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अल्मोड़ा में जुगाड़ से बनाई गन की मांग हुई तेज… जंगली सुअरों, बंदरों को भगाने में हो रही कारगर साबित
ज़िला प्रशासन ने यह गन भी किसानों को सब्सिडी पर देने की योजना बनाई है। देहरादून। उत्तराखंड में पहाड़ी क्षेत्रों से पलायन की एक बड़ी वजह लोगों का खेती छोड़ना है और खेती छोड़ने की एक बड़ी वजह जंगली जानवरों, ख़ासकर बंदरों और जंगली सुअर का आंतक है। बंदर और सुअर न सिर्फ़ फ़सलों को
 
अल्मोड़ा में जुगाड़ से बनाई गन की मांग हुई तेज… जंगली सुअरों, बंदरों को भगाने में हो रही कारगर साबित

ज़िला प्रशासन ने यह गन भी किसानों को सब्सिडी पर देने की योजना बनाई है।

देहरादून। उत्तराखंड में पहाड़ी क्षेत्रों से पलायन की एक बड़ी वजह लोगों का खेती छोड़ना है और खेती छोड़ने की एक बड़ी वजह जंगली जानवरों, ख़ासकर बंदरों और जंगली सुअर का आंतक है। बंदर और सुअर न सिर्फ़ फ़सलों को नष्ट करते है बल्कि किसानों पर भी हमला कर देते हैं। इस वजह से किसान खेतों को बंजर छोड़ रहे हैं और पलायन कर रहे हैं। बंदरों और सुअरों के आतंक से निजात दिलाने के लिए अल्मोड़ा में जुगाड़ से एक गन बनाई जो खेती के दुश्मन इन जानवरों को भगाने में कारगर साबित हो रही है।

लॉकडाउन ने बनाया किसान, आविष्कारक 
लॉकडाउन की वजह से ड्राइवर रविंद्र तिवारी किसान बन गए। दरअसल लॉकडाउन की वजह काम-धंधा बंद हो गया तो अल्मोड़ा के पपरशैली निवासी रविन्द्र तिवारी ने बेकार पड़े सामान यानी कबाड़ से जुगाड़ करके एक गन बनाई। तेज़ आवाज़ करने वाली यह गन जंगली जानवरों और बंदरों को भगाने में कारगर साबित हो रही है।

रविंद्र तिवारी के इस अविष्कार या जुगाड़ के बारे में न्यूज 18 में ख़बर दिखाए जाने के बाद इस गन की मांग राज्य भर के पर्वतीय क्षेत्रों से आ रही है। इससे रविन्द्र को भी रोज़गार मिल गया है। ज़िला प्रशासन ने भी किसानों के लिए इस गन के फ़ायदे को समझा और इसे प्रमोट कर रहा है।

अब बंदर हैं दूर 
अल्मोड़ा के ज़िलाधिकारी नितिन भदौरिया ने ज़िला योजना के माध्यम से किसानों को यह गन देने की घोषणा की है। उन्होंने बताया कि जिस तरह से ज़िले में स्याही हल किसानों को 80 फीसदी सब्सिड़ी में दिए जा रहे हैं उसी तरह यह गन भी किसानों को देने की योजना बनाई गई है। इससे लोगों को सुअरों, बंदरों जैसे जंगली जानवरों के आतंक से मुक्ति मिल सकेगी।

पपरशैली के ही भास्कर तिवारी का कहना है कि वह 700 रुपये में गन खरीदकर लाए। इसके इस्तेमाल के बाद उनके खेतों में बार-बार आकर फ़सल नष्ट करने वाले बंदर अब दूर ही हैं। फ़ायर की आवाज़ सुनते ही वह भाग जाते हैं और अब उनके खेतों में कम ही आ रहे हैं। तिवारी कहते हैं कि अब उनकी सब्ज़ी अच्छी हो रही है।

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