मानस की डायरी….. कहानी संग्रह का भाग-9 “बबिता कोमल की कलम से”

“कठे हांडरा हा पूरअ दिन, कोई टेम है औ त्यौहार नअ घरा आबो को….(दिन भर कहाँ थे, क्या यह कोई समय है त्यौहार के दिन घर आने का)”

मैं नजरें झुकाये चुपचाप खड़ा था। मैं सदैव जल्दी ही घर आता हूँ, तब तो कभी कोई शाबासी नहीं देता कि घर के और बच्चे इधर-उधर भटकते रहते हैं पर तुम समय पर आते हो। आज मैं बहुत दिन बाद इतनी मौस-मस्ती करके आय़ा हूँ तो यह भी इन्हें पसंद नहीं आया। मैं सदैव चाहता था कि बाबा मुझसे बातें करे। मेरे हालचाल पूछे, पढ़ाई के बारे में पूछे पर वो तो सामने से निकलते समय भी बात नहीं करते। आज कर रहे हैं तो ऐसे….
यह मेरे विचारों का कारवाँ था जो उनके मुँह से निकलते आगे के कर्कश स्वरों के आगे थम गया था-
“दिन भर इया ही हांडोगा तो फेल हो जाओगा, ध्यान राखजो। इया ही बुद्धि कम है, पूरी ही खत्म हो जावगी।”
मैंने कोई जवाब नहीं दिया। माँ भी उनके साथ मिलकर उलाहना देने लगी थी। बाबा को मेरी मनःस्थिति से कब मतलब रहा था जो आज रहता। वे अपनी भड़ास निकालकर जा चुके थे। माँ उनके अधूरे काम को आगे बढ़ा रही थी मगर में वहाँ से हट गया था। मैं अपने कमरे में आ गया था।

पटाखे फूटाने और दीपक जलाने का सम्पूर्ण उत्साह स्वाहा हो चुका था, कदाचित् उसी आग में जिसमें बीस दिन पहले रावण को जलाया गया था।
दिन भर में कमाई खुशी तिरोहित हो गई थी। एक बार फिर केवल और केवल नकारात्मकता थी जो अंधियारे में दखेल रही थी। एक बार आत्महत्या करने के प्रयास एवं उसमें विफल होने के बाद वैसे कोई विचार अब नहीं आते थे किंतु जब बाबा कभी डाँटते थे तो घर छोड़कर जाने का विचार हावी हो जाता था। आज भी यही हो रहा था।

यहाँ मुझे कोई पसंद नहीं करता। क्या कारण हो सकता है इसका। बाबा मेरे सभी भाइयों से भी कम बात करते हैं पर जब करते हैं बहुत प्यार से करते हैं। न जाने ऐसा क्या है कि मुझसे जब भी बाते करेंगे बस डाँटने के लिए ही या नीचा दिखाने के लिए। वे क्यों नहीं समझते कि मेरा भी आत्म सम्मान है। मुझे कितना बुरा लगता है जब वे किसी के भी सामने मुझे नीचा दिखाते हैं।

पर वे ऐसा करते क्यों है। क्या मैं सच में कमबुद्धि वाला हूँ, क्या मैं बेवकूफ हूँ या वे मुझे कहीं और से उठाकर ले आये हैं। वे खुद भी तो दादाजी की संतान नहीं थे। उनके यहाँ गोद आये थे, कहीं ऐसा तो नहीं कि मैं भी गोद आया हूँ। नहीं ऐसा नहीं हो सकता, गोद तो तब लेते हैं जब खुद का बच्चा न हो। मेरे से पहले तो दो भाई और एक बहन है ही। कहीं कोई मुझे यहाँ छोड़ तो नहीं गया।

उफ्….कैसे कैसे विचार आ रहे हैं। पटाखों की गूंजती आवाज सीने में चित्कार पैदा कर रही है। फुलझड़ियों की खिड़की से आती रोशनी मेरे दिल को जला रही है। हे ईश्वर मैं क्या करूँ। कहाँ जाऊँ। मुझे आप ही कोई रास्ता दिखाओ।
विचारों का कारवाँ नकारात्मकता में डूबता हुआ दूसरी तरफ बढ़ चला था।

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मैं सच मैं अच्छा नहीं हूँ। इतनी किताबें पढ़ता हूँ, जानता हूँ कि रागेश्वरी के बारे में ज्यादा नहीं सोचना है पर वह हर पल ख्यालों में रहती है। मुझे इन सब चीजों से दूर रहना है। गीता में कृष्णजी ने लिखा है, हर एक जीव एक आत्मा है। न जाने कैसे फिर मैं केवल शरीर के मोह में डूबा रहता हूँ। और तो और लगभग हर रात को काम वासना के दौर से गुजरता है।
कल से मैं गौमुखासन करुँगा। बाबूराम कहता है कि ऐसा दिन में दस बार करने से पढ़ाई में मन लगता है और सौंदर्य आँखों के आगे नहीं आता।
न जाने मैं किस चीज के लिए व्याकुल है। कुछ ऐसा है जो मुझे परेशान कर रहा है। मुझे क्या चाहिए….हे ईश्वर मेरी मदद करो…

तभी नीचे से आती भाइय़ों के हँसने बोलने की आवाजें एक बार फिर विचारों के जंगल को बाधा पहुँचाती है। फिर घरवाले याद आ जाते हैं, साथ ही कुछ देर पहले पड़ी डाँट….मैं अकेला नीचे नहीं हूँ। सब मौज-मस्ती कर रह हैं पर किसी ने मुझे नहीं बुलाया। किसी को मेरी याद भी नहीं आई कि मैं नीचे क्यों नहीं हूँ। माँ को भी नहीं, वे तो जानती थी कि मैं नाराज होकर अपने कमरे में आया हूँ।

फिर घर छोड़कर जान का विचार मन में हावी होने लगता है। मैं जोर-जोर से रोने लगता हूँ। इतना कि मेरी आवाज बस मुझे ही सुनाई दे। मैं इस तरह नहीं रो सकता कि किसी और को पता चले। मैं मर्द हूँ और मर्द कभी रोते नहीं है, यह काम जनानी का है।

न जाने रोते-रोत कब आँख लग जाती है। आँख खुलती है तब तक सब बदल गया था। अब दिवाली नहीं थी। दिवाली कल थी और आज सड़कें बुझे दीपक और पटाखों के कचरे से अटी पड़ी थी। किसी को परवाह नहीं थी कि मेरी रात कैसी बीती। सब अपनी-अपनी दुनिया में व्यस्त थे। मैं भी पेट की भूख मिटाने माँ के समक्ष पहुँच गया था। उनसे कुछ उम्मीद करके कोई फायदा नहीं था। फिर भी उम्मीदें तो हो ही जाती है जो तुरंत नाउम्मीदी में बदले तो भी तकलीफ ही देती है।

माँ ने कल रात का जिक्र ही नहीं किया। मैं फिर एक बार उदास हो गया। चुपचाप बागान की तरफ बढ़ गया और एक पेड़ की डाल को वहीं पड़ी कुल्हाड़ी उठाकर काटने लगा। ऐसा हम अक्सर किया करते थे क्योंकि यह लकड़ी चूल्हे में जलाने के काम आती थी। न जाने कैसे डाल का एक हिस्सा पीछे की तरफ बने घर के दालान में जा गिरा और वहाँ से एक महिला मेरे ऊपर क्रोध करते हुए आ पहुँची।

वह मुझ पर चिल्ला रही थी, मुझे गालियाँ दे रही थी पर मैं आश्चर्यजनक रूप से उसे देख रहा था। वह अनन्य सुंदरी थी। रात को ईश्वर के करीब रहने के विचार अब तक तिरोहित हो गए थे। मैं खुशी-खुशी अपलक उसको निहार रहा था। उसके द्वारा दी जा रही गालियाँ भी मीठी लग रही थी।
मैंने डाल काटना बंद कर दिया था। वह मुझे शांत खड़ा देखकर लौट चुकी थी और मैं अब भी उन राहों को निहार रहा था…..रागेश्वरी का ख्याल अभी किंचित मात्र भी नहीं था….उसके ख्यालों पर अभी कुछ पल के लिए शायद इस अपूर्व सुंदरी ने कब्जा कर लिया था..

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