मानस की डायरी….. कहानी संग्रह का भाग-8 “बबिता कोमल की कलम से”

तेरह साल के बच्चे की मनःस्थिति को कोई नहीं समझता। न वह छोटा होता है और न ही बड़ा।

ट्यूशन वाले मास्टरजी स्कूल में कम आये नम्बर को ज्यादा करवा देते हैं, ताकि उनकी नौकरी न छूटे, और न ही नाम खराब हो, इसमें बच्चे की क्या गलती है। उसे मौका मिला नहीं पढ़ने का, तो वह क्यों पढ़ेगा।
अब ऐसा न हो पायेगा। या हो पायेगा तो भी तो बाकी विषयों के अध्यापक मजाक उड़ाते हैं, वहाँ रागेश्वरी भी तो रहेगी। क्या करे वह, सबके सामने अपमानित होने से तो अच्छा है कि यह दुनिया छोड़ दी जाए। हाँ, यह अच्छा है।

आम का पेड़ इसके लिए उपयुक्त स्थान होगा। आज से परीक्षा शुरु है। कॉपी में क्या लिखेगा, कुछ भी तो आता नहीं है। हाँ…हाँ….आम का पेड़ ही सारी समस्याओं का हल निकाल कर देगा। फिर जब परीक्षा परिणाम आयेगा तो सभी छात्रों के सामने मास्टरजी नहीं धिक्कार पायेंगे।
वह चल पड़ता है हाथ में वह रस्सी लेकर जो फैक्ट्री में बर्तनों के कार्टुन बाँधने के काम आती है। सुबह के समय बागान में कोई नहीं है। हाथ में एक काठ का टुकड़ा भी है, जिस पर खड़े होकर ईश्वर को अंतिम बार याद करना है और मरते समय उसे हटाकर सभी दुःखों से छुटकारा पा लेना है। धूबड़ी में आई साध्वीजी का प्रवचव सुनने जब माँ के साथ गया था तो वे अपने प्रवचन में कह रही थी-
“मृत्यु के तुरंत पहले यदि ईश्वर को स्मरण करना याद रखा जाए तो स्वर्ग मिलता है।”

वह तो सोच समझकर मरने के लिए प्रस्तुत है, तो ईश्वर साथ होने ही चाहिए। सभी तैयारी हो चुकी है। डाल से रस्सी को बाँध दिया है और दूसरे छोर का फंदा बनाकर गले में डाल लिया है। अब, बस ईश्वर और मैं और नीचे सहारे के लिए पड़े काठ के टुकड़े को लात…….पर यह क्या, नहीं……ऐसा कैसे कर सकता हूँ मैं, मेरे ईश्वर मेरे साथ है, मैं कोई और नहीं हूँ, मैं खुद हूँ, मैं कैसे खुद को मार दूँगा। मैं मर जाऊँगा तो खुद को कहाँ से लाऊँगा।

मुझे जीना होगा। अभी तो रागेश्वरी के साथ भविष्य के लिए देखे सपनों को पूरा करना है। बाबा की तरह धन कमाकर रौब जमाना है। बड़ा सन्यासी बनना है। ईश्वर के बारे में जानना है। कितना कुछ है जो करना है….नहीं…नहीं मैं नहीं मर सकता।

मास्टरजी धिक्कारेंगे, तो मैं सुन लूँगा। अगली बार पूरी मेहनत से पढ़ाई करूँगा और कक्षा नौ पास करूँगा। जानता हूँ कि बाबा के भय से इस कक्षा में मुझे फेल तो कर नहीं सकते….अभी स्कूल जाता हूँ और परीक्षा देता हूँ।
और इस तरह कक्षा आठ में किया गया आत्महत्या का प्रयास ऐन समय स्थगित होने के कारण मैं डायरी में यह वाकया लिखने के लिए प्रस्तुत था और अभी कक्षा दस का अपनी मेहनत के दम पर पास होने का रिजल्ट ले रहा था।

होठों पर मुस्कान थी और आँख में पानी। कितनी बड़ी गलती करने वाला था मैं दो वर्ष पहले….पर अब नहीं…जो बीत गया उसको बदला नहीं जा सकता पर आने वाले को सुधारा जा सकता है। अभी फाइनल परीक्षाओं में छह महीने की देरी है। मैं जीजान से पढ़ाई करूँगा। मुझे कॉटन कॉलेज में एडमिशन लेना है। ऐसा तभी हो पायेगा जब मैं मेहनत करूँगा।

मेरी मदद कौन करेगा इसमें….हाँ भुवेन सर…वे जरुर मेरी मदद करेगें। वे हमेशा से चाहते थे कि मैं अच्छी तरह पढ़ाई करूँ। उन्हें प्रारम्भ से ही लगता था कि मैं यदि मेहनत करूँ तो अच्छे नम्बर ला सकता हूँ पर मैंने कभी उनकी बातों की तरफ ध्यान नहीं दिया। अब नहीं….

भुवेन मास्टरजी मेरी बात सुनकर बहुत खुश हुए। वे पढ़ाने के लिए तैयार थे, तब भी जब उन्हें घोष मास्टरजी ने ऐसा न का सुझाव दिया था, कक्षा दस में मुझे पढ़ाने से उनका नाम खराब हो सकता था क्योंकि मेरे जैसे कमजोर छात्र पर समय बर्बाद करके कुछ नहीं होने वाला।

भुवेन मास्टरजी ने उनके अमूल्य सुझाव को बेकार सुझाव समझकर दूसरे कान से निकाल दिया था। अब वास्तविक पढ़ाई शुरु हुई थी। एक ही लक्ष्य था, कॉटन कॉलेज में दाखिला….

आज पढ़ने का मन नहीं था। दिवाली का मौका था इसलिए दोस्तों के साथ कुछ मौज-मस्ती करने का मन हो गया था। बहुत दिन बाद खेलने का मौका मिला तो दिल खुश हो गया। बाबूराम के पास बताने के लिए कितनी सारी बातें थी। भूत की बातें जिसको उसने बहुत बार देखा था, उस लड़की की बातें जो बचपन में हमारे साथ पढ़ती थी और अब गुवाहाटी पढ़ती है, कुछ दिन पहले उसे अचानक बाजार में मिल गई थी और नजरें मिलते ही अपनी माँ के पीछे ऐसे छुप गई थी जैसे प्रेमिका वर्षो बाद अपने प्रेमी को देखकर शर्मा जाती है।

हम सभी बचपन की बातें करने लगे।
तब हम कितने खुश थे। दिन भर खेलना और खाना। पढ़ाई की कोई चिंता ही नहीं थी। अब कितने दुःखी है। कभी घर का काम तो कभी पढ़ाई। कभी कुछ बच्चे वाली हरकत कर देते हैं तब माँ और बाबा पल में कह देते हैं-
“तुम अब बड़े हो गए हो, बच्चों सी हरकतें छोड़ दो।”
कभी कुछ ऐसा कर देते हैं जो उनकी नजर में बच्चों को करना चाहिए तो पल में कान पकड़कर माँ गाल में तमाचा जड़ कर कह देती हैं-
“बच्चे हो बच्चे की तरह रहो, अभी से बड़ा बनने की हिम्मत मत करो….”
समझ में ही नहीं आता कि हम छोटे है या बड़े।
हम बहुत देर तक आपस में एक-दूसरे का दुःख बाँटते रहे थे। मन का भार हल्का हो गया था। शाम घिरने वाली थी और दिवाली थी। घर में पूजा प्रारम्भ होने वाली थी। मुनिमजी के साथ मिलकर पूरी फैक्ट्री में वैसे ही दीपक सजाने का मन हो गया था जैसे बचपन में सजाते थे। छोटे भाइयों के साथ मिलकर ढेरों पटाखे छुड़ाने थे इसलिए मैं तेज कदमों से घर की तरफ लौट आया था।
राह में फूटते पटाखे आनन्द दे रहे थे। बाहर होती रोशनी आज भीतर में भी रोशनी प्रज्वलित कर रही थी क्योंकि दोस्तों से उनके बारे में जानकर अहसास हुआ था कि मैं अकेला ही दुःखी नहीं हूँ, वे भी दुःखी है। दूसरों को दुःखी देखकर अपना दुःख कम हो जाता है, ऐसा ही मेरे साथ हुआ था।

दरवाजे पर ही बाऊजी मिल गए थे। न जाने कितने दिन बाद आज वो मुझसे बात करने वाले थे क्योंकि उन्होंने मुझे पुकार लिया था। यह पुकार सामान्य नहीं थी। यह वैसी पुकार थी जो वे किसी को तब देते थे जब वे उस पर अत्यधिक क्रोध में होते थे…..आज न जाने मैंने ऐसी कौनसी गलती कर दी थी….मेरा ह्रदय काँपने लगा था। कुछ देर पहले तक बसी दिल की खुशी पलक झपकते ही नदारद हो गई थी और उसके स्थान पर डर ने अपना कब्जा कर लिया था….

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