा-विदेश में रहने वाले बहुत थोड़े से सिख खालिस्तान की मांग कर रहे हैं। भारत में कोई भी इसके समर्थन में नहीं है। वहीं आल इंडिया एंटी टेरेरिस्ट फ्रंट के चेयरमैन एमएस बिट्टा ने कहा कि खालिस्तान न कभी बना था और न कभी बनने देंगे। भाजपा के राष्ट्रीय सचिव श्री तरुण चुघ एसजेएफ को आतंकियों का गुट बता चुके हैं। पंजाब के किसी भी सिख धार्मिक, सामाजिक संगठन, शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने रेफरेंडम 20202 में किसी तरह की रुचि नहीं दिखाई है। जम्मू-कश्मीर में मुंह की खाने के बाद पाकिस्तान पंजाब में जो खेल खेलने जा रहा है वह भारतीयों को अच्छी तरह समझ आने लगा है।

-राकेश सैन-

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