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उत्तराखंड में 22 साल बाद भी नहीं सुधरी स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति, अस्पताल शोपीस बने हैं

 
आइसीयू बेड की कमी बढ़ा रही जोखिम, एंबुलेंस, निजी अस्पतालों का गठजोड़
 

देहरादून। सड़क सुरक्षा के महाभियान के तहत राष्ट्रीय समाचार पत्र दैनिक जागरण के द्वारा उत्तराखंड में चलाये जा रहे अभियान में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति का भी आकलन किया गया है। पिछले 22 सालों में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति में उम्मीद के मुताबिक सुधार देखने को नहीं मिला है। सड़क दुर्घटनाओं में हर साल सैकड़ों लोग अपनी जान गंवाते हैं। घटना स्थल से अस्पताल की दूरी तय करने में जितना वक्त लगता है, घायलों की जान को खतरा उतना बढ़ता जाता है। इस कसौटी पर जिले की स्वास्थ्य सेवाओं का आकलन करें तो मौजूदा सिस्टम में भारी असंतुलन दिखाई पड़ता है। बीते 10-15 वर्षों में जिले में तेजी से स्वास्थ्य क्षेत्र में ढांचागत विकास हुआ।

अस्पताल शोपीस बने हैं, न जांच आदि की पर्याप्त सुविधाएं
सार्वजनिक से लेकर निजी क्षेत्र में यह बदलाव दिखता भी है। पर अफसोस कि बदलाव का ये चक्र शहर तक ही सीमित रहा। सड़क सुरक्षा के महाभियान के तहत हमने पाया कि मसूरी से लेकर जौनसार बावर तक का क्षेत्र स्तरीय स्वास्थ्य सेवाओं से महरूम है। अस्पताल शोपीस बने हैं, जिनमें न जांच आदि की पर्याप्त सुविधाएं हैं और न ही विशेषज्ञ चिकित्सक। हालात ये है कि दुर्घटना होने पर घायल व्यक्ति को इलाज के लिए दून लाना मजबूरी बन जाता है। जिसमें उसकी जान पर जोखिम कई गुना बढ़ जाता है। कई बार इलाज की आस में मरीज की सांस उखड़ जाती है।

आइसीयू बेड की कमी बढ़ा रही जोखिम
आइसीयू की कमी भी घायलों की जान पर जोखिम बढ़ा रही है। मौजूदा स्वास्थ्य सेवाओं का जायजा लेने पर पता चला कि देहरादून जिले की आबादी लगभग 20 लाख के करीब है, पर सार्वजनिक व निजी क्षेत्र में 750-800 ही आइसीयू बेड हैं। यह ऊंट के मुंह में जीरा वाली स्थिति है। ऐसे समय में जब मरीज की सांसें उखड़ रही होती हैं और उसे बचाने के लिए तत्काल उपचार की आवश्यकता होती है, उस समय आइसीयू की खोज में अस्पतालों की खाक छानने से मरीज के बचने की संभावना बहुत कम रह जाती है।

रात में सिस्टम सुप्त अवस्था में
रात के समय अधिकांश अस्पतालों की इमरजेंसी में स्टाफ सुप्त अवस्था में रहता है। ऐसे में देररात कोई दुर्घटना होने पर घायलों को इलाज के लिए फजीहत झेलनी पड़ती है। इस समय न तो चिकित्सक ढंग से देखता है और न ही स्टाफ सीधे मुंह बात करता है। अधिकांश अस्पतालों में सीटी, एमआरआइ व अन्य जांच आदि की भी सुविधा नहीं मिलती। यह स्थिति में जान का जोखिम बढ़ा देती है।

मौलिक अधिकार, पर जानकारी नहीं
पूर्व स्वास्थ्य महानिदेशक डा. आरपी भट्टड्ढ बताते हैं कि दुर्घटना में घायल व्यक्ति का इलाज करने से कोई भी सरकारी या निजी अस्पताल इन्कार नहीं कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने इसे मौलिक अधिकार घोषित किया है। पर सड़क दुर्घटना में आमतौर पर घायलों को नजदीकी अस्पताल को छोड़ सरकारी अस्पतालों में ले जाया जाता है। दुर्भाग्यवश, कई लोग की समय से चिकित्सा सुविधा न मिलने के कारण मौत हो जाती है। जबकि नजदीकी अस्पताल की जिम्मेदारी है कि वह घायल को जरूरी उपचार दे।

एंबुलेंस, निजी अस्पतालों का गठजोड़
जिले में निजी अस्पतालों व एंबुलेंस संचालकों का गठजोड़ भी घायलों की जान पर जोखिम बढ़ा रहा है। अधिकांश एंबुलेंस संचालकों का निजी अस्पतालों से कमीशन तय है। ऐसे में वे घायल को किसी बड़े अस्पताल में ले जाने के बजाए उस नंिर्सग होम या अस्पताल में ले जाते हैं, जहां स्वास्थ्य सेवाएं स्तरीय नहीं हैं। जब तक मरीज को हायर सेंटर रेफर किया जाता है, उसकी स्थिति बिगड़ जाती है।

जिले में स्वास्थ्य सेवाओं का ढांचा
01-एम्स
01- सरकारी मेडिकल कालेज
01- जिला चिकित्सालय
03- निजी मेडिकल कालेज
04- उप जिला चिकित्सालय
05-सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र
10- हेल्थ पोस्ट
12-अर्बन पीएचसी
20 -प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र
24 -स्टेट एलोपैथिक डिस्पेंसरी
150- निजी र्नंिसग होम एवं अस्पताल
171- स्वास्थ्य उप केंद्र

एंबुलेंस
32-108 आपातकालीन सेवा
695-निजी एंबुलेंस सेवा