मानस की डायरी….. कहानी संग्रह का भाग-3 “बबिता कोमल की कलम से”

तांत्रिक के पास लगी भीड़ को देखकर अहसास हो गया था कि दुनिया में केवल मैं और मेरा भाई ही रोगी नहीं है। न जाने कितने लोग है जो शारीरिक और मानसिक रूप से बीमार है। मुझे भी तो मानसिक बीमारी ही थी। मंझले भाईसाहब को मस्कुलर डिस्ट्रोफी नाम की दुर्लभ शारीरिक बीमारी थी और मुझे मेरे भी भविष्य में यह बीमारी हो जाने के भय की मानसिक बीमारी।
वे जब बारह वर्ष के थे तब अचानक से उनकी माँसपेशियाँ बहुत कमजोर होने लग गई थी। चिकित्सक जगत में इस बीमारी का तब भी कोई इलाज नहीं था और आज भी नहीं है। मैं उन्हें दिन प्रतिदिन और अधिक कमजोर होते देख रहा था। इतना कमजोर कि उन्हें स्कूल भी छोड़नी पड़ी थी, वे अब मात्र धीरे-धीरे चलकर अपने स्वयं के कार्य ही कर पाते थे। मैंने बड़े भाईसाहब को किसी से कहते सुना था-
“यह खानदानी बीमारी है।” घर, गहने, दुकान खानदानी होते है यह तो मैं जानता था किंतु बीमारी भी खानदानी होती है, इस विचार ने मेरी नींद उड़ा दी थी। मैं अनायास अपनी माँसपेशियों में खिंचाव महसूस करने लगा था।
तांत्रिक के दरवाजे पर लगी भीड़ को देखकर यह खिंचाव कई गुणा बढ़ गया था। अब बाबा का डर, माँ की डाँट और मंझले भाईसाहब की फिक्र पीछे रह गई थी। अब मात्र मुझे मेरा ख्याल था। मुझे यह ताबीज हर कीमत पर लेना था और अपने आप को इस भावी बीमारी से बचाना था।
हम चारों मित्र एक-दूसरे का मुँह देख रहे थे। कैसे भीड़ को चीरकर आगे जाए समझ नहीं आ रहा था कि तभी वहाँ एक जाना पहचाना चेहरा नजर आया। दिल बाग-बाग हो गया क्योंकि यह चेहरा उनका था जो वहाँ भीड़ को नियंत्रित कर रहे थे। ये पुलिस की वर्दी में थे और इनको मैंने चापारकुची में कुछ वर्ष पहले तक अक्सर बाबा के पास आते देखा था। वे भी कदाचित् मुझे पहचान गए थे इसलिए अनायास उनके होठों पर मुस्कान तैर आई थी।
बिल्कुल साथ था कि ईश्वर भी चाहता था कि मैं इस ताबीज को लिए बिना न लौटू। हमें वहाँ परेशान देखकर वे हमारे आने का प्रयोजन समझ गए थे और आश्चर्यजनक रूप से अगली कुछ मिनट बाद हम नन्हे तांत्रिक के सामने थे। छोटे से बच्चे को अजीबोगरीब मंत्र पढ़ते देखकर भय लग रहा था। यह भय उस भय को परास्त कर रहा था जो भविष्य में मस्कुलर डिस्ट्रोफी के होने का था।
तांत्रिक के पास कहाँ इतना समय था कि वह मेरे मनोभावों को समझता। अपने झोले से उसने चार ताबीज निकाले और हमें पकड़ा दिये। प्रत्येक ताबीज का बीस पैसे प्रति ताबीज के हिसाब से भुलतान करता आसान नहीं था किंतु करना तो था ही। हम विजयी खिलाड़ी की तरह सीना चौड़ा करते हुए उस भीड़ पर हिकारत भरी नजर डालकर लौट आये थे जो हमसे पहले ही वहाँ होकर भी अब तक इंतजार करने के लिए मजबूर थीं।

मन में आशा का संचार हुआ था कि मैं इस बीमारी से बच जाऊँगा। पिछले कुछ दिनों से माँसपेशियों में जो शिथिलता महसूस हो रही थी वो अब अचानक से कम महसूस होने लगी थी। भाईसाहब के लिए भी खुशी हो रही थी की भले वे बिल्कुल ठीक न हो पाए किंतु इस ताबीज को पहनकर उन्हें कुछ आराम तो अवश्य मिलेगा।

हम सब थक गए थे किंतु एक बार फिर पैदल चलकर ही रंगिया तक जाना था। भूख भी लग गई थी पर हमारे पास कोई विकल्प नहीं था। हम रंगिया गए और वहाँ से बाइहाटा चाराली।
दरअसल यह वह स्थान था जहाँ बाबा के बनाए बर्तनों की एक दुकान थी जिसे स्टॉफ संभालता था। हम चारों ने वहाँ पहुँचकर राहत महसूस की। जी भरकर भोजन किया, कुछ देर विश्राम किया और एक बार फिर ट्रैन में बैठकर चापारकुची लौट आए। ताबीज के लिए अस्सी पैसे खर्च कर दिये थे, अब एक बार फिर बिना टिकट यात्रा करके मन आनन्दित भी था और पैसे बचाने की खुशी भी।

मैं बाइहाटा चाराली में खरीदी गीता की पुस्तक को घर पहुँचकर जल्द से जल्द पढ़ना चाहता था जिसके खरीदने पर साहूलाल मुझसे नाराज था। कारण मात्र इतना ही थी कि उसे नीरोग रहने की शिक्षा लेने के लए आरोग्यधाम धाम पुस्कक खरीदनी थी और मुझे निर्विघ्न जीवन को चलाने के लिए ज्ञीकृष्ण के संबोधन से बनी गीता। पैसे मैंने खर्च किये थे इसलिए स्वाभाविक था कि मेरी मनोकामना ही पूरी होती, वही हुआ था और वह मेरे सामने वाली सीट पर मुँह फुलाकर बैठा था।
मंझले भाईसाहब ताबीज पहनकर कदाचित् इतने खुश नहीं हुए थे जितना मैं उसे अपने गले में पहनकर हुआ था। बीते चौबीस घंटों में हम चारों एक घंटे के लिए भी नहीं सोए थे। घर पहुँचकर भोजन करने के बाद ऐसी नींद आई कि दूसरे दिन रागेश्वरी के ख्यालों में ही आँख खुली।
रागेश्वरी, उसका ख्याल मात्र ही होठों पर मुस्कान ला देता है। कितनी खूबसूरत है वह। मास्टरजी के साथ लड़कियों के झुंड में जब आकर क्लास में बैठती है तो ऐसा लगता है जैसे फूल बरस रहे हो। कितनी निर्दयता है स्कूल में। लड़कियाँ कुछ पल के लिए भी हमारे साथ समय नहीं बिता सकती। वे मास्टरजी के साथ क्लास में आती और जैसे ही क्साल खत्म होती है उन्हीं मास्टरजी के साथ उस कमरे में जाकर बैठती है जो सभी लड़कियों के लिए कॉमन रुम बनाया हुआ है।
फिर जब दूसरे मास्टरजी आते हैं तब फिर सभी लड़कियाँ उनके साथ आती। किसी लड़की से बात करना तो दूर हमें उन्हें ठीक तरह देखने का मौका ही नहीं मिलता, फिर भी न जाने क्यों रागेश्वरी मेरी दिलोदिमाग में छाई रहती है।
खैर, मैं उठ गया। ताबीज पर हाथ गया मगर यह क्या-
मैं इसे पहनकर अभी वह खुशी नहीं महसूस कर पा रहा था जो मैंने कल शाम को इसे पहनकर की थी। मुझे एक बार फिर माँसपेशियों में खिंचाव महसूस होने लगा था। तो क्या यह ताबीज भी मेरे भय को नहीं जीत पाया है। क्या सममुच मैं मस्कुलर डिस्ट्रोफी की तरफ बढ़ रहा हूँ….रागेश्वरी की याद से आई मुस्कान अब होठों से विलुप्त हो चुकी है, वह उत्तेजना भी जो उसकी यादों के साथ शरीर में आई थी……..
क्रमशः

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