पेट और तोंद का व्याकरण

हमारे जीतू भैया आजकल व्याकरण सीख रहे हैं इसीलिए आज सवेरे की सैर में घसीटाराम जी के पीछे घिसटते हुए पूछ रहे थे, ‘सर, पेट पुल्लिंग है तो तोंद स्त्रीलिंग क्यों?’ घसीटाराम जी ने पलटकर कहा, ‘लगता है कुंवारे हो अभी। शादीशुदा खुद ही इस सवाल का जवाब होते हैं।’ पहली बार महागुरु घसीटाराम जी का अनुभव भी गच्चा खा गया क्योंकि जीतू भैया इस मामले में अपवाद हैं। उनकी श्रीमतीजी पेट यानी दुबली परंतु वह स्वयं तोंद हैं। कहने की जरूरत नहीं कि भैया दिनभर खाने के बावजूद भूखे रहते हैं। भूखे की भूख दूर करने वाली को दिनभर चक्की पीसनी पड़ती है तो कभी-कभी तो स्वयं भी चक्की बनना पड़ता है। ऐसे में ‘महिला शक्तिकरण’ का नारा कमजोर पड़ना तय है।
घसीटाराम जी के पास भी इस सवाल का कोई जवाब नहीं है कि ‘क्या दाल, भात, तरकारी से लिंग परिवर्तन हो सकता है यानी पुल्लिंग पेट का स्त्रीलिंग तोंद में रुपांतरण संभव हैं?’ पेट का वेट बढ़ने और गुब्बारे की तरह फूलने को तोंद कहा जाता है। पेट जब कमर को स्पर्श करने के लिए मचलने लगे तो समझो मेहनत ज्यादा, राशन कम पर जब पेट का गुरुत्वाकर्षण बढ़ने लगे तो समझो बंदे पर ‘ईश्वर, अल्लाह, गाड’ एक साथ कृपा कर रहे हैं।
तोंद और पेट का रिश्ता बहुत पुराना है। पेट मौका पाकर तोंद हो सकती है पर तोंद एक बार तोंद होकर तोंद ही रहती है। उसकी कलात्मकता से कुछ लोगों को इतनी जलन कि तोंद को शोषण का परिणाम घोषित कर गरीब के पेट पर लाट मारने के आरोप से लथपथ करते नहीं सकते। अल्लाह जाने कहू या कहू राम जाने कि ‘पेट तो किसी न किसी तरह भर ही जाता है पर तोंद चारे से सीमेंट कोयले तक, टूजी से तोप तक खाकर भी नहीं भरती’ में कुछ सच्चाई है भी या नहीं क्योंकि तोंद वाले आखिर बेदाग छूटते देखे गये हैं मगर इस तथ्य को पूरी तरह नकार नहीं सकते हंै कि हर तीर्थस्थान पर बनी धर्मशालाएं तोंद ने ही बनवायी है। बंदा बंद मुट्ठी का मालिक है इसलिए उससे ईष्र्या न की जाये तो उसकी समृद्धि का अपमान है। एक कवि तो इतने ईष्र्यालु कि सलाह देने लगे- ‘थोड़ी तोंद घटा लेते तो कुछ खपचियों पे मांस चढ़ जाता।’
तोंद पर केवल हलवाई का ही एकाधिकार नहीं होता, उसके पास काम करने वाले शुरु में कड़के से दिखने वाले लड़के कुछ ही सालों में गोलमोल हो जाते हैं। यूं तोंद पर एकाधिकार मंत्रीजी का भी नहीं है। उनके आसपास परिक्रमा करने वाले चमचों तक की कमीज के बटन भी बंद नहीं होते, इसलिए बेचारों को कुर्ता पहनना पड़ता हैं।
बेशक खाली पेट को कभी अपच नहीं होती क्योंकि तर माल का रसास्वादन करने का अवसर उसे नहीं, तोंद को ही मिलता है। तोंद पाचक चूरण तलाशती है तो पिचका पेट बासी रोटी के स्वागत के स्वागत के लिए भी तैयार। तोंद छप्पन स्वाद पाती है तो पेट मौन रहकर अपनी इज्जत बचाता है।
बेशक पुराने अनुभवी लोग कहते हैं कि छरहरा युवक सुंदरियों की पहली पसंद होता है पर वे भूलते हैं कि आज छरहरे नहीं, तोंद की तरह फूले बटुए से बंदे तक को प्रथम वरीयता प्राप्त है। क्योंकि पतला क्रेडिट कार्ड धोखा दे सकता है पर फूला बटुआ हर्गिज नहीं।
जीतू भैया का अनुभव विराट है। वह किसी विराट कोहली की तरह बल्ले से ठुक ठुक नहीं करते बल्कि दारासिंह की तरह धोबिया पाट चलते हैं। ‘कुत्ता पीछे लग जाये तो तोंद भागने नहीं देती।’ को नकारते हुए उनका दावा है, ‘कुत्तों के पीछे भागने के लिए हमने तोंद नहीं पाली है। बहुत हैं ऐसे जो कुत्ते के आगे या पीछे दौड़ सकते हैं। जहां मोटा माल मिलने की संभावना हो, वहां हम तोंद वाले जम्बो जेट की गति से सबसे पहले पहुंचते हैं या नहीं?’
हमारे तोंद भैया के लिए तोंद शर्म का नहीं, गर्व का विषय है क्योंकि उन्होंने शर्म त्याग दी है। पत्नी बच्चे लाख समझाते रहे- ‘कम खाओ, कम खाओ’ लेकिन पंगत में बैठने से पहले वह अपने लिए दो थाली लगवाते हैं, एक अपनी, दूसरी बेचारी तोंद के लिए। उनका दर्शन है ‘भूखे मरने से बेहतर है खा पीकर मरा जाये। केवल तोंद वाले के जाने से ही धरती का भार कम होता है वरना तो रोज हजारों मरते और जन्म लेते रहते हैं, क्या कभी सुना है कि धरती का बोझ घटा?’
आओ मिलकर प्रार्थना करें कि पुल्लिंग पेट को स्त्रीलिंग तोंद से बदलने वालो से जलने वालों को भगवान सद्बुद्धि दें लेकिन जाने से पहले हमारी इस समस्या का भी समाधान करते जाओं कि कल सुबह टीवी आन कर बाबा की योग क्रियाएं करूं या वजन बढ़ाने वाले फलां या अलां कम्पनी का मल्टी विटामिन पाउडर खरीदूं।

-डा. विनोद बब्बर-

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