इतिहास: भारत की आजादी हेतु करते रहे संघर्ष, फिर क्यों ली जापान की नागरिकता, जानिए इस वीर की कहानी

अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध में ‘गदर’ एवं ‘आजाद हिन्द फौज’ का संगठन बनाया। दिल्ली में भारत के तत्कालीन वाइसराय लार्ड चार्ल्स हार्डिंग पर बम फेंकने की योजना बनाई, जापान जाकर इंडियन इंडिपेंडेंस लीग और आजाद हिंद फौज की स्थापना की। भारत को आजादी दिलाने के लिए कुछ इसी प्रकार भारतीय क्रांतिकारी रास बिहारी बोस ने अपनी पूरी जिंदगी अंग्रेजों के हुकूमत के खिलाफ लड़ते रहे। आज उनके 135वें जन्मदिवस के अवसर पर आई जानते उनके संघर्ष के कुछ खास किस्से।

बंगाल के बर्धमान जिले में हुआ था जन्म
26 मई 1886 को बंगाल के बर्धमान जिले के सुबालदह नामक एक गांव में रास बिहारी बोस का जन्म हुआ था। मात्र तीन वर्ष की आयु में रास बिहारी ने अपनी मां को खो दिया। मां के निधन के पश्चात रास बिहारी की मामी ने ही उनका पालन –पोषण किया। चन्दननगर के विद्यालय से अपनी स्कूली शिक्षा हासिल करने के पश्चात रास बिहारी चिकित्सा शाष्त्र और इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के लिए क्रमश: फ्रांस और जर्मनी चले गए।

1905 में पहली बार इस वजह से किया विरुद्ध प्रदर्शन
वर्ष 1905 में भारत के तत्कालीन वाइसराय कर्जन ने बंगाल का विभाजन कर दिया था। इसी दौरान रास बिहारी पहली बार क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़े। विभाजन को रोकने के लिए अरबिंदो घोष और जतिन बनर्जी के साथ मिलकर रास बिहारी ने बंगाल विभाजन के पीछे अंग्रेजी हुकूमत की मनसा का खुलासा करने का प्रयास किया। इसी दौरान उनका परिचय बंगाल के प्रमुख क्रांतिकारियों जैसे युगान्तर क्रान्तिकारी संगठन, संयुक्त प्रान्त (वर्तमान उत्तर प्रदेश) और आर्य समाजी क्रांतिकारियों से हुआ।

तत्कालीन वाइसराय लॉर्ड हॉर्डिंग की बग्गी पर फेंका बम
1911 तक आते-आते रास बिहारी के अंदर का क्रांतिकारी जग चुका था। दिसंबर माह की बात है ‘दिल्ली दरबार’ के बाद तत्कालीन वाइसराय लॉर्ड हार्डिंग की सवारी दिल्ली के चांदनी चौक में निकाली जा रही थी। तब रास बिहारी ने उन पर बम फेंकने की योजना बनाई। युगांतर दल के सदस्य बसन्त कुमार विश्वास ने हार्डिंग की बग्गी पर बम फेंका, लेकिन निशाना चूक गया और पुलिस ने बसंत तो पकड़ लिया। बम की वजह से मची भकदड़ का फायेदा उठाकर रास बिहार पुलिस से बच निकले और रातों-रात रेलगाड़ी से देहरादून चले गए। बम फेंकने के अगले ही दिन अपने कार्यालय में इस तरह काम करने जैसे कुछ हुआ ही न हो। अंग्रेजी प्रशासन को उनपर कोई शक न हो इसलिए उन्होंने देहरादून में ही सभी बुलाई और अंग्रेजों को दिखाने के लिए वाइसराय हार्डिंग पर हुए हमले की निंदा करने लगे।

प्रथम विश्व युद्ध के दौरान बनाई गदर की योजना
वर्ष 1913 की बात है, बंगाल बाढ़ आने की वजह से रास बिहारी राहत कार्य में जुट गए थे। इसी दौरान उनकी मुलाकात जतिन मुखर्जी से हुई।  उन्होंने रास बिहारी के अंदर एक नया जोश भर दिया। जिसके बाद वह दोगुने उत्साह से साथ काम करने लगे। उन्होंने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारत को आजादी दिलाने के लिए गदर की योजना बनाई। वर्ष 1915 के फरवरी माह में उन्होंने अपने भरोसेमंद क्रांतिकारियों को सेना से युद्ध करने की योजना बनाई। उनका मानना था कि प्रथम विश्वयुद्ध के वजह से अधिकतर सैनिक देश से बाहर गए हुए हैं, ऐसे में देश में मौजूद सैनिकों के साथ युद्ध करना सरल हो सकता है। किंतु उनकी यह योजना असफल साबित हुई। परिणामस्वरूप कई क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया।

इस वजह से जापान में नाम बदलकर रहने लगे रास बिहारी
सेना से युद्ध के बाद से ही ब्रिटिश पुलिस रास बिहारी को ढूंढने लगी। जिसकी वजह से वर्ष 1915 के जून माह में उन्हें भारत से भागना पड़ा। रास बिहारी छुपने के लिए जापान में राजा पी. एन. टैगोर के नाम से रहने लगे और वहां रहकर भारत की आजादी के लिए काम करने लगे। जापान में जापानी क्रान्तिकारी मित्रों के साथ मिलकर भारत को आजाद कराने के लिए काम करते रहे। इसी दौरान उन्होंने अंग्रेजी अध्यापन, लेखन और पत्रकारिता का कार्य किया। ‘न्यू एशिया’ नामक समाचार-पत्र शुरू किया और जापानी भाषा में कुल 16 पुस्तकें लिखीं। यहां तक कि उन्होंने हिन्दू धर्म ग्रन्थ ‘रामायण’ का जापानी भाषा में अनुवाद किया।

टोक्यो में की इंडियन इंडिपेंडेंस लीग की स्थापना
सन 1916 में रास बिहारी बोस ने प्रसिद्ध पैन एशियाई समर्थक सोमा आइजो और सोमा कोत्सुको की पुत्री से विवाह कर वर्ष 1923 में जापानी नागरिकता हासिल की। उन्होंने इस दौरान भारतीय स्वाधीनता आंदोलन और राष्ट्रवादियों के पक्ष में जापानी अधिकारियों का समर्थन पाने की कोशिश की और वे इसमें सफल भी हुए। उन्होंने मार्च 1942 में टोक्यो में ‘इंडियन इंडिपेंडेंस लीग’ की स्थापना की और भारत की स्वाधीनता के लिए एक सेना बनाने का प्रस्ताव भी पेश किया।

जापानी सैन्य ने रास बिहारी को आईएनए के नेतृत्व से हटाया
वर्ष 1942 में रास बिहारी ने इंडियन इंडिपेंडेंस लीग की सैन्य शाखा के रूप इंडियन नेशनल आर्मी (आईएनए) का गठन किया और सुभाषचंद्र बोस को अध्यक्ष बनाया गया।। जापानियों की सहायता से नेताजी की फौजें चटगांव, कोहिमा, इंफाल तक जा पहुंचीं। लेकिन जापान पर हुए आक्रमण ने विश्वयुद्ध की दिशा बदल दी। जापानी सैन्य कमान ने रास बिहारी बोस और जनरल मोहन सिंह को आईएनए के नेतृत्व से हटा दिया। लेकिन आईएनए का संगठनात्मक ढांचा बना रहा। 21 जनवरी 1945 को रास बिहार का निधन हो गया। उनके निधन के चार साल बाद आजाद भारत का उनका सपना पूरा हुआ और सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिन्द फौज के नाम से आईएनए का पुनर्गठन किया। मरणोपरांत के बाद जापानी सरकार द्वारा रास बिहारी को जापान का तीसरा सर्वोच्च पुरस्कार ‘आर्डर आफ द राइजिंग सन’ से सम्मानित किया गया।

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