मानस की डायरी….. कहानी संग्रह का भाग-11 “बबिता कोमल की कलम से”

आज शायद डायरी बदली हुई है।
मानस की वह डायरी मेरे हाथ में नहीं आई है जिसमें वह कक्षा दस के बाद बाबा द्वारा गुवाहाटी में पढ़ने के लिए इंकार कर देने के दुःख को उकेर रहा था। यह उसके बहुत बाद की कहानी है। तब की जब धूबड़ी से बी.कॉम करके लॉ कॉलेज में भी एडमिशन ले लिया था।
लगता है समय अचानक से पाँच या सात वर्ष आगे बढ़ गया है। अब कलम नन्हे बच्चे के हाथों से नहीं वरन एक युवा के हाथों से चल रही है जो नया-नया जवान हुआ है। मैं भी डायरियों के अंबार में पुरानी डायरी को तलाशने का प्रयास नहीं कर रही हूँ। बस, वो ही उकेर रही हूँ जो समक्ष आ गया है क्योंकि जानती हूँ कक्षा दस के आगे की कहानी भी कभी न कभी आँख के सामने लिखित रुप में फिर आ ही जायेगी।

डायरी में लिखे अक्षरों की बनावट आश्चर्यजनक रूप से बदल गई है। अब समझने और पढ़ने में उतना जोर नहीं डालना पड़ रहा जितना सात वर्ष पहले पड़ता था अर्थात कल पड़ रहा था। यह अंतराल एक दिन का नहीं है, सात वर्ष का है, यही मानकर मैं आगे की कहानी को अपने शब्द दे रही हूँ-

बाबूराम कितना ज्यादा बोलता है। यदि यह नेपाल का न होता तो मैं अब तक इससे अपने संबंध खत्म कर चुका होता। न जाने किस दिन इसका नेपाल रहना मेरे काम आ जाए। वह लगातार बोल रहा है और मैं सुनने के लिए मजबूर हूँ। वह साथ पढ़ने वाली लड़की के किस्से सुना रहा है। मुझे उसमें कोई इंटरेस्ट नहीं है क्योंकि मेरे पास सुनाने के लिए कुछ भी नहीं है। रागेश्वरी की शादी हो चुकी है, शायद वह दो-तीन बच्चों की माँ भी बन चुकी है। उसे देखे ही सालों हो गए हैं।

मैं उसके घर लगातार जाता रहा था फिर भी कभी उसे अपने प्यार का इजहार नहीं कर पाया। मेरा प्यार इकपरफा था औऱ वह उसी में खत्म भी हो गया। रागेश्वरी को पर ऐसा नहीं करना चाहिए था। उसके बारे में जो सुना था उसके बाद उससे नफरत हो गई थी। अब समय के साथ उससे इतनी नफरत नहीं थी पर उसे अपने म्यूजिक मास्टरजी के साथ प्रेम नहीं करना था।

किया तो भी कम से कम इस हद तक नहीं करना था कि उनके बच्चे की माँ ही बन जाए। बाबा के बाहर रहने और माँ के ज्यादा दखलअंदाजी नहीं करने का मतलब यह तो नहीं है कि उनकी ही आँखों के आगे कुछ भी करो, और जब पानी सिर से ऊपर चला जाए तो हथियार डाल दो। डॉक्टर साहब प्रतिष्ठित आदमी थे, ऐसे कैसे किसी भी मास्टर से अपनी बेटी का ब्याह कर देते। वे बच्चा गिरवा देना चाहते थे पर इसके लिए भी देर हो गई थी।

एक मात्र रास्ता यही था कि गुपचुप तरीके से घर में डिलीवरी करवाई जाए और बच्चा होते ही उसे गला घोंटकर मार दिया जाए। घर की और बेटी की इज्जत बचाने के लिए एक नन्ही जान को दाँव पर लगाना ज्यादा बड़ी कीमत नहीं है।

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पेट को लाख छिपा लिया गया था पर आग से उठते धुएँ को कोई लाख चाहकर भी छिपा नहीं सकता। लपटें बाहर दिखे न दिखे आकाश में फैला धुंधलका सच बयान कर ही देता है।
यहाँ भी ऐसा ही थी। हर कोई दबी चुबान में चटर्जी खानदान की बड़ी सी कोठी के पीछे होती छोटी-छोटी बातों को अपने अंदाज से बताने का प्रयास करता था।

न जाने कितना झूठ था और कितना सच पर यह सच था कि चटर्जी बाबू ने अपने ही नाती या नातिन की हत्या की थी। उसके बाद आनन-फानन में रागेश्वरी की शादी एक ठिगने आदमी के साथ कर दी थी। हाँ, वह लड़का नहीं था, आदमी ही था, देखने में लगता था जैसे डॉक्टर चटर्जी से कुछ वर्ष ही छोटा हो।

मैं रागेश्वरी से उस दौर में नफरत करने लगा था इसलिए उस नाटे-ठिगने बेहुदे आदमी से मुझे कुछ लेना-देना नहीं था। एक बार फिर उसकी यादें ताजा हो आई थी क्योंकि रागेश्वरी के भाई रोमन की शादी थी। रोमन के ही छोटे भाई मोंटू से इन दिनों मेरी अच्छी दोस्ती हो गई थी। मोंटू चाहता था कि मैं उसके साथ शादी में जलपाईगुड़ी जाऊँ।

मैंने आज तक किसी बंगाली शादी को इतने करीब से नहीं देखा था। मैं बारात में जाना चाहता था पर बाबा मुझे इसकी इजाजत देंगे इसके चांस बहुत कम थे। वैसे आजकल बाबा अधिक दखलअंदाजी नहीं करते थे। मोंटू खुद घर आकर शादी का न्यौता देकर था, साथ ही बाबा औऱ माँ को भरोसा भी देकर गया था कि वहाँ मेरे खाने पीने की सारी व्यवस्था अलग से की जाएगी, यहाँ तक कि वहाँ इस बारे में जानकारी दे दी गई है कि उनके साथ एक मारवाड़ी लड़का आ रहा है।

बाबा ने एक दिन सोचने का समय लिया था औऱ फिर जाने की इजाजत दे दी थी। आखिर देते भी क्यों नहीं, मोंटू के बाबा का समाज में अच्छा नाम था। खासकर बंगाली समाज में तो उनकी तू ती बोलती थी। मेरे उस परिवार के साथ बढ़ती घनिष्ठता का उन्हें कालांतर में किसी न किसी तरह फायदा हो ही सकता था।

एक बार फिर रागेश्वरी का चेहरा आँखों के आगे तैर आया था। वह किसी और की हो गई थी किंतु उनकी खूबसूरती एख बार फिर दिलोदिमाग पर छाने लगी थी। न जाने अब कैसी लगती होगी। उसने कुछ भी किया हो, आज तो उसे देखकर अपनी आँखों को तृप्त कर ही सकता हूँ।
पूरी रात उसके ख्यालों में ही बीत गई थी। कल उसके साथ एक ही बस में बैठकर जलपाईगुड़ी तक की यात्रा करनी थी इसलिए मन रोमांचित था पर साथ में उसके पति के भी होने का अहसास मन में वितृष्णा ला रहा था….

न जाने आज का दिन कैसा जाने वाला था……मैं खुद का अक्श उस गिलास में देखकर इतरा रहा था जिससे पानी पी रहा था। मुझ जैसे हसीन बाँके नौजवान की जगह ठिगने मोटे की जीवनसंगिनी बनकर रागेश्वरी ने अपने ही पैर पर तो कुल्हाड़ी मारी थी…..
अब कुछ नहीं हो सकता था….उसे वैसे ही जीना था और मुझे मेरी तरह ही…

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