मानस की डायरी….. कहानी संग्रह का भाग-6 “बबिता कोमल की कलम से”

माँ की डाँटने की आवाज कान में गई तो स्वप्नों की दुनिया से बाहर आ गया। बहुत सुंदर स्वप्न था, जो देखा था वह आँख के आगे तैर रहा था। मैं सोच रहा था कि उठकर डायरी में अकिंत करूँगा किंतु जैसे ही नित्य क्रिया से निवृत होकर लौटकर आय़ा, स्वप्न, स्वप्न की तरह ही मानस पटल से गायब हो गया था। अफसोस के साथ मित्रों के साथ बाहर खेलने निकल गया कि कल यदि ऐसा ही कोई स्वप्न देखा तो उठते ही सर्वप्रथम उसे अंकित करूँगा।
दिन भर रागेश्वरी के साथ बिताये पल दिलोदिमाग में इस अहसास के साथ छाये रहे के यहाँ मात्र मैं हूँ जिसने कल लम्बा समय उसके साथ बीताया है।

शाम को नदी के किनारे घूमते समय अचानक से गोपाल ने कहा-
“क्या तुम जानते हो, मैंने भूत देखा है।”
“जा हट, कुछ भी बोल रहा है, जानते हो भूत के पैर उलटे होते हैं, तुम उसे कैसे देख सकते हो !”
“मैं सब कर सकता हूँ, वह सामने नीम का पेड़ है न उस पर ही तो रहता है भूत का परिवार। वह रात को वहाँ अपने परिवार से मिलने आता है।”
“सच मैं…!”
मैंने आश्चर्य के साथ गोपाल से पूछा जो पूरे विश्वास के साथ भूत के साथ बिताये पलों का जिक्र कर रहा था। उसे देखकर बाबूलाल भी जोश में आ गया-

“भूत की क्या बात, वह तो डरावना होता है, उस चुड़ैल के पति की तरह जिसका डर दिखाकर माँ मेरी छोटी बहन को खाना खिलाती है, मैंने तो परी भी देखी है। बहुत सुंदर, वैसी ही जैसी सरिता (पत्रिका) में छपी लड़कियाँ होती है….नहीं..नहीं….उनसे भी बहुत सुंदर…जानते हो उसके पंख भी होते हैं और वह उड़ भी सकती है….”
उसकी बात काटकर गोपाल बोला- “ऐसा हो ही नहीं सकता कि तुम परी को देख लो। परियाँ तो बहुत दूर स्वर्ग में रहती है। वे वहाँ से यहाँ आ ही नहीं सकती। यह दिन भर रागेश्वरी के बारे में सोचता रहता है इसलिए इसे चारों तरफ परी ही दिखती है…”
मैंने गोपाल से कहा- “चल तेरे भूत से मैं भी मिलना चाहता हूँ, आज मुझे गोविंद की परी से मिलने की कोई इच्छा नहीं है।”
गोपाल मेरी तरफ देखकर चौंक गया था। लड़कियों की या परियों की बात आये और मैं उसमें रुचि न दिखाऊँ, ऐसा उसे संभव नहीं लग रहा था।
मैं कुछ कहता उससे पहले ही साहूराम ने रस लेकर कल शाम की घटना का उनके सामने जिक्र कर दिया। सभी मित्रों के कान खड़े हो गए। मैं और साहूराम, रागेश्वरी से मिलकर आये हैं यह सुनकर उन्हें हमसे जलन होना स्वाभाविक ही थी। वे आहें भरकर साहूराम से वे बातें भी सुन रहे थे जो कदाचित् हुई ही नहीं थी। रागेश्वरी का जिक्र आने से वातारवण भूतमय से हटकर परीमय हो गया था।
नदी के किनारे भूतों और परियों का यह मिलन कुछ रंग लाता उसके पहले ही आने वाले कल स्कूल में परीक्षाओं के अंक बताने के समय के आने वाले पलों को गोविंद ने याद कर लिया और अब वातावरण चिंतामय हो गया। उससे भी कहीं अधिक क्योंकि घर जाकर शाबासी मिलेगी या प्रताड़ित होना पड़ेगा, यह तो कल ही पता लगने वाला था।
मेरे घर में परीक्षा परिणामों का खास फर्क नहीं पड़ता था। बाबा ने कभी हम भाई-बहनों की पढ़ाई में कोई रुचि नहीं दिखाई थी। माँ भी दिन भर अपने कार्यों में व्यस्त रहती थी मगर साहूराम के घर खराब परीक्षा परिणाम का मतलब उंगलियों के बीच में पेंसिल दबाकर उंगलियों को तब तक दबाना था जब तक साहूराम रोते-रोते पचास बार यह न कह चुका होता- “बस, इस बार माफ कर दो, अगली बार कक्षा में फर्स्ट आकर ही दिखाऊँगा।”
उनकी कही बातें सुनकर रूह काँप जाती थी। कमोबेश हर एक मित्र के अभिभावकों का यही हाल था जिसे जानकर मैं अपने उदासीन माँ-बाबा के व्यवहार से खुश हो सकता था पर मुझे कोई खास खुशी नहीं होती थी। मैं दोनों तरफ का आधा-आधा लेना चाहता था।

मित्रों के घर में घटित होने वाले दृश्यों में से मारपीट और डाँटने वाले कार्यक्रम को हटाकर मात्र माता-पिता की पढ़ाई के लिए चिंता और मेरे घर में पलती उदासीनता के बदले स्नेह से परीक्षा के परिणामों को जानने की ललक।
मैं उदास हो गया था। जानता था कि घर में कोई नहीं पूछेगा कि क्या परिणाम रहा। यह भी जानता था कि थर्ड डिवीजन से पास होने वाले बच्चे का परिणाम जानकर भी कोई क्या करेगा पर साथ में यह विचार भी हावी गो गया कि बड़े भाईसाहब तो सेकंड डिवीजन से पास होते हैं, उनके परिणामों को जानने के बारे में भी तो कोई उत्सुक नहीं रहता।

गोविंद के चेहरे पर भय तैर आया था। कुछ देर पहले की परी और भूत की बातें तिरोहित हो गई थी। माँ द्वारा गाल पर पड़ने वाली थप्पड़ और बाबा द्वारा आज तक उसके ऊपर किये गए खर्च के हिसाब का कल फाड़े जाने कच्चे चिट्ठे को वह आज ही महसूस करने लगा था।

मैं अब फिर भूत के बारे में सोचने लगा था। क्योंकि मेरे पास उनको बताने के लिए कोई अनुभव नहीं था जिसमें मुझे पढ़ाई के लिए घरवालों की डाँट पड़ी हो या माँ ने पीछे हाथ बाँधकर मारा हो। कभी-कभी जब सब अपने साथ घटित कुछ ऐसा बुरा बता रहे हो जिसकी गहराई में माँ-बाबा की चिंता हो, और खुद के पास वैसा बताने के लिए नहीं हो तब भी कितना बुरा लगता है, मैं महसूस करने लगा था।

मेरे दोस्त मुझे कहते थे कि मैं मारवाड़ी होकर भी बंगाली या असमिया में सोचता हूँ। मेरी सोच मारवाड़ियों जैसी हो ही नहीं सकती क्योंकि हिंदी में मुझे सोचना ही नहीं आता। इस वाक्य के क्या मायने थे यह तो मैं नहीं जानता किंतु आज यह सोच रहा था कि मुझे मारवाड़ी घर में जन्म न लेकर असमिया या बंगाली घर में जन्म लेना था, जिससे भले मुझे खराब रिजल्ट आने पर डाँट और मार पड़ती मगर साथ में मेरी देखभाल करने वाले माँ और बाबा तो मिलते। उस घर में सात-आठ भाई-बहन तो नहीं होते…..दो-तीन बच्चे ही होते तो उनका कितनी अच्छी तरह ख्याल रखा जाता।
तभी यह ख्याल भी आया था- मेरे किसी भी मित्र के बाबा की मेरे बाबा की तरह बड़ी बर्तनों की फैक्ट्ररी नहीं है। सब नौकरी करते हैं। उन्हें क्यों इतने बच्चे चाहिए। मेरे बाबा को चाहिए, क्योंकि उन्हें फिर अपनी फैक्ट्री में उतने कर्मचारी कम रखने पड़ेंगे। दरमाह (वेतन) कम देना पड़ेगा।
बड़े भाईसाहब दिन भर गद्दी में बैठकर बहीखाते किया करते थे। वे बाबा के दाहिने हाथ बन गए थे पर बाबा ने उन्हें कोई अधिकार नहीं दिया था।

मंझले भाईसाहब तो बीमार रहते थे, उनसे ढंग से न पढ़ाई हो सकती थी और न ही काम। बाबा मेरे साथ भी बड़े भाईसाहब जैसा ही कर सकते थे इसलिए मैं और अधिक मेहनत करके मैट्रिक पास करना चाहता था जिसमें अभी पूरे छह महीने बाकी थे। इतने अच्छे नम्बर की बाबा चाहकर भी मुझे पढ़ाई छुड़ाकर बहीखाते करने न बैठा पाये

यह मानसिक बदलाव था जिस पर मैं अब और अभी से ही काम करने वाला था। आश्चर्यजनक रूप से भूत और परी दोनों को ही देखने का विचार तिरोहित हो गया था और मैं घर आकर पढ़ाई में लग गया था। अब मुझे कल आने वाले परिणामों की चिंता नहीं थी, चिंता थी तो मात्र छह महीने बाद आने वाले परिणामों की…

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