मानस की डायरी….. कहानी संग्रह का भाग-10 “बबिता कोमल की कलम से”

डायरी लिखने का मन तब होता है जब मन अशांत हो।
मन की शांति किसी डायरी और किसी मित्र की याद नहीं दिलाती। मैं अभी शांत हूँ या अशांत, नहीं जानता। कल रिजल्ट आ गया था। मैं बहुत खुश था क्योंकि मैंने सच में सेकंड डिवीजन लाकर दिखा दिया था। रिजल्ट के बारे में सुनकर घोष मास्टरजी का चेहरा सर्वप्रथम आँखों के सामने आया था, जिन्होंने कहा था कि मैं कुछ भी कर लूँ पास नहीं हो पाऊँगा और यदि हो भी गया तो उतने नम्बर नहीं ला पाऊँगा जो सम्मानजनक कहलाते हैं।

शायद मैं उन्हें नीचा दिखाने के लिए ही इतना पढ़ा था, या फिर रागेश्वरी को दिखाने के लिए या कॉटन कॉलेज में पढ़ने के लिए, कारण नहीं मालूम था किंतु सब बधाई दे रहे थे इसलिए अच्छा लग रहा था। मन के तार गुवाहाटी की गलियों से खुद को जोड़ने लगे थे। सुना था कि वहाँ बहुत-बहुत सुंदर-सुंदर कपड़ों में लड़कियाँ सड़क पर नजर आती है। कॉलेज में भी बहुत लड़कियाँ पढ़ती है, धुबड़ी जैसा नहीं है जहाँ मात्र इक्की दुक्की लड़कियाँ ही नजर आए।

घरवालों से दूर स्वच्छंद होकर घूमने-फिरने का जो आनन्द भविष्य में अनिश्चित था उसे अभी महसूस करके दिल गद्गद् हो रहा था। बड़े भाईसाहब के थर्ड डिवीजन आई थी तब भी बाबा ने उन्हें गुवाहाटी पढ़ने भेजा था। मंझले भाईसाहब सेकंड डिवीजन से पास हुए थे, उन्हें गुवाहाटी पढ़ाने की पूरी तैयारी थी पर डॉक्टर ने ऐसा करने से इंकार कर दिया था।

मेरे भी बहुत अच्छे नम्बर आये हैं इसलिए मुझे गुवाहाटी जाने से कोई रोक ही नहीं सकता। मैं चौड़ा सीना करके घर आया था। सदैव की तरह बाबा के चेहरे पर कोई भाव नहीं थे। मैं फेल हो जाता तब भी कदाचित् उनके चेहरे पर ये ही भाव होते।

मन में चिरपरिचित उदासी हावी होने ही वाली थी कि मैंने गुवाहाटी के मधुर सपनों से उसे प्रतिस्थापित कर दिया था। मैं जल्द से जल्द इस विषय पर बाबा से बात कर लेना चाहता था मगर वे व्यस्त नजर आ रहे थे। उनकी व्यस्तताएँ मात्र व्यापार को आगे बढ़ाने एवं आस-पास के इलाके में अपने नाम को बड़ा करने में थी। जिस इंसान से उनका कोई स्वार्थ नहीं सधता था उसकी तरफ वे मुँह उठाकर भी नही देखते थे और जिससे उनके नाम और काम से जुड़े स्वार्थों की पूर्ति होती थी उनके लिए वे अपनी जान बिछा देते थे।

कदाचित् यही कारण था कि आसपास के इलाके में उनकी अच्छी पहुँच थी। वे बाबा को मानवीय गुणों से ओत-प्रोत समझते थे इसलिए उनकी इज्जत करते थे किंतु वे किसी से क्यों और कितना संबंध रखते थे ये हम बहुत अच्छी तरह जानते थे।

मैं उनके समक्ष खड़ा था और उन्हीं की निंदा अपनेआप से कर रहा था। अचानक उनका स्वर कान से टकराया, जो कहीं दूर से आता प्रतीत हो रहा था क्योंकि अभी भी उनकी नजरें बहीखाते पर ही टिकी थी जिसे वे नहीं बड़े भाईसाहब संभाला करते थे। वे मात्र भाईसाहब की कमियाँ निकालने के लिए उसे हाथ में लिया करते थे-
“तो, अब आगअ काई विचार है। कठे पढ़णो है।”
मुझे क्रोध आ गया था। वे ऐसे पूछ रहे थे जैसे मैं उन्हें अभी कह दूँ की मैं लंदन जाकर पढ़ना चाहता हूँ और वे मुझे भेज ही देंगे।
मैंने पीछे बंधे अपने हाथों को सीने के सामने लाकर एक दूसरे से रगड़ते हुए शीघ्रता से कहा था-
“बाबा, मैं गुवाहाटी, कॉटन कॉलेज में पढ़ना चाहता हूँ।”
उन्होंने एक नजर उठाकर मेरी तरफ ऐसे देखा था जैसे मैंने सच में लंदन जाकर पढ़ने की इच्छा को उनके सामने जाहिर कर दिया हो।

वे लापरवाही से बाले-
“नहीं, गुवाहाटी कोणी जाणो, काल धूबड़ी जाओ और बठे कॉलेज म्अ भर्ती हो जाओ।”
उन्होंने अपना फैसला सुना दिया था, वे जा चुके थे। वहाँ माँ थी, पर उनका होना न होना कभी महत्तवपूर्ण नहीं था। वे आँख मूंदकर बाबा का साथ देती थी।
मेरी आँखों से निकलते गंगाजल को किसी ने नहीं देखा था। पढ़ना ही तो था धूबड़ी पढ़ो या गुवाहाटी, यह उनकी सोच थी। मेरे लिए गुवाहाटी के लिए इंकार होना जिंदगी का अंधकारमय होने जैसा था क्योंकि दिन-रात मेहनत करके सेकंट डिवीजन लाने का कारण ही गुवाहाटी था।

धूबड़ी ही पढ़ना था तो थर्ड डिवीजन में भी पढ़ा जा सकता था। क्यों रागेश्वरी के ख्यालों को अलविदा कहकर मैंने रात-रात पढ़ाई की। गणित के उन सिद्धांतों को रटा जिन्हें देखकर केवल सिर ही नहीं घूमता, आसमान भी घूमने लगता है। भूलोग को रटने में मैं गोल-गोल घूमने लगता था पर फिर भी रटा…………
मेरा सिर फटने लगा था। सुबह की खुशी गम में कब बदली पता नहीं किंतु अभी जीवन से मोह खत्म हो गया था।
कमरे में मेरे और मेरी तन्हाई के अतिरिक्त एक सवाल था कि बाबा ने ऐसा क्यों किया। उन्हें मेरे सपनों को इस तरह कुचलने का क्या अधिकार था।
कुछ दिन पहले कुछ मुसलमानों ने गुवाहाटी के फेंसी बाजार में स्थित नयू मार्केट को जला दिया था। बहुत बवाल हुआ था और कई मारवाड़ी मारे भी गए थे, कहीं इसके लिए तो बाबा ने मुझे इंकार नहीं किया। कहीं उन्हें ऐसा तो नहीं लगता कि मैं वहाँ चला गया तो गुंडा बन जाऊँगा। मैं भी फिर लोगों को इसी तरह मारूँगा।

हे ईश्वर, बाबा मेरे लिए इतना निकृष्ट कैसे सोच सकते हैं। उन्हें धन का भी लालच आ सकता है, पर अब तो वे तब से ज्यादा कमाते हैं जब बड़े भाईसाहब को गुवाहाटी भेजा था, नहीं नहीं…पैसे की कोई बात नहीं है, मेरे से उनकी जन्मों की दुश्मनी है इसलिए वे मेरी कोई खुशी बर्दाश्त नहीं कर सकते…..
सब कुछ खत्म हो गया था….कुछ भी नहीं बचा था…

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