मानस की डायरी….. कहानी संग्रह का भाग-12 “बबिता कोमल की कलम से”

मैं कितना स्पेशल था, मेरे लिए जलपाईगुड़ी टेलिग्राम भेजा गया था। कभी-कभी लीक से अलग होने के कितने फायदे होते हैं। आपके लिए सब कुछ स्पेशल होता है, सभी के बीच एक मेरा शाकाहारी होना, मुझे खास बना रहा था।

वहाँ जाते ही सब मुझे पूछने वाले थे,
“वे कौन है जिनके लिए अलग व्यवस्था की है।”
यह अहसास होठों पर मुस्कान ला रहा था और मैं अपनी अटेची हाथ में लेकर बस में बैठने के लिए घर से रवाना हो गया था। बस में कदम रखते ही आँखों ने उसकी छवि को अपने कब्जे में कर ही लिया था।
रागेश्वरी को देखने के लिए पूरी रात से आँखें तड़प रही थी पर जो अब आँखों के सामने थी उसे देखकर मन में वितृष्णा के भाव आ गए थे। कैसी हो गई ये…..दो बच्चों की माँ पूरे बारह बच्चों की माँ लग रही है। मोटी तो इतनी कि तीन सवारी के लिए बनी सीट उसके और उसके दो छोटे-छोटे बच्चों के लिए छोटी पड़ती नजर आ रही है। उसकी आँखों में वह आकर्षण अभी खोजने से भी नहीं मिल सकता था जिसके लिए मैंने कई साल उसे याद करके रातें काटी थी और उसकी के नाम से…….खैर मोंटू ने आगे बढ़कर मेरा स्वागत किया और मेरा हाथ पकड़कर मुझे पीछे ले गया जहाँ वह पहले से बैठा था। यह बस की सबसे पीछे वाली सीट थी जो अक्सर सफर के दौरान जवान लड़कों के ही काम आती है। इसका क्या कराण रहता होगा पता नहीं पर मुझे हमेशा इसका कारण वहाँ से बस में आगे बैठी सुंदर-सुंदर लड़कियों को देखना ही लगा।

उसी सीट पर हमारे गाँव का इलकौता फोटोग्रफार केशव भी बैठा था, जो मेरे और मोंटू की उम्र का ही था। बस हिचकोले खाती आगे बढ़ने लगी थी। मैंने चारों तरफ नजरें घुमाकर बस को एक बार फिर आँखों के एक्सरे निकाला था जिसमें मैंने उस सीट को जल्दी से फलांग दिया था जिस पर रागेश्वारी अपने पूरे साम्राज्य के साथ पसर कर बैठी थी।

मैं अब गलती से भी उसे नहीं देखना चाहता था। मन में एक पल के लिए यह भाव भी आया था- क्या मेरी होने वाली बीवी भी बच्चे होने के बाद ऐसे ही फैल जायेगी…

मैं अपनी ही सोच पर मुस्करा दिया था और मोंटू और फोटोग्राफर केशव से इधर-उधर की बातें करने लगा था। बीती रात न जाने कैसे-कैसे ख्वाब जागती-सोती आँखों से चलते रहे थे। उसके साथ फिल्म देखने जाने के ख्वाब, हँस-हँसकर बातें करने के ख्वाब, उसके पास के गुजरने पर उसकी देह के स्पर्श के ख्वाब….अभी सब खुदबखुद गधे के सिर से सींग की तरह गायब हो गए थे।

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अब नजरें बस मैं बैठी उस लड़की पर टिक गई थी जो बस का एक्सरे लेते समय आँखों की भेंट चढ़ गई थी, मैंने उसे पहले भी देखा था, वह धूबड़ी में सरकारी अस्पताल में कार्यरत डॉक्टर रवीन की बेटी है, उसका नाम मुझे नहीं पता पर वह बला की खूबसूरत है, मैंने उसे अक्सर धूबड़ी में कॉलेज आते-जाते देखा था। मैं उसे देखने लगा था। बीच-बीच में मोंटू और केशव से बातें करता और उसे भी देख लेता।

थोड़ी देर यह कार्यक्रम चलता रहा पर इसमें कोई मजा नहीं था। वह लड़की अपनी ही दुनिया में खोई थी। उसने एक बार भी अपने चारों तरफ देखने का प्रयास नहीं किया। मेरी नजर उसके पास बैठी एक और लड़की पर गई। यह लड़की साँवली नहीं काली ही थी। बेतरबी से बालों को बिखरा कर बैठी इस लड़की को देखकर उबकाई सी आने लगी। मैंने बिना देर किये अपनी नजरों को फेर लिया। कोई इतना बदसूरत भी कैसे हो सकता है।

एक बार फिर बातों का दौर चल पड़ा था। सभी बस में आराम से व्यस्थित हो गए थे। मैंने अचानक महसूस किया कि वह काली लड़की जो दोबारा उधर देखने पर अब मुझे साँवली लगने लगी थी लगातार मुझे ही देख रही है। मैंने पहले पहल इसे अपना भ्रम समझा पर यह सच था। वह सचमुच मुझे ही देख रही थी।

अब मैं चाहकर भी उसे नजरअंदाज नहीं कर सकता था। इधर-उधर देखते हुए उससे नजरें टकरा ही रही थी। मैंने देखा था कि उसने अपने हाथों पर नैनपॉलिश लगा रखी थी। गहरे लाल रंग की नैनपॉलिश उसके काले गंदे हाथों को और भी गंदा दिखा रही थी।

मैं अब उसके बारे में सोचने लगा था। अब रागेश्वरी और धूबड़ी के डॉक्टर की बेटी का ख्याल दूर जा चुका था।
वह मुझे अब भी लगातार ताक रही थी और मेरी नजरें भी उसके आस-पास बिखर गई थी।

कुछ ही दूर जाकर बस रुक गई थी। यह कोकड़ाझाड़ नामक स्थान था जहाँ मोंटू के सबसे बड़े भैया का ससुराल था और वहाँ उन्होंने चाय पानी की व्यवस्था की थी।

हम सब बस से उतर गए थे। कुछ देर इधर-उधर टहलकर फिर बस में आकर बैठे तब तक न जाने कैसे आश्चर्यजनक रूप से परिस्थितियाँ बदल गई थी। वह काली लड़की जो कुछ देर पहले साँवली थी अब गोरी तो नहीं हुई थी पर उतनी बदसूरत नहीं लग रही थी जितनी कुछ देर पहले लग रही थी। उसके हाथों के नाखूनों पर लगी गहरी लाल नैनपॉलिस अब उसे बदसूरत के स्थान पर खूबसूरत दिखाती प्रतीत होने लगी थी।

वह मुझे देखन के अपने चिरपरिचित काम पर लग गई थी और मैंने भी उसके काम को अपना काम बना लिया था, अब वह मुझे देख रही थी और मैं उसे, बाकी पूरी बस क्या कर रही थी इससे न मुझे लेना-देना था और न उसे। किसी लड़के को यूँ निर्विकार भाव से लगातार देखने वाली लड़की हमारे असम की नहीं हो सकती थी।

वह कहीं बाहर से आई थी, शायद किसी बड़े शहर से, मगर कहाँ से, अभी यह जानना बाकी था…

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