अरंडी का उत्पादन बढ़ाने से मिल सकते हैं कई लाभ

भारत सरकार के साथ-साथ सभी प्रदेश सरकार किसानों की आय बढ़ाने के अलावा कृषि उपज की लागत बढ़ाने के प्रयास में जुटी है। अभी चार जुलाई को केंद्र सरकार ने विभिन्न कृषि उपज का समर्थन मूल्य बढ़ाकर किसानों को बड़ी राहत दी है। इसी कड़ी में यदि किसानों की पिछले कई वर्षों से चली आ रही अरंडी बीज का समर्थन मूल्य तय करने की भी घोषणा कर दी जाती तो और बेहतर होता।
किसानों की आय बढ़ाने से लेकर वायु प्रदूषण रोकने, निर्यात से विदेशी मुद्रा अर्जित करने, भूमि में रसायनों के उपयोग से बढ़ रहे प्रदूषण को रोकने, जल संरक्षण व रोजगार के अवसरों में वृद्धि करने आदि में अरंडी का उत्पादन बढ़ाने से काफी मद्द मिल सकती है। अरंडी एक ऐसी फसल है जो दुनिया में सबसे ज्यादा अपने देश भारत में ही होती है। वर्ष 2017-18 में भारत में अरंडी का उत्पादन साढ़े चैदह लाख टन के आस-पास रहने का अनुमान है। दुनिया के दस प्रमुख अरंडी उत्पादक देशों में मोजंबिक दूसरे, चीन तीसरे, ब्राजील चैथे, इथोपिया पांचवें, म्यांमार छठे, पराग्वे सातवें, वियतनाम आठवें, साउथ अफ्रीका नौंवे व अंगोला दसवें स्थान पर है। अन्य देशों में जितना अरंडी उत्पादन होता है, उन सबको मिलाकर भी भारत के अरंडी उत्पादन के आसपास भी नहीं होता।
भारत में सबसे अधिक अरंडी के पैदावार गुजरात में होती है। यहां प्रति हेक्टेयर औसत उत्पादन भी अन्य राज्यों के मुकाबले सबसे अधिक है। वर्ष 2017-18 में यहां 5,95,600 हेक्टेयर में अरंडी की फसल लगाई गई। अरंडी उत्पादन अनुमान 12.20 लाख टन लगाया गया है। इसी प्रकार राजस्थान में 1.58 लाख टन और आंध्र प्रदेश में 0.28 लाख टन अरंडी उत्पादन का अनुमान लगाया गया है। अरंडी उगाने वाले किसानों की उपज का बेहतर मूल्य न मिलने से गुजरात को छोड़कर अन्य राज्यों में उपज क्षेत्रा कम हुआ है।
सोलवेंट एक्सटेक्टर एसोसिएशन के आंकड़ों के मुताबिक इस साल भारत में 8 लाख 22 हजार हेक्टेयर में लगाई गई अरंडी की फसल से औसतन 1738 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर फसल पैदावार का अनुमान है।
दर्जनों देशों में होता है निर्यात
भारत के अरंडी तेल व अरंडी बीज का दुनिया के अनेक देशों में निर्यात किया जाता है। जिन देशों में अरंडी तेल प्रमुखता से निर्यात किया जाता है, उनमें अमेरिका, कनाडा, फ्रांस, इटली, जापान, दक्षिण अफ्रीका, नीदरलेंड, चीन, टर्की, ताइवान व थाईलैंड सहित अन्य प्रमुख देश शामिल हैं। कुछ देशों में अरंडी आयल केक का भी निर्यात किया जाता है। आयल केक का उपयोग बेहतरीन आर्गेनिक खाद के अलावा बायलर में भी किया जाता है। अरंडी के निर्यात से देश को काफी विदेशी मुद्रा भी मिलती है। अरंडी तेल के कारोबारियों का अनुमान है कि इस साल इस तेल की मांग में तीस फीसदी की बढ़ोत्तरी रहेगी जिसे भारतीय निर्यातक पूरा नहीं कर पाएंगे।
अनेक उद्योगों में है अरंडी तेल की खपत
अरंडी तेल कृषि क्षेत्रा की ऐसी उपज है जिसकी मांग व खपत हर साल बढ़ रही है पर कोई तय खरीद कीमत न होने से इसके उत्पादकों में इसे पैदा करने की ओर रुझान कम हो रहा है। गौर करने लायक तथ्य यह है कि अरंडी तेल की केमिकल और फार्मा क्षेत्रा में निरंतर मांग बनी रहती है। इस तेल का उपयोग मुख्य रूप से साबुन, लुब्रीकेंट, हाइड्रोलिक, बे्रक फ्यूल, पेंट, डाई, कोटिंग, प्लास्टिक उद्योग आदि में दुनिया भर में किया जाता है।
बायोडीजल बनाने के प्रयास भी जारी
अरंडी तेल का उपयोग बायोडीजल के रूप में करने के कई देशों में परीक्षण एवं शोध किये जा रहे हैं। यदि इस तेल का बायोडीजल के रूप में उपयोग करने में सफलता मिली तो सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि दुनिया में भारतीय अरंडी तेल की मांग किस स्तर पर बढ़ जाएगी। विभिन्न वेबसाइट खंगालने पर पता चलता है कि इसका बायोडीजल के रूप में उपयोग करने में इसका लिसलिसापन ही प्रमुख रूप से बाधा बन रहा है। तापमान मापदंडों में इसका उपयोग बाधक नहीं है।
वायु प्रदूषण से निपटने में कारगर हो सकता है
उत्तर भारत में, राजस्थान को छोड़कर अरंडी की खेती व्यावसायिक दृष्टि से तो नहीं होती। यदि वायु प्रदूषण नियंत्रित करने और वर्षों जल संरक्षण करने के लिहाज से इसकी खेती को बढ़ावा दिया जाए तो माना जा सकता है कि यह दिल्ली एनसीआर के साथ-साथ उत्तर भारत के शहरों में बढ़ते वायु प्रदूषण को रोकने में काफी मद्दगार हो सकता है। यदि चालू मानसून सीजन में इसका व्यापक स्तर पर बीजारोपण किया जाए तो सर्दी के मौसम (तब वायु प्रदूषण में इजाफा अधिक होता है) आने तक इसका पौधा आठ-दस फुट बड़ा होकर प्रदूषण रोकने में अपनी अहम भूमिका निभा सकता है। व्यावसायिक दृष्टि से पैदावार लेने की अनदेखी कर इसका बीज रोपाई सड़कों के साथ लगती सरकारी जमीन पर कराकर प्रदूषण से निपटने की दिशा में तो कदम बढ़ाए ही जा सकते हैं।
बेकार पड़ी जमीन पर कराई जा सकती है इसकी खेती
अपने देश में सिंचाई साधानों का अभी भी काफी अभाव है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश में करीब 24 फीसदी भूमि बेकार पड़ी है। इस जमीन के काफी बड़े हिस्से पर फसल उगाई जा सकती है जबकि कुछ हिस्सों पर किसी प्रकार की खेती मुमकिन नहीं हंै। जितने हिस्से में खेती हो सकती है और जहां सिंचाई के साधन उपलब्ध नहीं है वहां अरंडी की पैदावार को बढ़ावा दिया जा सकता है। इससे भूमि की उपयोगिता बढ़ने के साथ-साथ किसानों की आय और तेल निर्यात को बढ़ावा मिलेगा। कहने की आवश्यकता नहीं
इससे रोजगार के अवसर भी निश्चय हीं बढेंगे।
मालूम हो कि अरंडी की पैदावार के लिए सिंचाई साधनों की ज़रुरत नहीं है। बरसात के दिनों में इसकी बिजाई कर दिये जाने से ही यह फसल बीज उत्पादन करने में सक्षम है। अलबत्ता थोड़ी सिंचाई और देखरेख कर ली जाए तो औसत उपज में बढ़ोत्तरी हो सकती है। इस बहु उपयोगी फसल का भी यदि समर्थन मूल्य तय करते हुए इसकी सरकारी खरीद की गारंटी तय कर दी जाए तो निश्चय ही अरंडी बीज और तेल विभिन्न क्षेत्रों में अपनी सार्थकता सिद्ध करने में सक्षम है।

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