मानस की डायरी….. कहानी संग्रह का भाग-7 “बबिता कोमल की कलम से”

नदी किनारे मिली परी और भूत ने साथ मिलकर रात बिताई।

यह स्वप्न डायरी में उतारने जैसा नहीं था क्योंकि मैं भूत नहीं था। परी के साथ रात बिताने वाला कोई मेरे जैसा खूबसूरत बाँका नौजवान होना चाहिए जिसे देखकर लड़कियाँ पलटकर देखने के लिए मजबूर हो जाए। कल शाम छह महीने बाद आने वाली मैट्रिक की परीक्षाओं के लिए जी जान से पढ़ने का मन बनाया था। दिमाग ने मन के विचार पर दस्तख्त करके लिखित सहमती भी दे दी थी मगर बीती रात में सपने में भूत ने आकर सब गुड़ गोबर कर दिया था।

सुबह उठा तब न पढ़ाई याद थी और न आज पहले टर्म का मिलने वाला रिजल्ट। मैं फिर नदी किनारे टहलने चला गया था। बहती नदी शांत थी किंतु मन अशांत। कारण तलाशा तो जल्द ही मिल गया था। मेरे मन को विचलित करने वाले वे बच्चे थे जो नदी किनारे अपना और अपने परिवार का पेट भरने के लिए मछलियाँ पकड़ रहे थे।

मन उन बच्चों के लिए घृणा से भर गया। उमड़ते-घुमड़ते विचार मछलियों के लिए इतने ममतावान बने की नन्हें मछुआरों को बद्दुआ देने लगे- अगर इन्हें भी कोई ऐसे ही उबलते तेल में पकाये और खाये तो कैसा महसूस होगा।

मैं उनके बिल्कुल पास खड़ा था। मेरे भीतर बार-बार रिवाइन हो रही कैसेट यदि गलती से चल जाती तो मैं शायद अपने पैरों पर घर नहीं पहुँच पाता किंतु अभी वे बच्चे मुझे देखकर मुस्करा रहे थे। उनकी निश्चल मुस्कान ने मन की गति को न जाने कैसे तुरंत बदल दिया और मैं सोचने लगा-
कितना मुश्किल है इनका जीवन। अपने आस-पास पसरे राजशी साम्राज्य के लिए पहले बहुमान आया और फिर ग्लानि। काश मैं भी इस तरह के जीवन का अनुभव कर पाता। तभी बाबूराम ख्याल में आ गया। कितना गरीब है वह। कितनी बार उसके घर में शाम का भोजन बनाने के लिए भी राशन नहीं होता।

पिछले महीने ही तो मैंने उसे दो रुपए दिये थे। पूरे दो रुपए यानी दौ सौ पैसे। मेरे पूरे एक महीने की बचत जो बाबा हाट में कुछ खरीदने के लिए हफ्ते में दो बार पच्चीस-पच्चीस पैसे के रुप में देते हैं। फिर विचार स्वयं पर अभिमान करने लगे।

पैसे याद आने से गले में पड़े दूसरे ताबीज पर हाथ चला गया। यह बीस पैसे का नहीं था जो मैं ट्रेन का लम्बा सफर करके नन्हें तांत्रिक से लाया था। यह पाँच धातू से मिलकर बना था और इसे खरीदने के लिए मैंने पूरे चालीस रुपए खर्च किये थे। कीमत सुनकर दिल धक से रह गया था। सालों से जोड़ी सम्पत्ति का एक चौथाई भाग पल में हाथ से खिसकने का डर सताया था किंतु आने वाले सालों के लिए यह करना जरुरी था क्योंकि वैधजी (साहूराम के ममेरे भाई जो मेघालय में किसी गाँव में रहते थे और यहाँ छुट्टियाँ बिताने आये थे और जड़ी बूटियों के साथ ताबीज देकर इलाज करते थे) ने साफ कह दिया था- ताबीज पहनकर नहीं रखा और समय पर औषध न खाई तो भाईसाहब से भी खराब स्थिति में पहुँच जाओगे।

मुझे कुछ हो गया तो जमा किये धन का क्या करूँगा। रागेश्वरी पर वार देना चाहता हूँ पर कैसे…मैं ही नहीं रहूँगा तो बाबा उसे भी कारोबार में लगा देंगे। नहीं…नहीं….मेरी मेहनत की कमाई बाबा के हाथ में नहीं जानी चाहिए…

आखिरकार गले में ताबीज आ ही गया। माँ का डर था कि देखकर बोलेगी- कुछ दिन पहले ही तो दूसरा ताबीज लाया था अब यह……
पर माँ ने कुछ नहीं कहा….माँ को इतना समय ही कहाँ है कि वह मुझे इतनी गौर से देखे। माँ को मेरे छोटे तीनों भाइयों और बाबा से फुरसत मिले तब तो माँ मेरी खोज खबर ले।

अब भी अपेक्षित परिणाम नहीं मिले थे। वैधजी से कहता तो वे बोले- एक महीने औषधि खाओ….सब कुछ धीरे-धीरे होता है।
हाँ….धीरे-धीरे ही तो होता है। भाईसाहब धीरे-धीरे ही तो इतने असहाय हो गए हैं कि खुद उठ ही नहीं पाते। मैं साहूराम के अतिरिक्त यह पीड़ा किसी से नहीं बाँट सकता। माँ हम बच्चों में किसी की तरफ तब विशेष ध्यान देती है जब हम खाना-पीना छोड़ दे या बुखार से शरीर तपने लगे। इन लक्षणों के अतिरिक्त कही गई पीड़ा कभी स्कूल न जाने का बहाना लगती है तो कभी उनका ध्यान आकर्षित करने की कवायद।

माँ याद आते ही पेट अपनी पीड़ा बताने लगा था। माँ से मात्र भोजन का ही तो रिश्ता रह गया था। पहले वे पढ़ाई के बारे में पूछ लिया करती थी। अब घर पढ़ाने आने वाले मास्टरजी घोष बाबू के भरोसे छोड़कर पूरी तरह निश्चिंत हो गई है। यूँ भी उन्हें मुझसे अधिक कुछ आशाएँ भी नहीं है क्योंकि थर्ड डिविजन पास होने वाले बच्चे से और दिन भर अपने कमरे और किताबों में खोये रहने वाले बच्चे से भला क्यों कोई इतना लगाव रखेगा, वह भी तब जब उनके पास पाँच बेटे और हैं।

हाँ, आज भी तो रिजल्ट आने वाला है।
यंत्रवत सा घर पहुँचकर नहा-धोकर, खा-पीकर स्कूल आ गया हूँ। मास्टरजी ने परिणामों की घोषणा कर दी है। मैं खुश हूँ क्योंकि इस बार मैं किसी भी विषय में फेल नहीं हुआ। मास्टरजी को पापा के रुतबे एवं अपने नाम एवं नौकरी को बचाने के लिए मेरे नम्बर नहीं बढ़ाने पड़ेंगे।

विष्णु घोष मास्टरजी आज तक यही तो करते आये हैं। कक्षा छह में मैं सभी विषयों में फेल हो गया था। मास्टरजी ने ही तो कक्षा अध्यापकजी से कहकर मेरे नम्बर बढ़वा दिये थे, ताकि उन्हें बाबा मेरे ट्यूटर के पद से बर्खाश्त न करे और उनके द्वारा घर जाकर पढ़ाये जाने वाले बच्चों के फेल हो जाने का नाम उनके चमकते नाम को दागदार न कर दे।

आज तक ऐसे ही तो यहाँ तक पहुँचा हूँ। रिजल्ट हाथ में है, पहली बार अच्छा भी आया है किंतु मन कक्षा आठ की परीक्षाओं के पहले के एक वाकये को याद कर रहा है जब मैं परीक्षा की बहुत ही खराब तैयारी के कारण बागान में बने आम के पेड़ के नीचे हाथ में रस्सी लेकर चला गया था…..

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