रोक नहीं पा रही सरकार महिला अत्याचार

क्या हम ऐसे समाज में रहने को अभिशप्त हो गए हैं जहां महिलाओं, युवतियों, यहां तक कि बच्चियों तक का जीना मुश्किल हो चला है? यह प्रश्न हम सबके मन में तब से कचोट रहा है जब से मंदसौर में महज 8 साल की एक बच्ची के साथ क्रूरतापूर्ण दुष्कर्म की बात सामने आई है। यह घटना, जो मंदसौर में घटी, कल को हमारे ऐन आसपास भी घट सकती है। इस भय के बावजूद इस घटना ने हमें एक अलग नजरिए से सोचने को भी बाध्य किया है।
महिलाओं पर अत्याचार कम होने का नाम नहीं ले रहे। उन पर धर्म और जाति का कहर जारी है। लगातार एक के बाद एक सामने आ रही घटनाओं ने देश को झकझोर कर रख दिया है। जम्मू में एक नाबालिग लड़की आसफा के साथ बलात्कार के बाद नृशंस हत्या और उत्तर प्रदेश में उन्नाव के विधायक कुलदीप सिंह सेंगर द्वारा एक युवती का बलात्कार किए जाने के मामले को लेकर महिलाएं आंदोलनरत रहीं।
देह व्यापार जारी है। संकट के समय में लड़कियां गुलामों की तरह बेच दी जाती हैं। सामान्य दिनों में भी उन्हें नौकरी के बहाने शहरों में लाकर छोटे कमरों में रख दिया जाता है जहां अकेलेपन के शिकार लोग आते हैं। सेक्स को लेकर हमारा रवैय्या ऐसा है कि वहां से निकलकर सामान्य जिंदगी जीना उनके लिए असंभव होता है।
कानून में संशोधन के बावजूद वारदातों में कमी नहीं हो रही। आसफा मामले में जनआक्रोश को देखते हुए बलात्कारियों को कड़ी से कड़ी सजा देने की मांग उठने के बाद सरकार द्वारा बलात्कारी को मृत्युदंड की सजा का प्रावधान किया गया। इससे पहले 2012 में निर्भया कांड के बाद भी बलात्कार कानून में संशोधन किया गया था। फिर भी महिलाओं और बच्चियों के यौन शोषण की घटनाओं में कमी नहीं आई। इन्हीं घटनाओं के बीच कांग्रेस नेता रेणुका चैधरी ने संसद में और कोरियोग्राफर सरोज खान ने बाॅलीवुड में कास्टिंग काउच की बात कही तो इस पर बहस छिड़ गई।
महिला भू्रण हत्या हमेशा से गंभीर समस्या रही है खासतौर पर उत्तर में जहां लड़कियों को जन्म देने पर महिलाओं के साथ खुलेआम क्रूरता बरती जाती है। सरकार की अनदेखी के कारण वास्तविक आंकड़े तो नहीं हैं पर हत्याएं हर साल बढ़ती जा रही हैं। इससे लिंगानुपात गड़बड़ा गया है और कई लोगों को संदेह है कि महिलाओं के खिलाफ सारी हिंसा के पीछे यही कारण हैं। प्रत्येक 100 लड़कियों के पीछे हमारे यहां 112 लड़के जन्म लेते हैं। बेटों को तरजीह देने से हमारा 105 अनुपात 100 का प्राकृतिक अनुपात बिगड़ गया यानी 6.30 करोड़ लड़कियां गायब हंै, यह बीबीसी का कहना है।
निर्देशक अलंकृता श्रीवास्तव की फिल्म ‘लिपस्टिक अंडर माय बुर्का‘ पर कहने को तब के सैंसर बोर्ड के मुखिया पर असल में धर्म और संस्कृति के ठेकेदार पहलाज निहलानी द्वारा रोक लगा दी गई। इस फिल्म में चार औरतों की कहानियां है जो सेक्स को लेकर अपनी-अपनी इच्छा जाहिर करती हैं। महिलाओं की आवाज दबाने और उनके यौन शोषण के किस्सों की आए दिन भरमार रहती है।
दहेज की घातक प्रथा समाज के हर स्तर पर भिन्न रूपों में जारी है। शादी की शुरूआत ही वर पक्ष की मांगों से शुरू होती है और पूरी नहीं हुई तो शादी खत्म। लड़की को आजीवन लांछन झेलना पड़ता है जो प्रायः आत्महत्या में खत्म होता है। बेटी की शादी में परिवार बरबाद हो जाते हैं और फिर भी यदि वह अपनी पसंद से शादी करे तो कहर टूट पड़ता है, खासतौर पर तब जब लड़का उनकी जाति या समुदाय के बाहर का हो। यहीं पर आॅनर किलिंग होती है और लव जेहाद की पुकार मचती है।
आप बीते करीब 15-16 साल के अखबारों को उठाकर देखिए, वे आपको महिला सशक्तिकरण के दावों, भाषणों और योजनाओं से भरे पड़े मिलेंगे किंतु छोटी-छोटी बच्चियों के साथ होने वाली घटनाएं क्या यह साबित नहीं करती कि वे दावे खोखले थे? ऐसा नहीं कि सरकारों ने कुछ नहीं किया किंतु जो किया गया, क्या उसकी दिशा सही थी?
प्रश्न यह भी उठता है कि जब कभी जनता सड़क पर उतरती है, तभी पुलिस अतिरिक्त सक्रियता दिखाती है वरना अधिकांश मामलों में यह जरूर होता है कि आरोपी को पकड़ने के बजाय पुलिस वाले ऐसे मामलांे को दबाने में जुट जाते हैं। विडंबना है कि सरकारें भी कानून बनाकर इतिश्री समझ लेती हैं मगर अब ऐसा नहीं होना चाहिए। बच्चियों को बचाने के लिए पूरे तंत्रा को मिलकर आगे आना होगा।
वस्तुतः हम रोग का इलाज सही ढंग से करने के बजाय उसे छुपाने का प्रयत्न कर रहे हैं। हम नारी सुरक्षा के लिए नारी को और परदे में ले जाने की बात कह रहे हैं। आखिर आप सीसीटीवी कैमरे कहां-कहां लगाएंगे? कितनी जगहों पर आप पुलिस की तैनाती करेंगे? आखिर आपका निगरानी तंत्रा कहीं तो फेल होगा और जहां यह फेल हुआ, नरभक्षी राक्षस बेटियों को नोचने लगेंगे, इसलिए अच्छा यही होगा कि समाज अपनी बेटियों, घर की महिलाओं के प्रति अपने सोचने-समझने के तरीके में बदलाव लाए।
विज्ञान और टेक्नोलाॅजी नए क्षितिज खोज रही है जबकि धर्म के रास्ते पर चलने वाले शासकों के साथ मिलकर धर्म के रक्षक संकीर्णता थोपना चाहते हैं, समाज को नियंत्रित रखना चाहते हैं। आज महिलाएं जागरूक हो रही हैं, अपने नैसर्गिक अधिकारों की मांगों को लेकर सतर्क हो रही हैं और आवाज उठा रही हैं तो इससे जमी-जमाई धार्मिक और सामाजिक सत्ताओं को चुनौती मिल रही है। उन्हें भय सताने लगा है, इसलिए स्त्रिायों पर पाबंदियां और कड़ी की जा रही हैं। स्त्रिायों पर हिंसा के नए रूप सामने आ रहे हैं पर समानता के लिए उनकी जंग जारी है।
यह समानता की लड़ाई राजनीतिक कभी नहीं रही। यह हमेशा धर्म के खिलाफ रही है क्योंकि धर्म ही समाज को उकसाता है और राजा या शासक को आदेश देता है। धर्म के बड़े-बड़े ओहदे पर बैठे लोग समाज की गरीबी, भेदभाव, बीमारी, गंदगी, भ्रष्टाचार की बात नहीं करते जबकि औरतों को कुचलने की बातें वे करते रहते हैं।

-नरेन्द्र देवांगन-

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