मानस की डायरी….. कहानी संग्रह का भाग-5 “बबिता कोमल की कलम से”

काश समय को मुठ्ठी में बाँधकर रखा जा सकता,

मैं ऐसा करने के लिए अपना सब कुछ लूटा सकता था, वे पैसे भी जो हाट लगने पर मूरी-पुचका खाने के लिए मिला करते थे पर मैं भविष्य निधि योजना का अंश बनने के लिए जीभ और पेट को वश में रखकर उन्हें जमा किया करता था।

पिछले कुछ वर्षों में मैंने उन पैसों को, जो अब तक कई सौ रुपयों में बदल गए थे और जिन्हें अपने कपड़ों के पीछे बड़ी हिफाजत से रखा हुआ है, गिना भी नहीं था। न जाने कितने वर्षों से जमा कर रहा था स्मृति में नहीं है किंतु मैं उन्हें बड़ी हसरत से निहारा करता था। अब तक जिंदगी में मेरी वही तो जमा पूंजी थी और एक मारवाड़ी के लिए जमा पूंजी के क्या मायने होते हैं इसकी व्याख्या करने की आवश्यकता ही नहीं है।

रागेश्वरी के मुँह से निकलते सात स्वरों के आगे यह पूंजी नगण्य ही नहीं थी इसे एक साथ उस पर वारकर किसी को दी भी जा सकती थी। इस समय वह पूंजी मेरे हाथ में होती और पास में कोई वाद्ययंत्र बजाने वाला होता तो कदाचित् मैं ऐसा कर चुका होता (किसी के नाचने या गाने पर उस पर वारनी फेरनी (नजर उतारकर) करके, बाजा (वाद्ययंत्र) बजाने वालों को वे पैसे दे देने का रिवाज मैंने राजस्थान में कई शादियों में देखा था)।
मैं रागेश्वरी की मीठी आवाज को किसी की भी हाय से बचाना चाहता था इसलिए खुश भी था कि साहूलाल जा चुका था। जहाँ मन में चोर होता है वहाँ, तन चोर बनकर अपनी ही दाढ़ी में न लगे तिनके को संभालने लगता है। मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही था इसलिए उसके साथ इतना समय बिताने का भार मैंने असमिया के गृह-कार्य की उस कॉपी पर डाल दिया था जो मैं उससे लेकर जाने वाला था।
शाम ढल आई थी। अब मेरे जाने के समय की सभी हदें पार हो चुकी थी। वह भी मेरे साथ को कदाचित् जी भरकर जी रही थी इसलिए अब मुझे चला जाना चाहिए वाला भाव, मैं उसके ही प्रेम में डूबी अपनी आँखों से उसके हावभाव से कैद नहीं कर पाया।

दीया बत्ती का समय हो गया था। घर के अंदर से आती धूने की खुश्बू और धुएँ ने जाने के अंतिम संकेत दे दिये थे। अब मैंने उससे असमिया की कॉपी माँगी थी। वह मुस्कराती हुई भीतर चली गई थी। उसके कमरे में नजरें दौड़ाई तब पहली बार अहसास हुआ कि मैं स्वप्न नहीं देख रहा हूँ, जो घट रहा है वह सौ फिसदी सच है। मैं स्वयं को हाथ लगाकर अपने वास्तविक धरा पर होने के अहसास को महसूस करने लगा था। इतना ही नहीं मैंने घटती घटनाओं को वास्तविक मानने के लिए उस कुर्सी को भी छूकर देखा था जिस पर मैं न जाने कितनी देर बैठा था किंतु अभी मुझे अहसास हो रहा था कि मैं अभी ही तो आया था और अभी ही मुझे लौट जाना है।

मुस्कराती हुई वह कॉपी हाथ में लेकर लौट आई थी। अब विचारधारा बदल गई थी। वह नहीं तो कोई बात नहीं कम से कम उसके खूबसूरत हाथों से लिखी कॉपी तो कुछ दिन के लिए मेरे पास रहेगी। मैं होमवर्क करने की कोई जल्दी नहीं करूँगा। ऐसे भी मास्टरजी कहाँ मेरी कॉपी जाँचने में रुचि रखते हैं।

मेरी आँखों के आगे क्लास का नजारा तैर आया था जब एक नहीं कई बार मास्टरजी ने मेरे पढ़ाई में कमजोर होने के लिए (इतना कमजोर भी नहीं था, थर्ड डिविजन या ग्रेस से तो पास हो ही जाता था) मुझे रागेश्वरी के सामने उन सहपाठियों से भी अधिक डाँटा था जो कक्षा में फेल ही हो जाते थे।
अब मैं बहुत अच्छी तरह पढ़ाई करूँगा। साहूराम कहता है कि लड़कियाँ उन लड़कों को अधिक पसंद करती है जो कक्षा में प्रथम आते हैं। प्रथम आना तो कदाचित् मेरे लिए किसी स्वप्न से भी अधिक था किंतु रागेश्वरी से विदा लेते समय मैं अब ध्यान लगाकर पढ़ाई करने का संकल्प ले चुका था। यह संकल्प लेते समय मेरी आँखों के आगे असम की सबसे प्रसिद्ध कॉटन कॉलेज भी तैर आई थी जिसमें में कक्षा दस के बाद पढ़ना चाहता था। मुझसे और मेरी पढ़ाई से कोई वास्ता न रखने वाले मेरे बाबा शायद मेरे अच्छे अंक देखकर मुझे गुवाहाटी जाकर पढ़ने की इजाजत दे सकते थे।

यह परीक्षा मुझे इसी वर्ष तो देनी थी। अभी से मैं तैयारी करके यह मूकाम हासिल कर सकता था। पूरी राह कॉटन कॉलेज और रागेश्वरी ख्यालों में छाई रही थी। घर आने पर माँ ने देरी से लौटने का कारण पूछा था और मैं रागेश्वरी की कॉपी दिखाकर मुस्करा दिया था।

माँ भोजन परोसते समय न जाने क्या बड़बड़ा रही थी पर मैं मुस्करा रहा था। होठों पर स्वमेव आ रही हँसी को चाहकर छिपाना चाह रहा था पर कदाचित् असफल ही हो रहा था इसलिए नींद आने का बहाना करके अपने कमरे में आकर लेट गया था। घर बड़ा होने के यह एक फायदा था कि मैं अकेला सोता था। मैं अब रागेश्वरी के साथ बिताये पलों को बिछाकर और ओढ़कर बड़े आराम से सो सकता था।
उसके पास पहुँचने से लेकर लौटने तक का एक-एक दृश्य रेडियो में फरमाईश पर पुनरावर्ति होकर बजने वाले गीत की तरह चल रहा था। न जाने कितनी बार मैंने उन दृश्यों को, और अधिक बढ़ा-चढ़ा कर देख लिया था जो कुछ देर पहले घटित हुए थे। मुझे कॉपी पकड़ाते समय उसके हाथ की एक उंगली मेरे हाथ से स्पर्श हुई थी किंतु अभी मैं उस स्पर्श को कस कर हाथ पकड़ने जैसा महसूस कर रहा था, इससे भी कहीं अधिक….क्योंकि यह मेरी सोच का कारवाँ था जो मेरे दिमाग के घोड़े पर सवार होकर कहीं की भी यात्रा कर सकता था। मैं जैसे चाहूँ अपने घोड़े को दौड़ा सकता था और उस नगरी में पहुँच सकता था जिसके दरवाजे मेरी उम्र के बच्चों के लिए बड़े-बड़े ताले लगाकर बंद कर दिये जाते हैं और पहरेदार रुपी समाज उस दरवाजे के पीछे की दुनिया को देखने वहाँ जाने के लिए, अभी हमें छोटे होने का कहकर टाल देता है।

कदाचित् दिमाग यह समझ पाए किंतु तन और मन को यह समझाना मुझे असंभव लगता था। अपने आप में आते शारीरिक बदलाव को भला मैं कैसे रोक सकता था। वे बदलाव बार-बार मुझे रागेश्वरी या किसी भी सुंदर लड़की की तरफ आकर्षित करते थे। उनके बारे में सोचने के लिए मुझे बाध्य करते थे। मैंने साहूलाल को कुछ दिन पहले अपनी दुविधा बताई थी क्योंकि मुझे लगता था कि यह मात्र मेरे ही साथ हो रहा है। मस्कुलर डिस्ट्रोफी के साथ एक अन्य कोई बीमारी तो नहीं इसका मुझे भय था, किंतु साहूलाला जो उम्र में मुझसे दो वर्ष बड़ा था पर मेरी ही कक्षा में पढ़ता था, उसने इसे बड़े हल्के में लिया था।
इतना ही नहीं वह चिकित्सक भी बन गया था। इस तरह की परिस्थिति से निपटने का मार्ग भी उसने बता दिया था।

क्रमशः

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