मानस की डायरी….. कहानी संग्रह का भाग-2 “बबिता कोमल की कलम से”

कक्षा में नींद आती है, न जाने मुस्लिम मास्टरजी क्या पढ़ाते हैं, उनकी बढ़ी हुई दाढ़ी और पहनावे ने उनका नाम अनायास ही मुस्लिम मास्टरजी गढ़ लिया है। उनकी कही बातें स्कूल के दरवाजे तक भी साथ नहीं चल पाती थी किंतु आज वे मेरे साथ मेरे घर तक भी आ गई है। केवल घर तक ही नहीं आई है वरन मुझे सोने भी नहीं दे रही है।
क्या सचमुच अगर में अभी डायरी लिखना प्रारम्भ करूँगा तो इसे पढ़कर तब बहुत आनन्द आयेगा जब में बूढ़ा हो जाऊँगा। आह….कितने आनन्ददायक पल होंगे जब मैं अपने बाबा की उम्र में रहूँगा और अपनी उस डायरी के माध्यम से बचपन को जीऊँगा।
पर, रात आँख में कट गई। मास्टरजी ने कहा था-
“वह लिखना जो मन के आँगन पर प्रति पल अठखेलियाँ करता है।” क्या ऐसा संभव है। मैं साहूमल के साथ हर पल रहता हूँ मगर मैंने मन में तो कई बार उसको बहुत मारने के भाव आते हैं। रागेश्वरी को देखते ही मन मयूर नाच उठता है। जिस दिन कक्षा में आगे बैठता हूँ उस दिन पूरी रात उसके ही ख्याल आते रहते हैं। बड़े भाईसाहब और छोटे को बाबा प्यार करते हैं और मुझे डाँटते हैं तब मन में कैसे कैसे विचार आते हैं। अगर मैं यह सारी बातें डायरी में लिख दूँगा और यह गलती से किसी ने पढ़ ली तो….

नहीं…नहीं…..हे ईश्वर….ऐसा कैसे कर सककता हूँ मैं। ये सभी लोग कभी मेरी तरफ मुड़कर देखेंगे भी नहीं। क्या करूँ….समझ नहीं आ रहा है।

नाश्ता कर रहा हूँ पर मन उदास है। बाबा, भाईसाहब से बात कर रहे हैं। वे गद्दी में बातें कर रहे हैं पर मुझ तक उनकी आवाजें आ रही थी। अक्सर वे भाईसाहब से मेरी पढ़ाई से जुड़ी बातें किया करते थे पर आज कुछ और बातें कर रहे थे।
अचानक मेरे कान में डायरी शब्द टकराया। मेरे कान खड़े हो गए। मैं वहाँ जा नहीं सकता था क्योंकि इसके लिए बाबा कह सकते थे-
“क्या दिन भर बड़ों की बात में कान लगाते हो, जाकर पढ़ाई करो अपनी, इतने बेकार नम्बर लाते हो…”
माँ कह सकती थी-
“नाश्ता भी एक जगह बैठकर नहीं कर सकता। पता नहीं दिन भर कहाँ खोया रहता है।”
इसलिए मैं वहाँ था पर मेरे कान गद्दी में हो रही अति महच्चवपूर्ण चर्चा में लगे हुए थे। बाबा कह रहे थे-
“मैं छोटा था तब इस पूरी पृथ्वी का सम्राट बनना चाहता था। मेरे इस विचार पर कोई हँस न दे इसलिए मैंने इससे जुड़ी बातें एक डायरी में तब लिखी थी जब मैं बाहर वर्ष का था। मैं उस समय काल्पनिकता में सम्राट बनकर पूरी पृथ्वी पर शासन किया करता था और उससे जुड़ी सारी बातें उस डायरी में लिख लिया करता था।”
तभी भाईसाहब का स्वर कानों से टकराया-
“कहाँ है वह डायरी, हम भी पढ़ना चाहते हैं।”
“अरे नहीं, तुम तो उसे डायरी मिलने से भी नहीं पढ़ पाओगे क्योंकि वह मैंने अपनी एक लिपि बनाकर लिखी थी। मतलब कुछ ऐसी भाषा में लिखी थी जिसे केवल मैं ही पढ़ सकता था। अब तो वह डायरी ही कहीं खो गई है। कई सालों से मुझे मिली ही नहीं है।”

उनकी आगे की बातों में मुझे कोई रुचि नहीं थी। ईश्वर मेरे साथ था। उन्होंने मुझे रागेश्वरी, साहूलाल और पापा के लिए मन में उठते विचारों को कागज पर अंकित करने का रास्ता दिखा दिया था। अब दिन-रात में इस लिपि के बारे में ही सोचा करता था। मैं कैसे यह बनाऊँ, समझ नहीं पा रहा था। मैं बंगाली और असमिया जानता था। मुझे तो हिंदी भी अच्छी तरह नहीं आती थी। बाबा ने रेखागणित की उन आकृतियों में अपनी बातें लिखी थी जो मुझे गणित पढ़ने पर भी अच्छी नहीं लगती थी।
मुझे कोई दूसरा रास्ता चुनना था। कई दिन इसी सोच में निकल गए।
बाबा मुझसे बहुत नफरत करते थे पर उन्होंने अनजाने में मुझे एक रास्ता दिखा दिया था। सन् बावन के करीब मेरा जन्म छोटे से गाँव में हुआ था और अब लगभग तीन वर्ष से मैं लिपि ही बना रहा हूँ।
आह अब आनन्द आयेगा। आज मेरी उम्र पंद्रह वर्ष है। अब मैं अपनी डायरी लिख सकता हूँ। अब मैं जो लिखूँगा वह कोई नहीं पढ़ पायेगा। मैं जो भी चाहूँ वह लिख सकता हूँ। कितने आनन्ददायक पल होंगे जब मैं खुद ही इसको बड़ा होकर पढ़ूँगा। लेकिन क्या कोई गलती से इसे पढ़ लिया या मैंने ही बड़े होकर कभी इसे प्रकाशित करवा लिया तो क्या दुनिया मुझसे नफरत करने लगेगी !

नहीं….नहीं मुझे इतना नहीं सोचना है, मुझे लिखना है। तब क्या होगा देखा जायेगा। आज मुझे मन के हर एक विचार को डायरी में लिखना है। न जाने ऐसा हो कि मेरा लिखा तब पूरे विश्व में प्रसिद्ध हो जाए और मुझे इस तरह के लेखन के लिए क्या जाने, नोबल प्राइज मिल जाए। उसके आगे घरवालों की नफरत तो बहुत छोटी सी है।
खैर…अभी तो इसे कोई पढ़ नहीं पायेगा। बस मैं इसे अपनी बनाई लिपि में प्रारम्भ कर देता हूँ।
मंझले भाईसाहब की बीमारी का कोई इलाज नहीं है। न जाने कैसे ऐसी बीमारी उनके आ गई है। धीरे-धीरे उनका शरीर ढलता जा रहा है। भूटान की सीमा से लगा जंगल में एक गांव है जिसमें सुनने में आया है कि एक आठ-दस वर्ष का एक बच्चा है जो ऐसा ताबीज देता है जिससे सारी बीमारी खत्म हो जाती है।
मैं यह भाईसाहब के लिए लाना चाहता हूँ। साथ ही अपने लिए भी, कहीं ऐसा न हो यह बीमारी उनके साथ-साथ मुझे भी हो जाए। मैं अपने दोस्त साहूराम, गोपाल, गोविंद के साथ उस जंगल की तरफ रवान हो गया। वहाँ तक जाने का क्या साधन है मैं नहीं जानता पर मुझे जाना ही है।

हम रेलवे स्टेशन आ गए हैं। वहाँ जाने के लिए हमें रंगिया जाना पड़ेगा। हम चार लोग है पर हमने टिकट नहीं ली। बिना रेलवे टिकट के रेल यात्रा के रोमांचक अनुभव को हम चारों महसूस करना चाहते हैं। टी.टी नां की कोई चिड़िया वहाँ नहीं आई। हम रात को एक बजे रंगिया पहुँचे वहाँ जाकर पता चला कि उस नन्हे तांत्रिक तक पहुँचने के अभी आठ मील पैदल चलना पड़ेगा। वहाँ तक कोई और साधन नहीं जाता। मैं अपने और भाईसाहब के लिए इतना तो कर ही सकता था। पूर्णिमा की रात में सामने दिखते पहाड़ और चंद्रमा का सामंजस्य शानदार लग रहा है। चारों आपस में पहाड़ को चाँद की चाँदनी के घूंघट में शरमाने की कल्पना करते हुए हँसी-मजाक करते हुए आगे बढ़ रहे हैं। खुद को स्वस्थ रखने की भावना इतनी प्रबल है कि गहराती रात में जंगल के बीच जंगली जानवरों का भय छूने को भी नहीं है।

सुबह के तीन बजे हम वहाँ पहुँचे। माँ ने साथ में खाने के लिए रोटी और चिड़वा दिया था। वहाँ पहुँचकर हमने भोजन किया। फिर ऐसे ही सड़क के किनारे विश्राम करने लगे। असम में और कुछ हो न हो सूरज दस्तक देने बहुत जल्दी आ जाते हैं। सूरज बाबा ने खुले आसमान के नीचे सोने के हमारे सुख को अधिक सहन नहीं किया और उजाला फैला दिया।
हमें उठना पड़ा। अभी तो पाँच भी नहीं बजे थे। हम इधर-इधर घूमने लगे। जंगल में इस तरह विचरण करने का अदभूत दृश्य था। नौ बजे तक हम वहाँ पहुँचे जहाँ नन्हे तांत्रिक थे।

जो देखा अविश्वसनीय था। इतनी अधिक भीड़ तो मैंने आज तक नहीं देखी थी। लगभग पाँच हजार लोग….कदाचित् नहीं भी हो पर उस समय ऐसा ही अहसास हो रहा था। देखकर लग रहा था कि आने वाले चार-पाँच दिन भी हमारा नम्बर नहीं आयेगा। बड़ी मुश्किल से तो माँ के सिफारिश करने पर बाबा ने इजाजत दी थी। अगर खाली हाथ लौट गया था मेरे लिए उनकी नफरत में एक सितारा और जड़ जायेगा।
आज शाम तक ही घर लौटना था। क्या करूँ क्या न करूँ कुछ समझ में नहीं आ रहा था…

क्रमशः

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