मानस की डायरी….. कहानी संग्रह का भाग-4 “बबिता कोमल की कलम से”

कुछ समय पहले तक जीवन में केवल बहारें ही थी, तब तक, जब तक रागेश्वरी का ख्याल मन के आँगन पर नाच रहा था। जैसे ही ताबीज और उसे पहनने का कारण स्मृति पटल पर झाँकने लगे वैसे ही खुशी को गम में बदलने में एक पल भी नहीं लगा।
बीस पैसे का ताबीज, कदाचित् उसकी कीमत के अनुसार ही कार्य कर रहा था।
मैं घर के बाहर आकर टहलने लगा। पैरों में शक्ति नहीं थी फिर भी टहल रहा था शायद शक्तिहीन होने के पहले अपनी पूरी शक्ति का इस्तेमाल कर लेना चाहता था। मानस पटल पर कई तरह के विचार अठखेलियाँ कर रहे थे-
मेरे जीवन में कितनी परेशानियाँ थी। रागेश्वरी का ख्याल, दिन भर पढ़ाई, वह पढ़ाई जिसमें मैं कभी अच्छा रहा ही नहीं। कई बार फेल होते-होते भी बचा था, ऊपर से बाबा की उपेक्षा। बचपन में अब तक मुझे लगता था कि वे केवल मेरी ही उपेक्षा करते हैं, मुझे भला बुरा कहते हैं किंतु अब मैंने जान लिया था कि उन्हें स्वयं से अधिक किसी से स्नेह नहीं है। हम सात संतानों में से तो किसी से नहीं।
मेरी माँ भी तो उस तरह मेरा साथ नहीं देती जैसे उन्हें देना चाहिए। वे भी तो बाबा की कही हर एक बात पर आँख मूँदकर विश्वास कर लेती है जैसे वे पत्थर की लकीर हो। क्या किसी को इतना भी पति भक्त होना चाहिए ! बड़ों की जिंदगी कितनी अच्छी होती है ! न पढ़ाई की चिंता और न ही किसी के डाँटें जाने का भय। बाहर से रात को बाहर बजे लौटकर आने पर भी कोई नहीं पूछता कि- इतनी देर कहाँ थे। मैं अगर एक घंटे भी आने में देर कर दूँ तो मेरी अच्छाइयों पर कभी प्यार के दो मीठे न बोलने वाले बाबा, यूँ मेरे ऊपर टूट पड़ते हैं जैसे शिकारी अपने शिकार पर टूट पड़ता है।
विचारों का यह कारवाँ अब मुझे नकारात्मकता के सागर में धकेल रहा था। मुझे अपना जीवन अंधकारयम लगना प्रारम्भ ही हुआ था कि पास में ही रहने वाला मेरा एक मित्र रोशन वहाँ आ गया। मेरे मन में चल रहे तूफान की आहट भी मैं उसे नहीं दे सकता था। ऐसा करने पर वह मुझे पागल समझ सकता था। मैं उससे हँस हँसकर बातें करने लगा।
बात ही बात में रागेश्वरी की बातें चल पड़ी और साथ में ही गाँव में आये किसी ज्योतिषाचार्य की। ज्योतिषाचार्य की बात सुनकर मन एक बार फिर प्रफुल्लित हो गया। हो सकता है जो तांत्रिक नहीं कर पाया वह ज्योतिष विद्या कर दे। मैं उनसे मिलने के लिए व्याकुल हो गया।
उससे निवेदन किया तो वह मुझे उनके पास ले जाने के लिए तैयार हो गया। वे अपने किसी परिचित के घर आय़े हुए थे। हम जाने के लिए निकले तो वे हमें राह में ही मिल गए। वहीं खड़े-खड़े मैंने उन्हें अपना हाथ दिखाया।
बाबा से मुझे स्नेह न मिला हो पर उनके धनी होने के अर्थात मेरे अमीर घर में जन्म लेने के अनेक फायदे थे। यह भी उनमें से एक था कि ज्योतिषाचार्य राह में ही मेरे हाथ का बड़े ध्यान से अवलोकन करने लगे।
मेरी मृत्यु 85 वर्ष की उम्र में होगी, मैं बहुत सारा धन कमाऊँगा किंतु मेरे पास वह टिकेगा नहीं, 26 वर्ष की उम्र तक मैं पढ़ाई करूँगा, मेरी पढ़ाई कला संकाय से होगी आदि के साथ जिस कार्य के लिए मैं यहाँ आया था अर्थात मस्कुलर डिस्ट्रोफी के बारे में जानने, तो उसके लिए उन्होंने कहा कि इस बीमारी ने मुझे पर हमला कर दिया है किंतु यह तब तक ही मेरे ऊपर हावी रहेगी जब तक मैं 21 वर्ष का न हो जाऊँ।
मुझे सुनकर खुशी मिली या मैं अप्रसन्न था मुझे पता नहीं चला। मन के ऊपर से किंतु भार उतरता हुआ महसूस हुआ। शायद इसीलिए मैंने उस अंगूठी को पहनने में कोई रुचि नहीं दिखाई जो वे मुझे पहनाकर बदले में पचपन रुपए लेना चाहते थे, इतने रुपए जिनको एक साथ देने में पसीने आ जाए।
मैं वहाँ से लौट आया। एक बार फिर रागेश्वरी मेरे ख्यालों पर हावी हो गई थी। मैं उससे बात करने के लिए तड़पने लगा था। स्कूल में उससे बात होना असंभव था। कहाँ और कैसे उससे बात की जाए ! उसके घर जाकर या फिर राहों में। छोटे से गाँव में बीच रास्ते उससे बात करना खतरे से खाली नहीं था इसलिए उसके घर जाकर उससे बात करना बेहतर विकल्प था पर किस बहाने से जाया जाए।
मैं सीधा साहूलाल के पास गया जिससे मैं इस बारे में बात कर सकता था। वह भी रागेश्वरी से मिलना चाहता था। यूँ भी मेरी कक्षा का हर एक विद्यार्थी उसे देखकर आँहें भरता था, ईश्वर ने उसे अप्रतिम सुंदर बनाया था। साहूलाल मेरे साथ रागेश्वरी के घर चलने को तैयार हो गया। ईश्वर ने हमें वहाँ जाने का कारण भी दे दिया था।

जैसे-जैसे उसका घर नजदीक आ रहा था दिल की धड़कनें बढ़ने लगी थी। पैरों में कंपन महसूस हो रहा था जो बीमारी के भय की वजह से नहीं रागेश्वरी को इतने करीब से देखने की हसरत पूरी होने के कारण था।
एक मारवाड़ी बच्चे का बंगाली घर में जाने के पहले किसी न किसी प्रयोजन का होना अति आवश्यक था और वह हमारे सामने उसके पिता का डॉक्टर होने के रूप में सामने आ गया था। मैं ईश्वर से प्रार्थना कर रहा था कि वे घर पर न हो।
दरवाजे पर दस्तक दी तो रागेश्वरी ने ही दरवाजा खोला। सोमेन चटर्जी वहाँ नजर नहीं आ रहे थे। हम दोनों को देखकर वह हमें बैठक कक्ष में ले गई और बिना किसी भूमिका के हमारे आने का कराण पूछ लिया। झूठ बोलने के पहले जबान काँपती है ऐसा कहीं पढ़ा था किंतु अभी बोलते समय ऐसा कोई अहसास नहीं हुआ।
“तुम्हारे बाबा से मिलना है, उन्हें बुला दो।”
“ओह, बाबा, वो तो यहाँ नहीं है, धुबड़ी गए हैं, दो दिन बाद आयेंगे।”
मन में आनन्द की बरसात हो और चेहरे से मायूसी दिखाना हो, तो यह मुश्किल तो है पर असंभव नहीं, यह मुझे उस समय समझ में आ गया था।
मैं और साहूलाल मुँह उतारकर वहाँ से बाहर निकलने को हुए तो उसने हमें कुछ देर बैठने के लिए कहा। हम तो चाहते ही यही थे। नानुकर करते हुए बैठक में लगी बैंत की कुर्सी पर बैठ गए। पहली बार किसी बंगाली घर के भीतर प्रवेश किया था पर मुझे उसमें रुचि नहीं थी। मैं तो बस रागेश्वरी को देखना चाहता था मगर उसके इतने करीब होने के बाद में उसे एकटक नहीं देख सकता था। यह मजा दूर से चोरी छिपे देखकर ही पूरा किया जा सकता था।
अचानक साहूलाल को कुछ काम याद आ गया था। उसने मुझे चलने के लिए कहा, मेरा वश चलता तो मैं वहीं घर बसा सकता था। वह अकेला ही लौट गया था। यह इस बात का संकेत था कि ईश्वर भी चाहता था कि मैं उसके साथ अकेले में समय बिताऊँ। आह, क्या खूब बातें थी उसकी। ऐसे लग रहा था जैसे फूल झड़ रहे हो। ये सभी उपमाएँ मुझे उन पलों में कवि की कपोल कल्पना नहीं लग रही थी वरन सच लग रही थी।
उसे भी मुझसे बातें करके अच्छा लग रहा था, आखिर लगता भी क्यों नहीं, मैं अपनी कक्षा का सबसे सुंदर छात्र था। अचानक से उसने बताया की वह गान (गीत) गाती है। मैंने उससे धीरे से सुनाने का निवेदन किया तो आश्चर्यजनक रूप से वह इसके लिए तैयार हो गई।
वहीं कोने में रखे हारमोनियम तक वह पहुँची और उसे बजाते हुए उसने अपनी मीठी बोली से बंगाली गीत गाना प्रारम्भ कर दिया।
उसे ऐसे सुनते हुए तो मैं पूरी जिंदगी गुजार सकता था। मेरे अभी तक के जीवन का यह सबसे सुखद पल था। खुद पर गर्व कई गुणा बढ़ गया था। ये सब किसी अनदेखे सपने के पूरे होने जैसा था, छप्पर फाड़ कर मिलने से भी कहीं अधिक, मैं केवल उससे एक बार बात करना चाहता था, यह ख्वाब मैंने पिछले महीने में कई बार जागती और सोती आँखों से देखा था किंतु आज तो वह मुझे गीत गाकर सुना रही थी। एक नहीं, दो नहीं कई गीत उसने मुझे सुना दिये।
कदाचित् उसे भी मेरे जैसे ही किसी श्रोता की प्रतीक्षा थी…..

क्रमशः

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